Psychology Facts: जो लोग हर बात पर ‘ठीक है’ बोलते हैं, वे कैसे होते हैं?

Psychology Facts: कुछ लोग बातचीत में लगभग हर बात का जवाब सिर्फ ‘ठीक है’ कहकर देते हैं. साइकोलॉजी के मुताबिक, इसके पीछे टकराव से बचने की आदत, अपनी भावनाएं खुलकर न बता पाना, दूसरों को खुश रखने की कोशिश या सिर्फ कम बोलने की पर्सनैलिटी हो सकती है. 

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सिर्फ ठीक है कहने की आदत के आधार पर किसी व्यक्ति की पर्सनैलिटी का पता नहीं लगाया जा सकता. ( Photo: ITG) सिर्फ ठीक है कहने की आदत के आधार पर किसी व्यक्ति की पर्सनैलिटी का पता नहीं लगाया जा सकता. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 2:39 PM IST

किसी से बात करते समय आपने अक्सर ऐसे लोगों को देखा होगा, जो लगभग हर बात के जवाब में सिर्फ 'ठीक है' कह देते हैं. आप उनसे कोई सुझाव मांगें, अपनी परेशानी बताएं या किसी बात पर बहस करें, उनका जवाब अक्सर एक ही होता है-'ठीक है.' पहली नजर में यह आदत सामान्य लग सकती है, लेकिन कई बार किसी व्यक्ति का बार-बार ऐसा जवाब देना उसकी सोच, बातचीत के तरीके और भावनाओं से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, सिर्फ ठीक है कहने की आदत के आधार पर किसी व्यक्ति की पर्सनैलिटी या मेंटल हेल्थ के बारे में पक्का पता नहीं किया जा सकता है. 

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कुछ लोग बहस या विवाद से बचने के लिए सामने वाले की बात तुरंत मान लेते हैं. उन्हें लगता है कि अपनी बात रखने से बातचीत लंबी होगी या माहौल खराब हो सकता है. इसलिए वे बहस करने के बजाय ठीक है कहकर बात खत्म करना पसंद करते हैं. साइकोलॉजी में इसे कॉन्फ्लिक्ट अवॉइडेंस (Conflict Avoidance) कहते हैं. आसान भाषा में कहें तो टकराव से बचने के कई लोग ठीक है कह तो देते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि सामने वाले की बात से पूरी तरह सहमत हों. कई बार वे सिर्फ शांति बनाए रखना चाहते हैं.

कुछ लोग अपनी भावनाएं खुलकर नहीं बताते
साइकोलॉजिस्ट आन्या बंसल कहती हैं कि कुछ व्यक्तियों के लिए अपनी नाराजगी, दुख या असहमति को शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता. वे सामने वाले को यह नहीं बता पाते कि उन्हें किसी बात से बुरा लगा है. ऐसे में 'ठीक है' उनके लिए बातचीत खत्म करने का आसान तरीका बन सकता है. यानी शब्द छोटा है, लेकिन उसके पीछे कई अलग-अलग भावनाएं हो सकती हैं. हमेशा दूसरों को खुश रखने की कोशिश भी एक कारण हो सकती है. कुछ लोग अपने आसपास के लोगों को नाराज करने से बहुत बचते हैं. वे सामने वाले की जरूरतों और भावनाओं को अपनी जरूरतों से ऊपर रख देते हैं.

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उदाहरण के लिए, दोस्त कहीं घूमने जाने का फैसला करे और व्यक्ति खुद वहां जाना न चाहता हो, फिर भी वह कह दे-ठीक है, चलो. यह व्यवहार पीपल  'प्लीजिंग' (Pleasing)   से जुड़ा हो सकता है. हालांकि, हर बार ठीक है कहने वाले व्यक्ति को पीपल प्लीज़र' (People Pleaser)  मान लेना सही नहीं होगा. इसके लिए उसके पूरे व्यवहार और परिस्थितियों को देखना जरूरी है.

