संसद के मॉनसून सत्र के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और NCP (शरद पवार) के प्रमुख शरद पवार की मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है. इस बैठक में एनसीपी (एसपी) सांसद सुप्रिया सुले भी मौजूद थीं. खास बात यह रही कि प्रधानमंत्री से मुलाकात से पहले शरद पवार जंतर-मंतर पहुंचे थे, जहां उन्होंने छात्र नेता अभिजीत दिपके और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के प्रोटेस्ट को समर्थन दिया.
विपक्षी दलों के बीच मतभेद की अटकलें
इस घटनाक्रम ने विपक्षी दलों के बीच संभावित मतभेदों को लेकर अटकलों का दौर तेज कर दिया है. एक ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और शिवसेना (UBT) जैसे दल छात्र आंदोलनों और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं, वहीं शरद पवार की प्रधानमंत्री से मुलाकात ने विपक्ष की रणनीति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.
हाल के दिनों में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव छात्र आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री आवास के पास हिरासत में लिए गए थे. वहीं, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे भी जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों से मिले थे. ऐसे समय में शरद पवार की प्रधानमंत्री से मुलाकात को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
क्या डिलिमिटेशन पर सरकार के साथ आ सकती है NCP?
राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, एनसीपी (एसपी) संसद के आगामी मानसून सत्र में प्रस्तावित डिलिमिटेशन बिल को लेकर केंद्र सरकार के रुख का समर्थन कर सकती है. अगर ऐसा होता है तो विपक्षी गठबंधन INDIA के भीतर मतभेद और अधिक स्पष्ट हो सकते हैं. यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब प्रकाश आंबेडकर ने महाराष्ट्र बंद का आह्वान भी किया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शरद पवार की इस रणनीति के पीछे कई कारण हो सकते हैं. पहला, वह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के साथ संवाद बनाए रखकर अपनी राजनीतिक सौदेबाजी की क्षमता को मजबूत रखना चाहते हैं. इससे उन्हें INDIA गठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) दोनों के साथ बातचीत की गुंजाइश मिलती है.
दूसरा, महाराष्ट्र के राजनीतिक और संसदीय हितों को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्वपूर्ण विधायी मुद्दों पर व्यावहारिक रुख अपनाना उनकी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. माना जा रहा है कि परिसीमन जैसे मुद्दे पर नरम रुख अपनाकर वह राज्य के संसदीय प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय हितों को सुरक्षित रखने का प्रयास कर सकते हैं. तीसरा, शरद पवार लंबे समय से ऐसे नेता माने जाते हैं जिनकी स्वीकार्यता सत्ता और विपक्ष दोनों में रही है. यही वजह है कि वे खुद को ऐसे वरिष्ठ राजनेता के रूप में स्थापित रखना चाहते हैं, जो राजनीतिक गतिरोध की स्थिति में दोनों पक्षों के बीच संवाद का सेतु बन सके.
हालांकि, प्रधानमंत्री से उनकी मुलाकात को लेकर आधिकारिक रूप से कोई राजनीतिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन इस घटनाक्रम ने मानसून सत्र से पहले विपक्षी एकजुटता को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि शरद पवार की यह संतुलन साधने वाली राजनीति उनकी पुरानी शैली का हिस्सा रही है, लेकिन ऐसे समय में यह रणनीति विपक्ष की सामूहिक लड़ाई को कमजोर भी कर सकती है.
ऋत्विक भालेकर