चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेद और वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े खुलासे के बीच अब एनडीए के 3 सहयोगी दलों ने भी चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और तेलुगु देशम पार्टी के लोकसभा फ्लोर लीडर लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने चुनाव आयोग से जुड़ी आशंकाओं पर स्पष्ट जवाब मांगा है.
लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) चिराग पासवान ने साफ किया कि वह न तो चुनाव आयोग की ओर से बोल रहे हैं और न ही विपक्ष के आरोपों का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन उनका कहना था कि मौजूदा विवाद के बाद जनता के मन में पैदा हुए सवालों को चुनाव आयोग को दूर करना चाहिए.
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने भी तुरंत स्पष्टीकरण की मांग की, जबकि तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के लोकसभा फ्लोर लीडर लावू श्रीकृष्ण देवरायालु ने कहा कि पारदर्शिता से संवैधानिक संस्थाओं में भरोसा मजबूत करने में मदद मिलेगी.
केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए के सहयोगियों से ये टिप्पणियां अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद सामने आईं. इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर आधिकारिक तौर पर आपत्ति जताई थी, जो उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए थे.
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपत्तियों में वोटर रजिस्ट्रेशन फ़ॉर्म 6 में बदलाव, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया और वोटर लिस्ट डेटाबेस पर सेंट्रलाइज़्ड कंट्रोल से जुड़े मुद्दे शामिल थे.
इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को रोकने की मांग की है. विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग भी लाने की बात की है.
'ज्वाला' हो रहे चिराग
इस मुद्दे को उठाने में केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री चिराग पासवान सत्ता पक्ष की ओर से पहले नेता थे. उन्होंने संवाददाताओं से कहा, "मैं यह स्पष्ट कर दूं कि सरकार के हिस्से के रूप में मेरा इरादा एक संवैधानिक संस्था का बचाव करने का नहीं है. मैं विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों के बारे में भी ज्यादा चिंतित नहीं हूं, जो हमेशा वही रुख अपनाएगा जो राजनीतिक रूप से उसके अनुकूल हो."
उन्होंने कहा, "अगर लोगों का चुनावी प्रणाली पर से भरोसा उठना शुरू हो गया, तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा और इसलिए, मुझे लगता है कि चुनाव आयोग को और अधिक मजबूती से अपना स्पष्टीकरण देना चाहिए. राहुल गांधी और उनके सहयोगी जो कह रहे हैं उस पर उसे प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है. लेकिन चुनाव आयोग को लोगों के मन में गलतफहमी दूर करनी चाहिए."
स्पष्टीकरण जारी करे चुनाव आयोग
इस मुद्दे को उठाने वाले बिहार से दूसरे नेता राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा है. RLM भी एनडीए का हिस्सा है.
उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि इस विवाद से लोगों में भ्रम पैदा हुआ है. चुनाव आयोग को X पर टैग करते हुए उन्होंने लिखा, "SIR को लेकर हुए विवाद ने जनता के बीच काफी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है. इस मामले पर ध्यान देने की ज़रूरत है. चुनाव आयोग को इस भ्रम को दूर करने के लिए तुरंत असल स्थिति के बारे में स्पष्टीकरण जारी करना चाहिए."
चुनाव आयोग से जुड़े इस खुलासे पर तीसरी अहम चिंता दक्षिण भारत से आई. और इसे उठाने वाली पार्टी है एनडीए की अहम सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी.
TDP ने कहा पारदर्शिता जरूरी
लोकसभा में टीडीपी के फ्लोर लीडर लावु श्रीकृष्ण देवरायालु ने कहा कि आंध्र प्रदेश में SIR का काम पारदर्शी तरीके से किया गया, फिर भी चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मिलना फायदेमंद होगा.
उन्होंने कहा, "आंध्र प्रदेश के नज़रिए से और SIR प्रक्रिया को करीब से देखने के बाद मैं कह सकता हूं कि यह प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की गई. हर वोटर को इसमें शामिल होने और अपनी चिंताएं जाहिर करने के लिए पर्याप्त मौके और समय दिया गया."
उन्होंने आगे कहा, "यह प्रक्रिया सफल रही है. यहां तक कि विपक्ष भी आंध्र प्रदेश में इस प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताओं को सही साबित नहीं कर पाया है. साथ ही, भारत का चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है जिस पर हमारे लोकतंत्र में एक अहम ज़िम्मेदारी है. इसलिए जब भी कोई सवाल उठाए, तो सही स्पष्टीकरण देना और पारदर्शिता बनाए रखने से ही लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा मज़बूत करेगा."
बता दें कि चुनाव आयोग ने इन दावों पर बुधवार को कहा कि उसके सदस्यों के बीच अलग-अलग राय होना बातचीत का एक सामान्य हिस्सा है और SIR से जुड़े फैसलों समेत उसके सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे.
चुनाव आयोग ने कहा कि उसके आधिकारिक आदेशों और निर्देशों को कानूनी मान्यता प्राप्त है और दोनों चुनाव आयुक्तों के सुझावों का मकसद चुनावी प्रक्रियाओं में सुधार करना था. आयोग के अनुसार संधू या जोशी में से किसी ने भी उन आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है जो उनसे जुड़ी बताई जा रही हैं.
वहीं सत्ताधारी बीजेपी ने आयोग के भीतर मतभेदों को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और कहा कि आधिकारिक बातचीत के दौरान विचारों का आदान-प्रदान "सेहतमंद लोकतंत्र" को दर्शाता है.
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