बंगाल की खाड़ी की हिल्सा इलाहाबाद के संगम में. कभी कभी तो आगरा में बहने वाली यमुना तक. सुनने में अजूबा लगने वाली ये बात 1975 से पहले सच हुआ करती थी. मॉनसून के दिनों में हिल्सा मछली विपरीत दिशा में तैरकर इतनी लंबी यात्रा करती थी. यह बात सेंट्रल इनलैंड फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यू की कई रिपोर्ट्स, रिसर्च पेपर्स और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है.
फिर 1975 में बंगाल में गंगा नदी पर एक बांध बनाया और हिल्सा की ऊपर धारा की ये यात्रा हमेशा हमेशा के लिए रुक गई. गंगा नदी पर बने इस बांध का नाम फरक्का बैराज है. फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में गंगा नदी पर बना एक बड़ा बांध है. यह मुर्शिदाबाद जिले में है और बांग्लादेश की सीमा से सिर्फ 16-18 किलोमीटर ऊपर स्थित है. यह बांध लगभग 2.25 किलोमीटर लंबा है और इसमें 109 गेट लगे हैं.
सवाल उठता है कि इस बांध को बनाने की क्या वजह थी.
दरअसल हुगली नदी में बहुत ज्यादा गाद (मिट्टी) जमा हो रही थी. इससे नदी उथली हो गई थी और बड़े जहाज बंदरगाह तक नहीं पहुंच पा रहे थे.
विशेषज्ञों ने सोचा कि अगर गंगा का थोड़ा पानी हुगली नदी में डाल दिया जाए, तो गाद बह जाएगी और बंदरगाह चालू रहेगा.
1853 में ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन ने भी ऐसा ही सुझाव दिया था कि गंगा पर फरक्का के पास बैराज बनाकर पानी हुगली नदी में मोड़ना चाहिए.
लेकिन तब इस पर अमल नहीं हो पाया था.
फरक्का बैराज को समझने से पहले बंगाल में गंगा की धारा को समझना जरूरी है.
बिहार-झारखंड से बहती हुई गंगा पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में प्रवेश करती है. यहां तक इसे गंगा ही कहा जाता है. इसके बाद गंगा फरक्का पहुंचती है. फरक्का बैराज गंगा के पानी को नियंत्रित करता है.
फरक्का बैराज के आसपास गंगा दो भागों में बंटती है.
दाहिनी शाखा भारत में रहती है और बाईं बांग्लादेश में जाती है.
गंगा की जो धारा भारत यानी की पश्चिम बंगाल में बहती है वो भागीरथी कहलाती है. आगे चलकर इसे हुगली नदी के नाम से जाना जाता है. इसी धारा के किनारे कोलकाता और हल्दिया जैसे महत्वपूर्ण इलाके हैं. यही वह धारा है जिसके लिए फरक्का बैराज बनाया गया था.
फरक्का बैराज से 38 से 42 किलोमीटर लंबी एक फीडर कैनाल के जरिए गंगा का पानी हुगली में डाला जाता है, ताकि कोलकाता बंदरगाह में गाद न जमा हो.
जबकि बाईं ओर की धारा बांग्लादेश में प्रवेश करती है. बांग्लादेश में इसे पद्मा कहते हैं.
कहने का अर्थ यह है कि मुर्शिदाबाद जिले में गंगा के पानी को हुगली की तरफ मोड़ने के उद्देश्य से फरक्का बैराज बनाया गया था. ताकि कोलकाता बंदरगाह में जमा गाद को हटाने और उसकी नौवहन क्षमता बनाए रखने में मदद मिले.
समस्या कहां आई
जब पानी हुगली की तरफ मोड़ा गया तो बांग्लादेश में गंगा का पानी कम हो गया. सूखे के मौसम में बांग्लादेश में पानी की किल्लत हो गई. इससे बांग्लादेश में खेती, मछली पालन और पीने के पानी पर असर पड़ा. इसी वजह से भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय तक विवाद चला.
