भारतीय जनता पार्टी के कोर एजेंडे में राम मंदिर और आर्टिकल 370 के बाद तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा 'समान नागरिक संहिता' (UCC) रहा है. देश में पीएम मोदी के अगुवाई में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद राम मंदिर बनकर तैयार हो गया और जम्मू-कश्मीर से 370 समाप्त कर दिया गया. इसके बाद माना जा रहा था कि बीजेपी अपने कोर एजेंडे यूसीसी को लेकर कानूनी अमलीजामा पहनाने का काम करेगी राजनीति और रणनीति के बिसात पर बीजेपी ने अपना दांव बदल दिया है.
बीजेपी ने यूसीसी के लिए संसद के बजाय अब राज्य स्तर पर कानून लाने की रणनीति बनाई. इसके तहत उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद अब पश्चिम बंगाल जैसे बीजेपी शासित राज्य एक-एक करके अपने स्तर पर यूसीसी कानून ला रहे हैं. बंगाल के बाद बीजेपी महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में यूसीसी को कानूनी अमलीजामा पहनाने का काम करेगी.
सवाल उठता है कि जब बीजेपी लक्ष्य 'एक देश, एक कानून' का है, तो फिर पार्टी राज्य दर राज्य यह टुकड़ों में दांव क्यों खेल रही है? इसके पीछे बीजेपी की रणनीति क्या है और इसके राज्य स्तर पर क्या नफा-नुकसान हैं?
यूसीसी पर बीजेपी का सियासी स्टैंड
जनसंघ के जमाने से देश में समान नगारिक संहिता को लागू करना बीजेपी का बुनियादी एजेंडा रहा है. बीजेपी राम मंदिर, धारा 370 औैर यूसीसी जैसे वैचारिक मुद्दे को लेकर सियासत में आगे बढ़ी थी. इसमें राम मंदिर और 370 के हटाने का सपना साकार हो चुका है. बीजेपी ने यूसीसी को कानूनी अमलीजामा पहनाने की प्लानिंग अलग बनाई है. यूसीसी के लिए बीजेपी संसद के रास्ते के बजाय विधानसभा के जरिए आगे बढ़ रही है.
समान नागरिक संहिता का मतलब है कि देश में रहने वाले सभी नागरिकों (हर धर्म, जाति, लिंग के लोग) के लिए एक ही कानून होना. किसी राज्य में सिविल कोड लागू होता है तो विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे तमाम विषयों में हर नागरिकों के लिए एक सा कानून होगा. अभी तक मुस्लिम धर्म के लोगों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ है, जिसके तहत अपने शादी, तलाक, संपत्ति के बंटवारे का फैसला करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट भी कई बार इस दिशा में कदम उठाने के लिए सरकार को कह चुकी है. पीएम मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तक सामान नागरिक संहिता लागू करने के संकेत दे चुके हैं, लेकिन बीजेपी ने केंद्रीय कानून के बजाय राज्य स्तर पर यूसीसी को अमीलजामा पहनाने का काम कर ही है. इस दिशा में सबसे पहले उत्तराखंड में यूसीसी को लाने का काम किया गया. अमित शाह ने साफ शब्दों में कहा था कि उत्तराखंड की तर्ज पर बीजेपी शासित राज्यों में यूसीसी को लागू करेंगे.
उत्तराखंड से असम तक यूसीसी लागू
गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आज़ादी के समय से ही समान नागरिक संहिता लागू है. इसे 'गोवा सिविल कोड' कहा जाता है. गोवा में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह, तलाक और संपत्ति बंटवारे को लेकर एक जैसे कानून हैं. बीजेपी ने साल 2025 में उत्तराखंड को यूसीसी के लिए सियासी प्रयोगशाला बनाने का काम किया.
आजाद भारत में विधानसभा के जरिए नया यूसीसी कानून बनाने और उसे जमीन पर पूरी तरह लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना है. उत्तराखंड सरकार ने जनवरी 2025 में इसकी नियमावली को कैबिनेट से मंजूरी देकर इसे राज्य में पूरी तरह प्रभावी कर दिया. गोवा के बाद बीजेपी ने 'राज्य दर राज्य' इस यूसीसी कानून को मंजूरी दी.
उत्तराखंड के बाद बीजेपी शासित राज्य गुजरात में यूसीसी कानून लाया गया. मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा ने 'गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक 2026' को बहुमत से पारित कर लागू किया. असम में इसी साल मई में यूसीसी कानून लाया गया है. इसके साथ ही असम यूसीसी बिल पास करने वाला तीसरा राज्य और पूर्वोत्तर का पहला राज्य बन गया है. असम में आदिवासी समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की ओर से विधानसभा में इस पर कदम उठाने की सुगबुगाहट तेज है, जबकि बिहार जैसे राज्यों में भी इसे लेकर राजनीतिक चर्चाएं और ड्राफ्टिंग की प्रक्रियाएं पाइपलाइन में हैं. महाराष्ट्र सरकार ने भी यूसीसी के अध्ययन के लिए रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक समिति बनाने का फैसला किया है. इसके अलावा मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार भी यूसीसी कानून लाने की तैयारी में है.
