कांग्रेस 2027 की जनगणना में जातिगत गणना को बीजेपी के खिलाफ बड़ा हथियार बना रही है, पर कर्नाटक में उसे अपनी ही सरकार से मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य सरकार पर दबाव डालते हुए मांग की है कि कर्नाटक की जातिगत सर्वे रिपोर्ट तुरंत लागू हो और दलितों, पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यकों का आरक्षण बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया जाए. यह मांग मई में सीएम पद डीके शिवकुमार को सौंपने के बाद आई, जिससे शिवकुमार सरकार असहज स्थिति में फंस गई है.
कांग्रेस का तर्क है कि आरक्षण, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के बंटवारे का फैसला लेने से पहले हर समुदाय की सही संख्या पता होनी चाहिए. आजादी के बाद पहली बार 2027 की जनगणना में एससी-एसटी के अलावा बाकी जातियों की भी गिनती होगी.
कांग्रेस का आरोप है कि जनगणना फॉर्म में ओबीसी श्रेणी न रखना एक बड़ी साजिश है, ताकि सही ओबीसी आबादी सामने न आ सके. राहुल गांधी और कांग्रेस इसे संस्थानों में भागीदारी और संसाधनों की उपलब्धता से जोड़ते रहे हैं.
कर्नाटक में कांग्रेस को नवंबर 2025 से तैयार अपनी सर्वे रिपोर्ट लागू करने में हिचकिचाहट है. यह रिपोर्ट 2024 में पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष जयप्रकाश हेगड़े ने सिद्धारमैया को सौंपी थी. सिद्धारमैया ने 6 सितंबर को बेंगलुरु में पिछड़ा वर्ग महासंघ के रजत जयंती समारोह में कहा कि सामाजिक न्याय के लिए कम से कम 75 प्रतिशत आरक्षण जरूरी है, और लोकसभा तथा विधानसभाओं में भी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
यह भी पढ़ें: मैंगलोर: पद्मश्री हरेकला हजब्बा को जारी SIR नोटिस वापस, अधिकारियों ने गलती मानकर मांगी माफी
कर्नाटक में जातिगत सर्वे का इतिहास पुराना है. 2015 में सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में एच कांथाराज की अगुवाई में सर्वे हुआ, 2017 में पूरा हुआ, पर लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के विरोध से सदन में पेश नहीं हुआ. 2023 में सिद्धारमैया दोबारा मुख्यमंत्री बने तो मुद्दा फिर उठा, 2025 में पुरानी रिपोर्ट स्वीकार करने की कोशिश हुई, पर डेटा पुराना होने पर सवाल उठे और नया सर्वे कराया गया.
सिद्धारमैया चुनावी राजनीति से संन्यास ले चुके हैं, फिर भी उनका यह कदम उत्तराधिकारी शिवकुमार की सरकार के लिए राजनीतिक बदले जैसा माना जा रहा है. सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से हैं और अहिंडा गठबंधन का चेहरा माने जाते हैं, जबकि शिवकुमार प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से हैं. कांग्रेस के लिए यह मांग नकारना आसान नहीं, क्योंकि इससे पार्टी की राष्ट्रीय नीति पर सवाल उठेंगे, पर रिपोर्ट लागू करना भी आसान नहीं, क्योंकि कई ताकतवर समुदाय इससे प्रभावित होंगे.
अविनाश कटील