'कानून से नहीं थोपा जा सकता राष्ट्रवाद', वंदे मातरम बिल के विरोध में DMK

डीएमके सांसद कनिमोझी का कहना है कि तमिलनाडु समेत कई राज्यों का अपना राज्य गीत है और 50 से अधिक वर्षों से इसे राज्य गीत के तौर पर सबसे पहले गाया जाता रहा है.

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कनिमोझी ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' न गाने को क्रिमिनल ऑफेंस बना दिया है. (Photo: Social Media) कनिमोझी ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' न गाने को क्रिमिनल ऑफेंस बना दिया है. (Photo: Social Media)

प्रमोद माधव

  • चेन्नई,
  • 30 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:34 PM IST

वंदे मातरम् बिल राज्यसभा के बाद लोकसभा से भी पास हो गया है. हंगामे के बीच यह बिल लोकसभा से पारित कर दिया गया है और इसके बाद सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित कर दी गई.

डीएमके ने लोकसभा में इस बिल का विरोध किया. डीएमके का कहना है कि कानून से राष्ट्रवाद नहीं थोपा जा सकता है. यह बिल बगैर चर्चा के हंगामे के बीच पारित हुआ. राज्यसभा से यह बिल पहले ही पारित हो गया था.

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इस बीच डीएमके की कनिमोझी ने कहा कि आज सरकारी कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' न गाने को क्रिमिनल ऑफेंस बना दिया है.

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कनिमोझी ने कहा, तमिलनाडु समेत कई राज्यों का अपना राज्य गीत है और 50 से ज़्यादा सालों से इसे राज्य गीत के तौर पर सबसे पहले गाया जाता रहा है. आज, कई राज्यों के गीतों को तीसरे स्थान पर धकेल दिया जाएगा. 

कनिमोझी ने बताया कि इससे हमारे राज्यों के लोगों की भावनाएं आहत होती हैं. इसके अलावा, देश के महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर का भी यह मानना था कि गीत के केवल पहले दो छंद ही गाए जाने चाहिए, क्योंकि बाकी हिस्से से भावनाएं आहत हो सकती हैं. आज इसे अनिवार्य बनाकर देश के हितों के खिलाफ काम किया जा रहा है.

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बता दें, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में वंदे मातरम् की रचना की थी और 1882 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में इसे शामिल किया था. इसके बाद 1937 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने फैसला किया कि सार्वजनिक आयोजनों में वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे.

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