बांग्लादेश ने आरोप लगाया कि सूखे मौसम में पानी कम होने से उनके कृषि, मछली पालन और पर्यावरण को नुकसान हुआ. इसी विवाद के कारण बाद में 1977, 1980 के दशक के अस्थायी समझौते हुए.
भारत-बांग्लादेश के बीच इस मामले में ब्रेकथ्रू तब आया जब इस विवाद को सुलझाने के लिए वर्ष 1996 में फरक्का जल समझौता हुआ. इसे ‘गंगा वाटर्स शेयरिंग ट्रीटी’ भी कहते हैं.
फरक्का जल समझौता में क्या है
फरक्का जल समझौता भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बंटवारे का समझौता है. इस समझौते पर 12 दिसंबर 1996 को नई दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और शेख हसीना ने हस्ताक्षर किए थे. इसकी अवधि 30 वर्ष है. यानी कि दिसंबर 2026 में यह समझौता समाप्त हो रहा है.
मॉनसून में तो पानी की उपलब्धता को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन यह समझौता मुख्य रूप से सूखे मौसम (1 जनवरी से 31 मई) के दौरान फरक्का बैराज पर उपलब्ध पानी का बंटवारा तय करता है.
पानी के बंटवारे का फॉर्मूला इस तरह है.
अगर फरक्का बैराज पर 70 हजार क्यूसेक या उससे कम पानी उपलब्ध है तो दोनों देशों को आधा आधा पानी मिलेगा.
अगर उपलब्धता की मात्रा 70,000–75,000 क्यूसेक है तो बांग्लादेश को 35 हजार क्यूसेक पानी और बाकी भारत को मिलेगा.
75,000 क्यूसेक या ज्यादा पानी होने पर भारत को 40,000 और बाकी पानी बांग्लादेश को दिया जाएगा.
मार्च-मई में दोनों देशों को बारी-बारी से 35,000 क्यूसेक पानी की गारंटी दी गई है. एक संयुक्त समिति पानी की निगरानी करती है.
बांग्लादेश की आपत्ति क्या है
लंबे समय तक भारत-बांग्लादेश के बीच ये समझौता संतोषजनक ढंग से काम करता रहा. लेकिन हाल में ही बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बांग्लादेश के सुर बदल गए.
अब बांग्लादेश को ज्यादा पानी चाहिए. बांग्लादेश अब टकराव की मुद्रा में है और इस मु्द्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाना चाहता है. बांग्लादेश का कहना है कि जब समझौता किया गया था तो बांग्लादेश की आबादी कम थी, मौसम का संतुलन अलग था और इकोलॉजी भी आज के मुकाबले ज्यादा पॉजिटिव थी. लेकिन आज की स्थिति से काफी अलग हैं. जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश और सूखे के कारण नदी के प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ी है.
बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी अनी ने कहा है कि नई संधि में वो एक ऐसे 'गारंटी क्लॉज' की मांग करेगा.
गारंटी क्लॉज़ एक ऐसा नियम है जो नदी के बहाव की दिशा में आगे पड़ने वाले देश को कम से कम एक निश्चित मात्रा में पानी देने का वादा करता है. बांग्लादेश के मंत्री ने आगे कहा कि हम एक संधि चाहते हैं, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का दरवाज़ा खटखटाने को भी तैयार है.
नए समझौते से बिहार को क्या चाहिए
बांग्लादेश के साथ फरक्का जल समझौता को रिन्यू करने की बात आई तो बिहार से कई आवाजें उठने लगीं. आखिर इस संधि से बिहार का क्या लेना-देना है. बिहार में इस समझौते का इतना विरोध है कि 2016 में तत्कालीन बिहार सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि फरक्का बांध को तोड़ना ही बिहार की समस्या का समाधान है.
फरक्का बैराज पश्चिम बंगाल में है, हालांकि इसके संचालन का असर पूरे गंगा बेसिन पर पड़ता है.
बिहार लंबे समय से बाढ़, नदी के कटाव, गाद जमा होने और वाटर मैनेजमेंट जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है. फरक्का समझौते के कारण गंगा नदी में गाद जमा होने लगती है. इससे नदी का तल ऊंचा हो जाता है और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. बिहार के कई जिले हर साल बाढ़ से प्रभावित होते हैं. इसमें भागलपुर और मुंगेर जैसे शामिल हैं.
