'हिम्मत कैसे हुई...', CJP प्रोटेस्ट पर स्टूडेंट को नोटिस भेजने पर सुप्रीम कोर्ट नाराज

सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान नोटिस जारी करने पर कड़ी फटकार लगाई है. अदालत ने पूछा है कि रोक के बावजूद डीएम ने नोटिस क्यों भेजा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस कार्रवाई को अदालत की अवमानना माना है और जिलाधिकारी से जवाब तलब किया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा मजिस्ट्रेट से जवाब तलब किया है. (File photo: PTI) सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा मजिस्ट्रेट से जवाब तलब किया है. (File photo: PTI)

अनीषा माथुर / संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 09 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:11 PM IST

जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को फटकार लगाई है. अदालत ने सेकेंड ईयर के एक छात्र को नोटिस जारी किए जाने पर कड़ा ऐतराज जताया है. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मजिस्ट्रेट के इस एक्शन को अदालत की अवमानना करार दिया है. 

 

अदालत में सुनवाई के दौरान एक वकील ने कोर्ट के सामने ये मुद्दा उठाया. वकील ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के छात्रों के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाए जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया.

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सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि ये नोटिस नोएडा के जिलाधिकारीने जारी नहीं किया था, बल्कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने किया था. उन्होंने बताया कि मीडिया रिपोर्टों में खबर आने के बाद इस नोटिस को वापस भी ले लिया गया है. डीएम नोएडा के पास इसे लेकर लगातार फोन आ रहे थे, जबकि उन्होंने कोई समन जारी नहीं किया था.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के छात्र अक्षत त्रिपाठी दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे. उन्हें ग्रेटर नोएडा के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने शांति बनाए रखने के लिए 5 लाख रुपये के व्यक्तिगत मुचलके का नोटिस जारी किया था. हालांकि, विवाद के बाद प्रशासन ने इस आदेश को वापस ले लिया है.

अक्षत त्रिपाठी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण ढंग से हिस्सा लिया था और वो उस समय विश्वविद्यालय की कक्षाओं में भी मौजूद नहीं थे. ये नोटिस 4 सितंबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत जारी किया गया था.

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'नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई'

1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने 20 से 25 जुलाई के बीच सीजेपी प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी FIR को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए युवाओं के भविष्य के हित में आपराधिक कार्यवाही बंद करने का आदेश दिया था. 

कोर्ट की रोक के बावजूद छात्र को नोटिस जारी करने को लेकर CJI ने सख्त लहजे में कहा, 'हमें इस बात पर बेहद हैरानी है कि हमारे ये साफ आदेश दिए जाने के बाद भी कि किसी छात्र के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, एक मजिस्ट्रेट की नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई?'

वकील ने अदालत को बताया कि ये देश के छात्रों पर एक तरह का एक्सपेरिमेंट किया जा रहा है. ये सीधे तौर पर अदालत की अवमानना है. प्रशासन इस तरह की कार्रवाई करके छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा नहीं कर सकता.

अखबारी रिपोर्टों पर भरोसा नहीं, रिकॉर्ड पर लाएं तथ्य

सुनवाई के दौरान जब सीजेआई ने पूछा कि क्या नोटिस वापस लिए जाने की कोई आधिकारिक सूचना मिली है, तो वकील ने बताया कि मीडिया रिपोर्टों से ही पता चला है कि खबर आने के बाद नोटिस वापस ले लिया गया है.

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इस पर CJI ने कहा, 'हमारे आदेश में बिना किसी संशय के छात्रों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाई गई थी. अगर प्रशासन ने कोई कार्रवाई की है, तो हम उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर सकते हैं.'

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बेंच में शामिल जस्टिस बागची ने वकील को निर्देश दिया कि अगर नोटिस जारी किया गया है, तो वो इससे जुड़े सभी तथ्यात्मक दस्तावेज और सबूत आधिकारिक रिकॉर्ड पर लाएं. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो इस मामले में नोएडा के जिलाधिकारी से जवाब मांगेंगे और उनसे स्पष्टीकरण लिया जाएगा. 

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