अरावली को बचाने के मुद्दे पर पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के तर्कों में कितना है दम?

एक्यूआई की तीव्रता झेलती दिल्ली-एनसीआर अरावली मुद्दे पर बहुत जल्दी सेंसिटिव हो गई है. पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र सिंह को सामने आकर सफाई देनी पड़ी है. भूपेंद्र यादव बार-बार सफाई दे रहे हैं पर क्या जनता को उनकी बातों पर यकीन हो रहा है?

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अरावली की चिंता में सरकार और आंदोलनकारियों में ठनी हुई है. (फोटो - Pexels) अरावली की चिंता में सरकार और आंदोलनकारियों में ठनी हुई है. (फोटो - Pexels)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 22 दिसंबर 2025,
  • अपडेटेड 6:05 PM IST

अरावली पहाड़ियां, जो भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं, सदियों से उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा का कवच बनी हुई हैं. ये राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली जैसे चार राज्यों में फैली हुई हैं, और थार रेगिस्तान के विस्तार को रोकने, जल संरक्षण, जैव विविधता और वायु शुद्धिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

हाल ही में, नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की एक नई परिभाषा को मंजूरी दी, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भूमि को ही 'अरावली पहाड़ी' माना जाएगा. यह फैसला 1985 से लंबित एक जनहित याचिका पर आधारित था, जिसका उद्देश्य चारों राज्यों में एक समान परिभाषा लागू करना था ताकि अवैध खनन, भूमि उपयोग और पर्यावरण नियमों में स्पष्टता आए.

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इस फैसले के बाद विपक्षी दलों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और आम जनता में हंगामा मच गया. #SaveAravalli अभियान के तहत हजारों लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए, और सोशल मीडिया पर यह मुद्दा वायरल हो गया. विपक्ष का आरोप है कि यह परिभाषा अरावली के बड़े हिस्से को सुरक्षा से बाहर कर देगी, जिससे खनन और रियल एस्टेट बढ़ेगा.

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने क्या कहा

दूसरी तरफ केंद्र सरकार और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक मजबूत कदम बताया है. यादव ने कई बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स के माध्यम से सफाई दी, जिसमें उन्होंने कहा कि इस परिभाषा से 90% से अधिक क्षेत्र 'संरक्षित जोन' में आ गया है, और केवल 0.19% क्षेत्र ही खनन के योग्य है . वह भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सस्टेनेबल माइनिंग प्लान और इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) की मंजूरी के बाद.

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उन्होंने यूट्यूब और मीडिया में फैली 'गलत जानकारी' को खारिज किया, और जोर दिया कि परिभाषा पूरे पहाड़ी फैलाव (ऊपर से नीचे तक, ढलान और आधार तक) को कवर करती है. दिल्ली में कोई खनन नहीं होगा, और 'ग्रीन अरावली वॉल' प्रोजेक्ट के तहत वनीकरण, स्थानीय पौधों की नर्सरी और पूरे इकोसिस्टम (घास, झाड़ियां, औषधीय पौधे) की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है. सरकार के तर्कों और पर्यावरण मंत्री यादव की सफाई की वैधता को कम से कम पांच पॉइंट्स पर परख सकते हैं

पॉइंट 1: वैज्ञानिक और भौगोलिक आधार पर पहाड़ी की ऊंचाई

सरकार का मुख्य तर्क वैज्ञानिक है. अरावली की परिभाषा जियोलॉजिकल विशेषज्ञों की सिफारिश पर आधारित है. मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति गठित की थी, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय के सचिव की अध्यक्षता में राज्य प्रतिनिधि और विशेषज्ञ शामिल थे.

