मोजा पुराना होता है, धीरे-धीरे घिसता है और एक दिन एड़ी या अंगूठे के पास छेद हो जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मोजे का वह कपड़ा आखिर गया कहां? छेद तो दिखता है, लेकिन फटा हुआ कपड़ा आसपास नजर नहीं आता.
असल में मोजे का कपड़ा अचानक गायब नहीं होता. चलते समय पैर, मोजे और जूते के बीच लगातार घर्षण होता है. सबसे ज्यादा रगड़ एड़ी, पंजे और अंगूठे वाले हिस्से में पड़ती है. इससे मोजे के बेहद छोटे फाइबर धीरे-धीरे टूटने लगते हैं.
धागे टूटते हैं, कपड़ा पतला होता जाता है
मोजा कई छोटे-छोटे फाइबर से बने धागों से तैयार होता है. लगातार रगड़ से ये फाइबर कमजोर पड़ते हैं. कुछ बाहर निकलकर छोटे-छोटे रोएं या गोलियां बना लेते हैं, जिन्हें pilling कहा जाता है.
बाकी फाइबर टूटकर अलग हो जाते हैं. यही वजह है कि मोजे का कपड़ा धीरे-धीरे पतला होता जाता है. एक समय के बाद वहां इतने कम फाइबर बचते हैं कि जाली जैसी संरचना टूट जाती है और छेद बन जाता है.
फिर ये रेशे जाते कहां हैं?
मोजे से निकलने वाले सभी रेशे आपको दिखाई नहीं देते. कुछ मोजे या दूसरे कपड़ों पर लिंट की तरह चिपक जाते हैं. कुछ धुलाई के दौरान निकल जाते हैं. कई बेहद छोटे फाइबर इतने बारीक होते हैं कि आंखों से अलग पहचानना मुश्किल होता है.
यानी मोजे का कपड़ा किसी एक जगह जाकर जमा नहीं होता. उसका कुछ हिस्सा छोटे-छोटे रेशों में टूटकर बिखर जाता है.
एड़ी और अंगूठे पर ही छेद क्यों?
क्योंकि इन्हीं हिस्सों पर जूते के अंदर सबसे ज्यादा दबाव और रगड़ पड़ती है. हर कदम के साथ यही प्रक्रिया दोहरती है. इसलिए बाकी मोजा ठीक दिख सकता है, लेकिन एड़ी या अंगूठे के पास कपड़ा पहले कमजोर पड़ता है.तो अगली बार मोजे में छेद दिखे तो समझिए- कपड़ा गायब नहीं हुआ, वह धीरे-धीरे घिसकर बेहद छोटे रेशों में बदल गया.
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