सूखे मौसम में समझौते के तहत बांग्लादेश को पानी छोड़ना पड़ता है. इससे बिहार में सिंचाई और पेयजल के लिए पानी की कमी हो जाती है. बक्सर में गंगा का प्रवाह कम रहता है, जबकि फरक्का पर ज्यादा पानी छोड़ना पड़ता है.
इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है.
जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने बिहार की ओर से इस संधि का सबसे मुखर विरोध किया है. मीडिया रिपोर्टस के अनुसार उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह इस संधि को मौजूदा रूप में रिन्यू करने पर फिर से विचार करे. उनका तर्क है कि जब यह समझौता हुआ था तब बिहार के हितों की अनदेखी की गई थी.
संजय झा ने हाल में कहा, "मैं इस पर कोई राजनीति नहीं कर रहा हूं, लेकिन अगर आप उस समय के पुराने रिकॉर्ड देखें, तो कुछ लोग यह मुद्दा उठा रहे थे कि बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि बिहार के लिए बहुत नुकसानदायक होगी. पिछले 30 वर्षों के आंकड़ों को देखें और आप देखेंगे कि बिहार के साथ कितना बड़ा अन्याय हुआ है."
जेडीयू नेता कहा कि नए समझौते में बिहार की खेती, पीने के पानी और उद्योग से जुड़ी ज़रूरतों का आकलन आबादी और 2050 में होने वाली लीक आबादी पर भी विचार किया जाना चाहिए.
RJD के बक्सर से सांसद सुधाकर सिंह ने भी मांग की है कि अगली व्यवस्था में बिहार के पानी, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल-परिवहन से जुड़े हितों को शामिल किया जाए.
बंगाल वर्सेज बिहार क्यों हो जाता है
पश्चिम बंगाल के लिए फरक्का सिर्फ बांग्लादेश को पानी देने का मामला नहीं है. फरक्का परियोजना का मूल उद्देश्य ही गंगा के पानी को हुगली की तरफ मोड़कर कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता बनाए रखना था. इसलिए बंगाल के लिए सवाल है कि अगर बांग्लादेश को ज्यादा पानी दिया जाता है, तो क्या हुगली में पर्याप्त पानी बचेगा? यानी बंगाल की चिंता है कि पानी का ऐसा बंटवारा हो जिससे राज्य की अपनी जरूरतें और कोलकाता-हल्दिया क्षेत्र की नदी एवं बंदरगाह व्यवस्था प्रभावित न हो.
मॉनसून के मौसम में फरक्का बैराज में पानी बढ़ने के कारण बिहार में बाढ़ की समस्या आ जाती है. इस बार भी ऐसा ही हुआ. बिहार के मु्ख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बाढ़ की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए बिहार सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से फरक्का बैराज के सभी गेट खोलने का कहा है. ताकि फरक्का बैराज से पानी तेजी से निकले ओर जाए और बिहार की ओर दबाव कम हो. पटना में अभी कई घाटों पर बाढ़ की स्थिति है.
बाढ़ की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से फोन पर बात की और उन्हें स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया. चौधरी ने कहा कि उन्होंने फरक्का बैराज के सभी गेट खोलने से गंगा के प्रवाह को सुगम बनाने और बिहार में बाढ़ की स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
फरक्का जल समझौते की दिसंबर 2026 की डेडलाइन से पहले होने वाली बातचीत अब सिर्फ भारत-बांग्लादेश का मामला नहीं रही है. यह बिहार बनाम बंगाल-बांग्लादेश के हितों के टकराव का सवाल बन गई है. अब फरक्का जल समझौते की अगली डील करने से पहले केंद्र सरकार की चुनौती होगी कि इन तीनों पक्षों के बीच संतुलन बनाया जाए. बिहार-बंगाल में तो बीजेपी की सरकार की है, जबकि बांग्लादेश हमारा पड़ोसी है, जो फिलहाल कई मुद्दों पर भारत से अलग राय रखता है.
पन्ना लाल