इस समिति ने राजस्थान की 2006 की परिभाषा को अपनाया, जिसमें 100 मीटर ऊंचाई वाली भूमि को पहाड़ी माना जाता है. यादव ने सफाई दी कि यह परिभाषा 'रिलीफ' (स्थानीय ऊंचाई) पर आधारित है, और निकटवर्ती पहाड़ियों (500 मीटर के भीतर) को एक रेंज माना जाएगा, जिसमें ढलान और आधार शामिल हैं.

सरकार का दावा है कि कुल 1.47 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में से 90% से अधिक संरक्षित है, और केवल 217 वर्ग किमी (0.19%) खनन योग्य है. यह आंकड़े फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) से लिए गए हैं.

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पर्यावरण मंत्री की बातों कितना दम?

वैज्ञानिक रूप से, यह तर्क मजबूत लगता है क्योंकि पहले परिभाषा की अस्पष्टता से अवैध खनन बढ़ा था. उदाहरण के लिए, हरियाणा और राजस्थान में अलग-अलग मानक थे, जिससे विवाद होते थे. विशेषज्ञ जैसे जियोलॉजिस्ट रिचर्ड मर्फी की परिभाषा (जिस पर यह आधारित है) अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल खाती है, जहां पहाड़ी की परिभाषा ऊंचाई और फैलाव पर निर्भर करती है.

हालांकि, आलोचक जैसे पीपल फॉर अरावली के नेलम अहलूवालिया कहते हैं कि यह परिभाषा 3 अरब साल पुराने इकोसिस्टम को सीमित कर देती है. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की आंतरिक रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई कि इससे राजस्थान में केवल 8.7% क्षेत्र संरक्षित रहेगा, और बाकी रेगिस्तान विस्तार का शिकार हो जाएगा. पर्यावरण मंत्री यादव कहते हैं कि पहाड़ी की ऊंचाई केवल जमीन से नहीं नापी जाएगी. इसके लिए प्रावधान है कि पहाड़ी का जितना हिस्सा जमीन के नीचे होता है उससे उसकी ऊंचाई नापी जाएगी. दूसरे पहाड़ी के ऊपरी हिस्से से सीधे धरातल की लंबाई नहीं नापी जाएगी. ऊंचाई से पहाड़ी के फैलाव को भी नापा जाएगा . जाहिर है कि यादव की बात अगर सही है तो अरावली पर कोई खतरा नहीं है. 

भौगोलिक रूप से, अरावली की ज्यादातर ऊंचाई 100 मीटर से कम है, खासकर राजस्थान में, जहां औसत ऊंचाई 50-80 मीटर है. इसलिए, सरकार का 90% संरक्षण का दावा 'स्पिन' नहीं लगता है अगर पहाड़ी की नाप उस तरह से हो जिस तरह से भूपेंद्र यादव कह रहे हैं. 

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पॉइंट 2: कानूनी और नियामक पहलू पर जांच

कानूनी रूप से, सरकार का तर्क सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर टिका है. कोर्ट ने नई खनन लीज पर रोक लगा दी है जब तक सस्टेनेबल माइनिंग प्लान (MPSM) ICFRE के साथ तैयार नहीं होता.

यादव ने सफाई दी कि परिभाषा चारों राज्यों की सहमति से बनी है, और 'कोर/इनवायोलेट' क्षेत्रों में खनन प्रतिबंधित रहेगा. सरकार ने कहा कि यह 1992 के फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट और 2006 के एनवायरनमेंट इंपैक्ट असेसमेंट नियमों से मेल खाता है. कोई नई ढील नहीं दी गई; बल्कि, अस्पष्टता को दूर किया गया है.

यादव की सफाई कितनी वाजिब?

कानूनी रूप से मजबूत, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंजूर किया है, और समिति की सिफारिशें पारदर्शी हैं. ऐतिहासिक रूप से, कोर्ट ने अरावली पर 10 से अधिक बार हस्तक्षेप किया है. जैसे 2018 में 31 'गायब' पहाड़ियों पर रोक, या 2021 में फरीदाबाद में 10,000 अवैध निर्माणों को हटाने का आदेश.

