रिजीम चेंज: सरकार बदलने का लोकतांत्रिक अधिकार या सत्ता पलटने की साजिश?

लोकतंत्र में 'सत्ता परिवर्तन' शब्द जितना सहज लगता है, 'रिजीम चेंज' उतना ही हमें अलर्ट कर देता है. गुरुवार को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का यह कहना कि- हां हम रिजीम चेंज चाहते हैं भारत की राजनीति में तूफान पैदा कर गया है. इसके साथ ही हमारे सामने तस्वीर आती है बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में सरकारों के पतन की. जहां जनांदोलनों ने बिना चुनाव के ही सत्ता पलट दी.

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 : रिजीम चेंज पर भारत की सियासत में बहस. (Photo: Reuters) : रिजीम चेंज पर भारत की सियासत में बहस. (Photo: Reuters)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 16 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:36 PM IST

राम मनोहर लोहिया कहा करते थे, 'जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती हैं'. जय प्रकाश नारायण 1974 के छात्र आंदोलन में इंदिरा को ललकारते हुए कहते थे 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.' भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये दोनों नारे जनाक्रोश और बदलाव की पुकार के प्रतीक रहे हैं. भारत में इन दोनों की स्वीकार्यता है, लेकिन अंग्रेजी के 'रिजीम चेंज' शब्द को सुनकर कान खड़े हो जाते हैं. पर आखिर क्यों? 

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हालांकि अगर 'रिजीम चेंज' का सामान्य हिंदी अनुवाद करें तो इसका अर्थ होता है 'सत्ता परिवर्तन'. लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के जरिये सत्ता परिवर्तन से किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए. 

लेकिन 'रिजीम चेंज' का अर्थ हिंदी के 'सत्ता परिवर्तन' से थोड़ा अलग है. कैम्ब्रिज डिक्शनरी में regime change का अर्थ है- a complete change of government, especially one brought about by force by another government. यानी कि सरकार में पूर्ण बदलाव, विशेष रूप से वह जो किसी दूसरी सरकार द्वारा बलपूर्वक लाया गया हो. 

ध्यान रखने की बात है कि यहां सत्ता परिवर्तन के लिए लोकतांत्रिक प्रोसेस की चर्चा नहीं है, बल्कि सरकार में वैसा बदलाव जो एक दूसरी 'ताकत' या सरकार द्वारा बलपूर्वक किया गया हो. 

इसलिए भारत में जब वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि हम रिजीम चेंज चाहते हैं, AISA नेता नेहा बोरा ने कहा कि हमें बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से प्रेरणा मिली है, फिर कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि हां, हम रिजीम चेंज चाहते हैं, हालांकि उन्होंने कहा कि हम चुनाव के जरिये रिजीम चेंज चाहते हैं और इसे करके रहेंगे. 

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भारत में इन दिनों यही बहस तेज है. विपक्ष और सरकार के बीच चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर टकराव के बीच ‘रिजीम चेंज’ शब्द सियासी विवाद के केंद्र में आ गया है. 

बीजेपी इसे नरेंद्र मोदी सरकार को हटाने की कथित साजिश से जोड़ रही है, जबकि विरोधियों का तर्क है कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना कोई अपराध नहीं. 

लेकिन इस बहस में सबसे अहम सवाल है- क्या चुनाव में सरकार बदलने की कोशिश करना और 'रिजीम चेंज' की मांग करना एक ही बात है? 

इसका जवाब समझने के लिए पहले इस शब्द का राजनीतिक मतलब जानना जरूरी है. 

रिजीम चेंज का मतलब क्या है?

अंग्रेजी के ‘रिजीम चेंज’ का सामान्य अर्थ है किसी देश की सत्ता व्यवस्था या शासन प्रणाली में बुनियादी बदलाव. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल खास तौर पर तब होता है, जब किसी देश की सरकार को हटाने या उसकी राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए बाहरी ताकतें दबाव, हस्तक्षेप या सैन्य कार्रवाई करती हैं. 