हर 'ठीक है' के पीछे कोई गहरी साइकोलॉजी हो, ऐसा जरूरी नहीं है. कई लोग कम शब्दों में बात करना पसंद करते हैं. उन्हें लंबी बातचीत पसंद नहीं होती और वे छोटे जवाब देकर बातचीत को आगे बढ़ाते हैं. ऐसे व्यक्ति के लिए “ठीक है” सिर्फ एक सामान्य प्रतिक्रिया हो सकती है. इसलिए किसी की पर्सनैलिटी को केवल एक शब्द या एक आदत के आधार पर जज करना ठीक नहीं है.

जब व्यक्ति अंदर से परेशान हो
कभी-कभी कोई व्यक्ति इतना थका हुआ या परेशान होता है कि उसके पास किसी बात पर चर्चा करने की एनर्जी नहीं होती. ऐसे समय में वह 'ठीक है',  हां, चलो ठीक है जैसे छोटे जवाब देने लगता है. यह जरूरी नहीं कि वह सामने वाले से नाराज हो. हो सकता है कि वह उस समय बातचीत करने की स्थिति में ही न हो. इसीलिए अगर किसी करीबी व्यक्ति के जवाब अचानक बहुत छोटे हो गए हैं, तो सिर्फ यह मान लेना कि वह इग्नोर कर रहा है, सही नहीं होगा. उसके व्यवहार में आए दूसरे बदलावों को भी देखना चाहिए.

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रिसर्च क्या कहती है?
बातचीत और मनोविज्ञान से जुड़ी रिसर्च यह बताती है कि इंसान बातचीत में केवल शब्दों के जरिए ही अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करता. बोलने का तरीका, आवाज का उतार-चढ़ाव, बातचीत का संदर्भ, समय और बातचीत का पूरा तरीका भी बहुत महत्वपूर्ण होता है. किसी व्यक्ति के छोटे या अस्पष्ट जवाब का मतलब परिस्थिति के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है. ‘ठीक है’ कहना सहमति जताने, बातचीत खत्म करने, किसी बात को स्वीकार करने या सिर्फ सामने वाले की बात सुन लेने का संकेत भी हो सकता है.

इसी तरह, लोगों के व्यवहार पर हुई मनोवैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि कुछ लोग सामाजिक विवाद से बचने के लिए अपनी असली पसंद और असहमति को खुलकर सामने नहीं रखते. ऐसे लोग कई बार अपनी बात कहने के बजाय सामने वाले की बात मान लेते हैं, ताकि बहस न हो या किसी को बुरा न लगे. हालांकि, हर व्यक्ति के मामले में ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है.

इसलिए रिसर्च के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि जो लोग हर बात पर ‘ठीक है’ कहते हैं, वे अंदर से दुखी होते हैं या वे कमजोर व्यक्तित्व के होते हैं. ऐसा कहना किसी व्यक्ति के व्यवहार को बहुत ज्यादा सामान्य मान लेना होगा. इसके लिए केवल उसके शब्दों पर ध्यान देने के बजाय उसके दूसरे व्यवहार को भी देखना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति पहले काफी खुलकर बात करता था, लेकिन अब लगातार छोटे जवाब देने लगा है, बातचीत से बच रहा है, जल्दी चिड़चिड़ा हो जाता है या अपनी भावनाएं शेयर नहीं करता, तो उससे शांत तरीके से बात करना बेहतर होता है.

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आप उससे सीधे पूछ सकते हैं- तुम सच में ठीक हो या बस बात खत्म करने के लिए ठीक है कह रहे हो? कई बार ऐसा सवाल सामने वाले व्यक्ति को अपनी असली भावना बताने का मौका देता है. हो सकता है कि वह किसी बात से परेशान हो, लेकिन खुद से उसे बताने की शुरुआत न कर पा रहा हो. हर बात पर ‘ठीक है’ कहने वाले व्यक्ति के व्यवहार को समझने के लिए उसकी पूरी बातचीत और आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. यह आदत कभी शांति पसंद करने, कभी बहस से बचने, कभी दूसरों को खुश रखने और कभी कम बोलने वाले स्वभाव से जुड़ी हो सकती है.

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