बीजेपी की 'स्टेट बाय स्टेट' रणनीति
यूसीसी को केंद्रीय स्तर पर लागू करने के बाद बीजेपी राज्य स्तर पर लाने की रणनीति बनाई है. यूसीसी बीजेपी के एजेंडा है जरूर है, लेकिन एनडीए के कई दल उस पर सहमत नहीं है. जेडीयू से लेकर टीडीपी और चिराग पासवान की पार्टी भी राजमंद नहीं है. 202में जिस तरह से बीजेपी को बहुमत से कम सांसद जीतकर आए हैं, उसके चलते यूसीसी के बिल को संसद से पास कराना आसान नहीं है.
यूसीसी को पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत है, जिस पर एक देश एक चुनाव से जुड़े हुए विधेयक में है. मुस्लिम वोटों की सियासी मजबूरी को देखते हुए जेडीयू और टीडीपी इस मुद्दे पर बीजेपी का साथ देना मुश्किल है. यही वजह है कि बीजेपी संसद के बजाय विधानसभा का रूट पकड़ रही है. बीजेपी की यह रणनीति का हिस्सा है.
केंद्र स्तर पर सीधे कानून लाने का मतलब है पूरे देश के विपक्ष और क्षेत्रीय दलों सहित कई धार्मिक-सामाजिक संगठनों से एक साथ मोर्चा लेना. इसके अलावा, बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन में शामिल कई दल विशेषकर पूर्वोत्तर के राज्य में यूसीसी के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं. केंद्र में नया कानून लाने से गठबंधन सरकार पर दबाव बढ़ सकता था, जबकि राज्यों के जरिए जाने पर केंद्र की सरकार सुरक्षित रहती हैय
भारत विविधताओं का देश है। पूर्वोत्तर और मध्य भारत के राज्यों में आदिवासियों की अपनी अनूठी परंपराएं और प्रथाएं हैं. केंद्र एक कानून बनाता, तो सभी राज्यों के आदिवासियों के लिए अपवाद तय करना बेहद जटिल हो जाता. राज्यों को आगे करने से फायदा यह है कि हर राज्य अपनी डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) के हिसाब से कानून का मसौदा तैयार कर रहा है. जैसे उत्तराखंड और असम ने आदिवासियों को इस कानून से बाहर रखा है, जिससे देशव्यापी आदिवासी आंदोलन की धार कुंद हो गई.
'प्रयोगशाला' मॉडल और कानूनी ढाल
संविधान की समवर्ती सूची में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय आते हैं, जिसका मतलब है कि राज्य भी इस पर कानून बना सकते हैं. बीजेपी पहले कुछ राज्यों को 'प्रयोगशाला' की तरह इस्तेमाल कर रही है. उत्तराखंड के मॉडल को देखकर यह परखा जा रहा है कि जमीन पर इसके क्या कानूनी और सामाजिक प्रभाव पड़ रहे हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती भी दी जाती है, तो राज्य का कानून होने के कारण केंद्र सरकार सीधे निशाने पर नहीं आती.
राज्य स्तर पर रणनीति का नफा-नुकसान
बीजेपी के इस 'क्रमिक रोलआउट' के राज्य स्तर पर गहरे राजनीतिक और सामाजिक नफा-नुकसान है. चुनावी ध्रुवीकरण और कोर वोटर को संदेश देने की रणनीति है. विधानसभा चुनावों से ठीक पहले या बाद में यूसीसी लागू करने से बीजेपी अपने कोर वोट बैंक को यह संदेश देने में कामयाब रहती है कि वह अपने वादों पर अडिग है। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में यूसीसी बिल पेश करने का कदम इसका ताजा उदाहरण है, जहां पार्टी बहुसंख्यक आबादी के बीच ध्रुवीकरण को मजबूत करना चाहती हैय.
लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, बहुविवाह पर रोक, और पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हक जैसे प्रावधानों के जरिए बीजेपी महिला वोटर्स, खासकर मुस्लिम महिलाओं के एक वर्ग के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है. राज्य स्तर पर कानून लाने से विपक्षी दल (जैसे टीएमसी या कांग्रेस) धर्मसंकट में आ जाते हैं। यदि वे खुलकर विरोध करते हैं, तो उन पर तुष्टीकरण का आरोप लगता है; यदि समर्थन करते हैं, तो उनका अल्पसंख्यक वोट बैंक खिसकने का डर रहता है।
वहीं, अलग-अलग राज्यों के अपने-अपने यूसीसी कानून होने से 'समानता' का मूल विचार ही खतरे में पड़ सकता है. उदाहरण के लिए, यदि उत्तराखंड में लिव-इन पार्टनरशिप का रजिस्ट्रेशन न कराने पर जेल का प्रावधान है, और किसी दूसरे राज्य में ऐसा नहीं है, तो नागरिकों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होगी. एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले नागरिकों के लिए यह समझना मुश्किल होगा कि उन पर किस राज्य का पर्सनल लॉ लागू हो रहा है, खासकर तब जब संपत्ति या शादी का मामला दो अलग-अलग राज्यों से जुड़ा हो.
बीजेपी की 'टुकड़ों-टुकड़ों' में यूसीसी लाने की रणनीति कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सियासी चाल है। यह केंद्र को विवादों से दूर रखते हुए राज्यों में राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एजेंडे की धार तेज करने का मौका देती है. हालांकि, 'एक देश, एक विधान' का सपना तब तक अधूरा ही रहेगा जब तक कि इन अलग-अलग राज्यों के कानूनों में एकरूपता नहीं आतीय. बीजेपी के लिए यह रणनीति चुनावी लिहाज से 'लो रिस्क, हाई रिवॉर्ड' (कम जोखिम, ज्यादा फायदा) साबित हो रही है.
कुबूल अहमद