बीजेपी के कोर एजेंडे में शुरू से ही राम मंदिर, आर्टिकल 370 और 'समान नागरिक संहिता' (UCC) रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद अयोध्या में राम मंदिर बनकर तैयार हो गया और जम्मू-कश्मीर से 370 की समाप्ति के बाद मोदी सरकार ने अपने कोर एजेंडे यूसीसी को कानूनी अमलीजामा पहनाने की रणनीति पर अपने कदम बढ़ा दिए हैं. बीजेपी ने यूसीसी के लिए संसद के बजाय अब राज्य स्तर पर कानून लाने की रणनीति बनाई है और इसे बीजेपी शासित राज्यों में पूरी तरह लागू करने का ऐलान कर दिया है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया है कि 2029 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में 'समान नागरिक संहिता' लागू कर दी जाएगी. बीजेपी के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और जीतन राम मांझी की हम (HAM) अमित शाह के रुख के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन नीतीश कुमार की जेडीयू ने अपना अलग स्टैंड लिया है.
जेडीयू ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार में इस तरह के किसी भी कदम की वह अनुमति नहीं देगी. ऐसे में सवाल उठता है कि यूसीसी के संवेदनशील मुद्दे पर एनडीए के बाकी सहयोगियों के मुकाबले जेडीयू अलग स्टैंड क्यों ले रही है और इसके पीछे क्या सियासी वजहें हैं?
यूसीसी पर बीजेपी का स्टेट रूट प्लान
समान नागरिक संहिता का मतलब है कि देश में रहने वाले सभी नागरिकों (हर धर्म, जाति, लिंग के लोग) के लिए एक ही कानून होना। जनसंघ के दौर से देश में समान नागरिक संहिता को लागू करना बीजेपी का बुनियादी एजेंडा रहा है. यूसीसी के लिए बीजेपी ने संसद के रास्ते के बजाय विधानसभा यानी राज्य स्तर पर कानून लाने की रणनीति बनाई.
उत्तराखंड, गुजरात, असम, मध्य प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे बीजेपी शासित राज्यों में यूसीसी कानून लाया जा रहा है. इसी कड़ी में अमित शाह ने कहा है कि बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यूसीसी को लागू किया जाएगा. ये 21 वे राज्य हैं, जहां बीजेपी या फिर उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं.
बीजेपी अपने दम पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखंड, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुरा, मणिपुर और दिल्ली में सरकार चला रही है. इसके अलावा बिहार, अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, सिक्किम और मिजोरम में बीजेपी गठबंधन या एनडीए समर्थित सरकारें हैं.
आंध्र प्रदेश में टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली सरकार में जनसेना और बीजेपी शामिल हैं, तो बिहार में जेडीयू के समर्थन से बीजेपी की सरकार चल रही है. महाराष्ट्र में बीजेपी शिवसेना और एनसीपी के साथ सत्ता में है. शिवसेना, जेडीयू और टीडीपी के समर्थन से केंद्र में मोदी सरकार चल रही है. बीजेपी जिन राज्यों में अपने दम पर सरकार चला रही है, वहां पर आसानी से यूसीसी ले आएगी, लेकिन बाकी राज्यों में पेच फंस सकता है. खासकर बिहार में बीजेपी कैसे यूसीसी लेकर आएगी?
यूसीसी पर एनडीए सहयोगियों का स्टैंड क्या है?
यूनिफॉर्म सिविल कोड पर एनडीए के भीतर स्पष्ट विभाजन और सहमतियां दोनों देखने को मिल रही हैं. बालासाहेब ठाकरे की हिंदुत्ववादी विचारधारा से जुड़ी एकनाथ शिंदे की शिवसेना शुरू से ही समान नागरिक संहिता की समर्थक रही है. शिंदे गुट इसे धारा 370 और राम मंदिर की तरह एक जरूरी कदम मानता है. शिंदे ने यूसीसी मुद्दे पर शाह का समर्थन करते हुए कहा कि शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने समान कानून की परिकल्पना की थी.
आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी ने यूसीसी पर अपना रुख लचीला रखा है. टीडीपी का मानना है कि राज्य के विकास और केंद्र के साथ बेहतर तालमेल के लिए वह व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों पर बीजेपी के रुख का समर्थन करने को तैयार है, बशर्ते अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों से कोई बड़ा समझौता न हो. हालांकि, उसने यह भी कहा कि यूसीसी देश की एकता को मजबूत करता है और इसमें लिंग आधारित भेदभाव नहीं है.
