नियम 167 vs 267: क्यों अड़ा है विपक्ष? जानिए राज्यसभा में चर्चा के नियमों का पूरा गणित

राज्यसभा में किसी भी मुद्दे पर चर्चा किस नियम के तहत होगी, इसे लेकर अक्सर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद देखने को मिलते हैं. नियम 167 और नियम 267 दोनों चर्चा से जुड़े हैं, लेकिन उनकी प्रक्रिया, उद्देश्य और परिणाम अलग-अलग हैं.

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राज्यसभा के नियम 167 और 267 को लेकर अक्सर सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच बहस होती है (Photo: PTI) राज्यसभा के नियम 167 और 267 को लेकर अक्सर सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच बहस होती है (Photo: PTI)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 24 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:57 AM IST

संसद में किसी भी विषय पर चर्चा विशिष्ट नियमावली के तहत कराई जाती है. विशेषकर राज्यसभा की नियमावली में नियम 167 और 267 सदन में चर्चा और प्रस्तावों के संचालन की प्रक्रिया में खास स्थान रखते हैं. सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच भी इसी मुद्दे पर अक्सर बहस होती है कि चर्चा किस नियम के तहत हो.

संसदीय प्रक्रिया के विशेषज्ञ वकील आर. के. शर्मा के मुताबिक, राज्यसभा संचालन का नियम 167 कहता है कि आम जनहित के किसी भी विषय पर चर्चा केवल तभी हो सकती है, जब सभापति की सहमति से सदन में एक औपचारिक प्रस्ताव यानी मोशन लाया जाए.

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नियम 267 के तहत कोई भी सांसद सभापति की अनुमति से सदन के उस दिन के पहले से तय और सूचीबद्ध कामकाज यानी लिस्टेड बिजनेस से संबंधित नियमों को स्थगित करने की मांग कर सकता है, ताकि देश के किसी अत्यंत महत्वपूर्ण और तात्कालिक मुद्दे पर तुरंत चर्चा की जा सके.

नियम 167 के तहत अमूमन सामान्य जनहित पर चर्चा कराई जाती है. यह नियम राज्यसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली के अंतर्गत आता है. इसके तहत सामान्य सार्वजनिक महत्व के किसी भी विषय पर बिना प्रस्ताव के सीधी चर्चा नहीं की जा सकती. चर्चा के लिए प्रस्ताव लाने से पहले राज्यसभा के सभापति की पूर्व सहमति जरूरी होती है.

इस नियम के तहत जब कोई प्रस्ताव रखा जाता है और उस पर चर्चा पूरी हो जाती है और संबंधित मंत्री अपना जवाब दे देते हैं, तब सदन में उस प्रस्ताव और उस पर आए संशोधनों को वोटिंग के लिए रखा जाता है.

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अब नियम 267 की विशेषता यह है कि इसके तहत किसी भी बेहद गंभीर और जरूरी राष्ट्रीय मुद्दे पर बहस के लिए सदन के सामान्य निर्धारित एजेंडे को रोकने का प्रावधान है.

इसके लिए सदस्य को लिखित में नोटिस देना होता है. इस पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह से सभापति के विवेक पर निर्भर करता है कि वे इसकी अनुमति दें या मना कर दें.

सभापति और व्यवस्था संबंधी स्पष्टीकरण के अनुसार, इसका उपयोग केवल सदन के उस दिन के एजेंडे में शामिल विषयों से जुड़े नियमों को निलंबित करने के लिए ही किया जा सकता है.

भारतीय संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका (सरकार) सामूहिक रूप से विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है. जब किसी स्वीकृत नियम के तहत सदन में किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा शुरू होती है, तो सरकार की ओर से संबंधित मंत्री या सदन के नेता द्वारा चर्चा का उत्तर देना संसदीय परंपरा और जवाबदेही का हिस्सा होता है. 

हालांकि, विशिष्ट नियमों जैसे अल्पकालिक चर्चा (नियम 176) या नियम 267 के तहत होने वाली बहसों में समय सीमा और प्रक्रिया तय होती है. औपचारिक रूप से ‘वोटिंग’ या मत विभाजन द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया मुख्य तौर पर नियम 167 जैसी व्यवस्थाओं में ही स्पष्ट रूप से परिभाषित है.

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