बैन है, फिर भी रिकॉर्ड खेती! तालिबान में नियम तोड़कर इतनी अफीम क्यों उगा रहे लोग?

तालिबान में अफीम की खेती इतनी ज्यादा हो गई है, उसने कुछ सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. खास बात ये है कि अभी तालिबान में अफीम की खेती पर बैन है, फिर भी इतनी खेती हो रही है.

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तालिबान में अफीम की खेती में काफी बढ़ावा हुआ है. (Photo: Pexels) तालिबान में अफीम की खेती में काफी बढ़ावा हुआ है. (Photo: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 3:48 PM IST

तालिबान की सरकार वाले अफगानिस्तान में अफीम की खेती करना गैरकानूनी है. तालिबान ने इसके उत्पादन और कारोबार पर प्रतिबंध लगा रखा है. फिर भी अफगानिस्तान में अफीम की खेती तेजी से बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, एक साल में ही अफीम की खेती का रकबा चार गुना से ज्यादा हो गया है. सवाल है कि तालिबान की सख्ती के बावजूद किसान आखिर अफीम क्यों उगा रहे हैं? आखिर क्यों कड़ी सजा वाले नियमों के बाद भी लोग अफीम उगा रहे हैं... 

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एक साल में चार गुना से ज्यादा बढ़ी खेती

संयुक्त राष्ट्र के ड्रग्स एंड क्राइम ऑफिस (UNODC) ने 29 अक्टूबर 2026 को अफगानिस्तान में अफीम की खेती को लेकर अपनी नई रिपोर्ट जारी की. इसके मुताबिक, 2025 में जहां करीब 10,200 हेक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती हुई थी, वहीं 2026 में यह बढ़कर 43,300 हेक्टेयर हो गई. यानी खेती का रकबा करीब 325 फीसदी बढ़ गया. अफीम का उत्पादन भी करीब पांच गुना बढ़ गया. 2025 में इसका उत्पादन लगभग 296 टन था, जो 2026 में बढ़कर करीब 1,500 टन पहुंच गया. 

तालिबान के बैन के बावजूद क्यों उगा रहे अफीम?

इसकी सबसे बड़ी वजह किसानों की आर्थिक मजबूरी है. अफगानिस्तान के कई इलाकों में सूखे और पानी की कमी ने खेती को मुश्किल बना दिया है. गेहूं जैसी फसलों से किसानों को इतनी कमाई नहीं हो रही कि परिवार का खर्च चल सके. वहीं अफीम की खेती से उन्हें ज्यादा पैसा मिलता है. UNODC के पुराने आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में एक हेक्टेयर गेहूं से करीब 770 डॉलर की कमाई हुई थी, जबकि अफीम की खेती से करीब 10 हजार डॉलर तक मिल सकते थे. यानी कमाई का अंतर बहुत बड़ा है.

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रॉयटर्स की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट में भी किसानों ने बताया कि गेहूं से लागत निकालना मुश्किल हो रहा है. कपास की कीमतों में गिरावट और सूखे ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है. ऐसे में कुछ किसान जोखिम उठाकर फिर से अफीम उगा रहे हैं. हाल ही में डीडब्ल्यू ने एक रिपोर्ट में बताया है कि तालिबान के अफीम पर प्रतिबंध लगाने से किसानों की कमाई इतनी घट गई कि उनके बच्चे कुपोषण का शिकार होने लगे. 

किसानों की हालत ये है कि पहले अफीम की एक फसल से परिवार का पूरे साल का खर्च निकल जाता था. अब वे गेहूं और कपास उगाते हैं. इन फसलों को बेचकर भी परिवार का गुजारा मुश्किल हो रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने अक्टूबर 2026 में चेतावनी दी थी कि अफगानिस्तान के 34 में से 10 प्रांतों में बच्चों में कुपोषण का स्तर गंभीर है. आशंका जताई गई कि 2027 तक ऐसे प्रांतों की संख्या बढ़कर 14 हो सकती है.

अब सवाल है कि आखिर वो इस खेती को छुपाते कैसे हैं...

रिपोर्ट्स के अनुसार, किसान अफीम की फसल को अनाज के खेतों के बीच और चारदीवारी वाले परिसरों में छिपाकर उगा रहे हैं. इस बार अफीम की खेती 34 में से 16 प्रांतों में दर्ज की गई. पूर्वोत्तर अफगानिस्तान का बदख्शां प्रांत इसका प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है. 

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हालांकि, तालिबान सरकार इन आंकड़ों से सहमत नहीं है. उसके गृह मंत्रालय का कहना है कि 2026 में 26 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर नशीली फसलों को नष्ट किया गया. वहीं UNODC का अनुमान है कि अफीम की खेती का रकबा 43,300 हेक्टेयर रहा. 
 

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