बिहार में एनडीए के सहयोगी दलों की राय यूसीसी पर बंटी हुई है. हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने राष्ट्रीय सुरक्षा और एक देश-एक कानून के विचार का हवाला देकर अमित शाह के बयान का समर्थन किया, लेकिन जेडीयू का स्टैंड अलग है. जेडीयू नेता और बिहार सरकार में मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि जेडीयू यूसीसी बिल का अध्ययन करेगी और यदि इसके प्रावधान अस्वीकार्य नहीं हैं तो बिना कारण इसका विरोध नहीं करेगी.
जेडीयू क्यों ले रही बीजेपी से अलग स्टैंड?
नीतीश कुमार की जेडीयू का यूसीसी पर रुख शुरू से ही 'सर्वसम्मति और परामर्श' का रहा है. जेडीयू इसके सीधे विरोध में पूरी तरह खड़े होने के बजाय एक सतर्क और तटस्थ रुख अपना रही है, लेकिन पार्टी नेता श्याम रजक ने साफ कहा कि उनके नेता (नीतीश कुमार) ने साफ तौर पर यह कहा था कि बिहार में यूसीसी को लागू नहीं होने देंगे और हम इस पर कायम हैं.
बिहार में लगभग 17 फीसदी मुस्लिम आबादी है. जेडीयू का पारंपरिक वोट बैंक केवल कुर्मी-कोयरी (लव-कुश) या अति पिछड़ा (EBC) तक सीमित नहीं है, बल्कि नीतीश कुमार ने 'पसमांदा मुसलमानों' और 'महिला वोटरों' को भी अपने साथ मजबूती से जोड़े रखा है. UCC का सीधा समर्थन करने से उनका पसमांदा मुस्लिम आधार खिसक सकता है और मुस्लिम समुदाय की नाराजगी बढ़ सकती है. इसीलिए जेडीयू खुलकर साथ देने से परहेज कर रही है, क्योंकि मुस्लिम समुदाय यूसीसी को लागू करने के खिलाफ है.
जेडीयू का कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को किसी एक समुदाय पर थोपने के बजाय सभी पक्षों से बातचीत के जरिए लागू किया जाना चाहिए. जेडीयू पहले भी विधि आयोग को लिखे अपने पत्र में यह साफ कर चुकी है कि भारत विविधताओं का देश है, इसलिए धार्मिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखना बेहद जरूरी है.
नीतीश कुमार भले ही बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चला रहे हों, लेकिन अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि से वे कोई समझौता नहीं करना चाहते. विपक्षी दल अक्सर नीतीश पर बीजेपी के वैचारिक एजेंडे के सामने झुकने का आरोप लगाते हैं. ऐसे में अलग स्टैंड लेकर जेडीयू यह संदेश देना चाहती है कि वह एनडीए में रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र विचारधारा बनाए हुए है.
बीजेपी के सामने कितना रुक पाएगा जेडीयू का विरोध?
अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि बीजेपी अपने वैचारिक संकल्पों से पीछे नहीं हटेगी और UCC देश की प्रगति के लिए जरूरी है. ऐसे में जेडीयू का विरोध कितना टिक पाएगा? इससे पहले सीएए, ट्रिपल तलाक और अनुच्छेद 370 जैसे कई ऐसे मामले रहे हैं जिन पर जेडीयू ने पहले तो यह स्टैंड लिया कि वह इसका समर्थन नहीं करेगी, लेकिन बाद में नीतीश कुमार ने इन सभी मुद्दों पर समझौता कर लिया.
हालांकि, नीतीश कुमार यह जताने-बताने की कोशिश करते रहे हैं कि वह बीजेपी के साथ सरकार बनाने के बावजूद उसके ऐसे मुद्दों पर साथ नहीं हैं, जिनसे उनकी सेक्युलर छवि को नुकसान पहुंचे. यही नहीं, जब वक्फ संशोधन बिल का मुस्लिम समुदाय ने भारी विरोध किया, तब भी नीतीश कुमार ने बीजेपी की नीति का समर्थन किया था. अब सवाल बिहार में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का है. देखना यह होगा कि क्या नीतीश यूसीसी पर विरोध कर बीजेपी को रोक पाएंगे?
कुबूल अहमद