अब समझिए. किसी देश में चुनाव होते हैं और विपक्ष जीतकर सरकार बना लेता है, लेकिन संविधान, संसद, अदालतें और सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पहले की तरह चलती रहती है. यह सरकार बदलना है, रिजीम चेंज नहीं. 

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लेकिन इसके उलट सैन्य तख्तापलट के जरिए निर्वाचित सरकार हटाना, संविधान को निलंबित करना या मौजूदा शासन प्रणाली को दूसरी व्यवस्था से बदल देना रिजीम चेंज के उदाहरण हो सकते हैं. इसके लिए आंदोलन, हिंसा, आगजनी, का सहारा लिया जाता है. कई बार ये आंदोलन विदेश सत्ता से फंडेड और संरक्षित होती है. 

हालांकि दोनों के बीच की रेखा हमेशा बिल्कुल स्पष्ट नहीं होती. किसी जनआंदोलन से सरकार गिर सकती है और उसके बाद पूरी राजनीतिक व्यवस्था बदल सकती है. ऐसे में यह देखना पड़ता है कि बदलाव सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों का हुआ या सत्ता चलाने के नियम भी बदल गए.

अब जरा पीछे चलिए. आपके सामने बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल का उदाहरण है. 

आपके सामने ईरान और वेनेजुएला का भी उदाहरण है. 

कहा जा सकता है कि इन देशों में रिजीम चेंज हुआ या रिजीम चेंज की कोशिश हुई. 

श्रीलंका: 2022 में गंभीर आर्थिक संकट पैदा हुआ. खाने-पीने की कीमतें बेतहाशा बढ़ी. श्रीलंका अपनी दो करोड़ की आबादी का भी पेट नहीं भर पा रहा था. महंगाई और ईंधन की किल्लत के बीच 'अरागलया' आंदोलन खड़ा हुआ. प्रदर्शनकारियों के राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने के बाद राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर चले गए और इस्तीफा दे दिया. 

बांग्लादेश: जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ यहां छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ और चिंगारी भड़क उठी. जल्द ही यह छात्र आंदोलन भ्रष्टाचार, असंतोष और सरकार विरोधी प्रदर्शन में बदल गया. 5 अगस्त को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्तीफा दिया और देश छोड़ दिया। इसके बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. 

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नेपाल: सितंबर 2025 में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ Gen Z आंदोलन भड़का. पुलिस ने फायरिंग की. 20 से ज्यादा लोग मारे गए. हिंसक प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया.  

इन तीनों देशों की सत्ता में हुआ ये बदलाव रिजीम चेंज कहे जा सकते हैं, क्योंकि यहां सत्ता में बदलाव लोकतांत्रिक तरीके से कराए गए चुनाव की वजह से नहीं हुए. बल्कि ये जनाक्रोश का परिणाम था. जिसके कई कारण थे.  

वेनेजुएला में हुआ रिजीम चेंज थोड़ा अलग है. यहां विदेशी ताकत ने सीधा दखल दिया और सत्ता बदल दी. 3 जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सैन्य कार्रवाई में पकड़कर अमेरिका पहुंचा दिया. इसके बाद वहां की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज ने अंतरिम राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाली. 

लेकिन ईरान की कहानी सबसे अलग है. यह एक असफल रिजीम चेंज का उदाहरण है. अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान में लगातार रिजीम चेंज की पैरवी कर रहे थे. यहां दिसबंर 25 और जनवरी 26 में बड़े पैमाने पर सरकार के खिलाफ आंदोलन हुए. एक समय तो ऐसा लग रहा था कि ईरान की खामेनेई सरकार गिर जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 

बाद में 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए. इनके घोषित सैन्य उद्देश्यों में परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करना शामिल था; नेतृत्व परिवर्तन की मंशा तो थी ही. लेकिन ईरान में पूरी तरह से रिजीम चेंज नहीं हुआ. क्योंकि ईरान की शासन व्यवस्था पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. 

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भारत में इस शब्द पर बवाल कैसे शुरू हुआ?