यह नई परिभाषा उन फैसलों का विस्तार लगती है हालांकि, आलोचक कहते हैं कि परिभाषा 90% क्षेत्र को 'नॉन-हिल' घोषित कर देती है, जिससे फॉरेस्ट एक्ट की सुरक्षा हट जाएगी. पर यह अतिशयोक्ति ही लगता है. हालांकि विरोधियों के तर्क में दम भी है.

उदाहरण के लिए, हरियाणा में पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट की संशोधन (2019) ने पहले ही निर्माण की अनुमति दी थी, जिस पर कोर्ट ने चेतावनी दी. यादव की सफाई कि 'केवल 0.19% योग्य' कानूनी रूप से सही है, लेकिन अगर राज्य सरकारें इसे गलत तरीके से लागू करें, तो समस्या हो सकती है. इस पॉइंट पर तर्क में 80% दम है, क्योंकि कोर्ट का समर्थन है, लेकिन नियामक कमजोरियां बाकी हैं.

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पॉइंट 3: पर्यावरणीय प्रभाव पर जांच

पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए सरकार का दावा है कि यह फैसला इकोलॉजी को मजबूत करता है. यादव ने 'अरावली ग्रीन वॉल' प्रोजेक्ट का जिक्र किया, जो 700 किमी क्षेत्र में वनीकरण करेगा, बायोडायवर्सिटी बढ़ाएगा, और जल संरक्षण करेगा. उन्होंने कहा कि अवैध खनन रोकने से प्रदूषण कम होगा, और सस्टेनेबल माइनिंग से आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरण संतुलन बनेगा.

कितना दम?

सकारात्मक प्रभाव संभव हैं, जैसे डेजर्टिफिकेशन रोकना और ग्राउंडवाटर रिचार्ज. लेकिन आलोचनाएं मजबूत हैं: नई परिभाषा से 90% क्षेत्र (खासकर राजस्थान में) असुरक्षित हो जाएगा, जिससे खनन बढ़ेगा, वन्यजीव निवास सिकुड़ेंगे, और मानव-पशु संघर्ष बढ़ेगा.

दिल्ली-एनसीआर में धूल प्रदूषण, जल संकट और चरम मौसम बढ़ेगा. प्रति हेक्टेयर 2 मिलियन लीटर जल रिचार्ज का नुकसान हो सकता है. यादव की सफाई है कि 'पूरी पहाड़ी कवर' है, पर्यावरणीय रूप से कमजोर लगती है क्योंकि निचले क्षेत्र इकोसिस्टम का हिस्सा हैं. कुल मिलाकर यादव की बातें सैद्धांतिक रूप से अच्छी हैं, लेकिन व्यावहारिक प्रभाव नकारात्मक लगते हैं.

पॉइंट 4: क्रियान्वयन की संभावना और ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर जांच

सरकार का तर्क क्रियान्वयन पर टिका है. MPSM और ICFRE की मंजूरी से सख्ती बरती जाएगी. यादव ने कहा कि अवैध खनन पर रोक लगेगी, और ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट (जिसमें 1 मिलियन हेक्टेयर रिस्टोरेशन शामिल) इसका प्रमाण है.

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कितना वाजिब?

ऐतिहासिक रिकॉर्ड कमजोर है  कि 2018 की रिपोर्ट में अवैध खनन से 31 पहाड़ियां गायब हो गईं. कोर्ट ने कई बार हस्तक्षेप किया, लेकिन प्रवर्तन कमजोर रहा. अगर राज्य सरकारें (जैसे हरियाणा) रियल एस्टेट लॉबी से प्रभावित हैं, तो क्रियान्वयन असफल हो सकता है. यादव की सफाई आशावादी है, लेकिन बिना मजबूत मॉनिटरिंग के खोखली लगती है. इस पॉइंट में दम  है पर इतिहास संदेह पैदा करता है.

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