इस विवाद की तात्कालिक वजह चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहा विपक्ष और CJP का आंदोलन है. कांग्रेस समेत दूसरे संगठन न सिर्फ CEC ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा चाहते हैं, बल्कि राहुल गांधी ने तो यह भी कहा है कि इस सरकार को जाना होगा. 

इसी सिलसिले में दिल्ली के प्रेस क्लब में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा, “हां, हम रिजीम चेंज चाहते हैं, इसमें कुछ गलत नहीं.” उन्होंने इसे चुनावी लोकतंत्र बचाने और सरकार के खिलाफ असंतोष जताने से जोड़ा. साथ में AISA की नेहा बोरा ने बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से प्रेरणा लेने की बात कही. अगला बयान कांग्रेस नेता पवन खेड़ा का आया. उन्होंने भी कहा कि हां हम रिजीम चेंज चाहते हैं. लेकिन चुनाव के जरिए. इस तरह एक बयान ने पूरे राजनीतिक गलियारे में घमासान छेड़ दिया. 

बीजेपी ने इस बयान को अलग नजरिए से देखा. लखनऊ में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि 'रिजीम चेंज' और ‘संसद नहीं, सड़क से रास्ता निकलेगा’ जैसे नारों से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता. राजनीतिक विरोध के नाम पर हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देना देशहित के खिलाफ है. कांग्रेस को समझना चाहिए कि सत्ता का रास्ता जनमत से होकर जाता है, सड़कों पर अव्यवस्था फैलाने से नहीं. 

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बीजेपी ने कहा कि प्रशांत भूषण का 'रिजीम चेंज' का बयान, कांग्रेस का समर्थन, भारत में बांग्लादेश जैसी स्थिति बनाने की साजिश, युवाओं को उकसाने की मुहिम, यह महज इत्तेफाक नहीं, देश में अराजकता फैलाने की सोची-समझी साजिश है. 

वहीं कांग्रेस की ओर से जवाब दिया गया कि विपक्ष सरकार को चुनाव के जरिए बदलना चाहता है. कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने 1977 का उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि आपातकाल के बाद जनता ने चुनाव में इंदिरा गांधी की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था. उनके मुताबिक लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग अपने आप में कोई असंवैधानिक काम नहीं है. प्रशांत भूषण ने गुरुवार को यही बात कही थीं. 

पवन खेड़ा ने कहा, "हमने एक अभियान चलाया है 'वोट चोर- गद्दी छोड़.' पूरा देश भी यह खुलकर बोल रहा है. चुनाव के जरिए रिजीम बदलना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन राजनाथ सिंह और BJP के नेता इससे नाराज हैं, क्योंकि इन्हें लोकतंत्र की आदत नहीं रही. सच्चाई ये है कि जब BJP को लोकतंत्र में सवाल झेलने होते हैं, तो यही लोकतंत्र उन्हें देशद्रोह लगने लगता है. 

क्या सरकार बदलने की मांग करना गैरकानूनी है?

भारत में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना, उसकी नीतियों की आलोचना करना और चुनाव में उसे हराने की अपील करना लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है. यह गैरकानूनी नहीं है. संविधान अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता देता है, हालांकि इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं. लेकिन हिंसा भड़काना, आपराधिक साजिश रचना या गैरकानूनी तरीके से सत्ता हथियाने की कोशिश अलग कानूनी सवाल हैं. इसलिए केवल 'रिजीम चेंज' शब्द बोलने से यह अर्थ नहीं निकलता कि कोई व्यक्ति समाज या राष्ट्र में सरकार को गिराना या बदलना ही चाहता है. इसी तरह लोकतांत्रिक अधिकारों का हवाला देकर हिंसक या गैरकानूनी गतिविधियों को सही नहीं ठहराया जा सकता है. 

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लोकतंत्र में सड़क पर उठी आवाजें चुनावी बदलाव की मांग को ताकत दे सकती हैं, लेकिन सरकार बदलने का संवैधानिक रास्ता चुनाव ही है. 

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