आजतक की ‘सुरक्षा सभा’ के विशेष सेशन ‘होंठों पे गंगा, हाथों में तिरंगा’ में कवि डॉ. कुमार विश्वास ने राष्ट्रवाद, भारतीय सेना, कश्मीर और बदलती पीढ़ियों के बीच देशभक्ति की भावना को लेकर खुलकर बात की, उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी कोने में भारतीय की सबसे पहली पहचान उसका देश है. इसलिए देश की सुरक्षा करने वाले सैनिकों के प्रति आभार व्यक्त करना हर नागरिक का कर्तव्य है.
कुमार विश्वास ने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके क्षेत्र, शहर या धर्म से पहले उसके देश से होती है, उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर वह अल्बानिया के किसी छोटे कस्बे या पोलैंड के क्राको में जाएं तो वहां उनसे सबसे पहले यही पूछा जाएगा कि वे कहां से हैं. उनका जवाब होगा- ‘आई एम इंडियन, मैं भारत से हूं.’ उन्होंने कहा कि जब देश की सुरक्षा की बात आती है तो उन लोगों के प्रति आभार जरूरी हो जाता है, जो देश को यह भरोसा देते हैं कि वह अपनी सीमाओं और हितों की रक्षा करने में सक्षम है, सेना इसी अग्रिम पंक्ति में खड़ी है और उसके प्रति सम्मान देश के हर नागरिक का दायित्व है.
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‘पैंगोंग जाने के बाद समझ आया तिरंगे की ताकत’
कुमार विश्वास ने लद्दाख के पैंगोंग जाने का एक संस्मरण भी साझा किया, उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें बेहद कम समय के नोटिस पर पैंगोंग जाना पड़ा, शुरुआत में उन्हें अंदाजा नहीं था कि वहां की परिस्थितियां कितनी चुनौतीपूर्ण होंगी, उन्होंने मजाकिया अंदाज में बताया कि लेह पहुंचने के बाद जब वह पैंगोंग की ओर गए तो उनके साथ मौजूद सहयोगी को रास्ते में कई बार लगा कि अब मुश्किल हो गई. कुमार विश्वास ने कहा कि उन्हें लगा था कि यह सामान्य पहाड़ी यात्रा की तरह होगी, लेकिन वहां की ऊंचाई और परिस्थितियों का अंदाजा बाद में हुआ.
उन्होंने कहा कि इस पूरे अनुभव में उन्हें एक बात महसूस हुई कि वहां जाने और कार्यक्रम करने की ऊर्जा सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं आ रही थी. उसके पीछे तिरंगे का भाव था, जो छाती और दिल पर लिखा हुआ था, उन्होंने कहा कि जैसे ही उनके हाथ में माइक आया, उन्हें लगा कि सांसें भी सामान्य हो गईं.
‘हमारा देश है जहां देश के पास सेना है’
कश्मीर का जिक्र करते हुए कुमार विश्वास ने अपने एक पुराने अनुभव को याद किया, उन्होंने बताया कि एक समय वह सैन्य बलों के लिए कार्यक्रम करने जम्मू-कश्मीर गए थे। उस दौर में वहां का माहौल आज से बिल्कुल अलग था. उन्होंने वहां एक ड्राइवर से बातचीत का किस्सा सुनाया, जब उन्होंने पूछा कि कश्मीर में क्या चल रहा है, तो ड्राइवर ने जवाब दिया था कि ‘हिंदुस्तान को एक दिन वापस तो जाना पड़ेगा.’
कुमार विश्वास ने कहा कि कुछ समय पहले जब वह दोबारा कश्मीर गए और वहां एक ड्राइवर से यही सवाल किया कि अब क्या चल रहा है, तो जवाब पूरी तरह बदल चुका था. ड्राइवर ने कहा कि हालात अच्छे हैं और अब उम्मीद है कि सरकार के वादे पूरे हों, फैक्ट्रियां आएं और रोजगार के अवसर बढ़ें. उन्होंने कहा कि इस बदलाव में राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका तो है ही, लेकिन उस दौर में बिना शिकायत, चेहरे पर मुस्कान और दिल में कश्मीरियत व हिंदुस्तान दोनों को समेटकर खड़े रहने वाले सैनिकों का योगदान भी कम नहीं है.
‘गलत सूचना और गलत इतिहास कैंसर की तरह’
कुमार विश्वास ने कहा कि किसी भी समाज में गलत सूचना और गलत इतिहास लंबे समय तक असर डाल सकते हैं. उन्होंने इसे शरीर में मौजूद कैंसर की कोशिकाओं से जोड़ते हुए कहा कि जरूरी नहीं कि उसका असर तुरंत दिखाई दे, लेकिन धीरे-धीरे वह पूरे शरीर को नुकसान पहुंचा सकता है, कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वहां कई पीढ़ियों तक गलत धारणाएं और गलत सूचनाएं पहुंचाई गईं. इसका खामियाजा सिर्फ राजनीति ने नहीं, बल्कि सेना और आम नागरिकों ने भी भुगता.
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‘राष्ट्रवाद कभी अप्रासंगिक नहीं होगा’
क्या अलग-अलग पीढ़ियों में राष्ट्रवाद की परिभाषा बदल जाती है? इस सवाल पर कुमार विश्वास ने कहा कि राष्ट्रवाद किसी एक पीढ़ी का विचार नहीं है, जिन लोगों ने गुलामी, युद्ध, आतंकवाद या अलगाववाद के दौर को देखा है, उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ अलग तरह से सामने आता है, उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी ने स्वतंत्रता संग्राम या अंग्रेजी शासन को नहीं देखा, इसलिए उसके लिए राष्ट्रवाद की अनुभूति वैसी नहीं हो सकती जैसी पुरानी पीढ़ियों के लिए थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रवाद अप्रासंगिक हो गया है.
कुमार विश्वास ने कहा कि दुनिया की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए राष्ट्रवाद आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण रहेगा. उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन समाजों ने अपने राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय पहचान को कमजोर समझा, वे कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद सिर्फ नारे लगवाने या तालियां बजवाने का विषय नहीं है, यह उस भावना का नाम है जिसमें व्यक्ति अपने देश, उसकी अस्मिता और उसकी सुरक्षा को गंभीरता से लेता है.
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‘राष्ट्रवाद को बढ़ाना और घटाना, दोनों राजनीति हो सकते हैं’
कुमार विश्वास ने राष्ट्रवाद के राजनीतिक इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया, उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद को अप्रासंगिक बताना भी राजनीति हो सकती है और राष्ट्रवाद को जरूरत से ज्यादा उछालकर अपने दूसरे सवालों से ध्यान हटाना भी राजनीति हो सकती है, उन्होंने कहा कि अगर किसी मंत्री से सड़क, विकास या किसी प्रशासनिक विफलता के बारे में सवाल पूछा जा रहा है तो उसका जवाब सिर्फ ‘भारत माता की जय’ नहीं हो सकता, देशभक्ति अपनी जगह है, लेकिन सरकार से उसके काम का हिसाब मांगना भी नागरिक का अधिकार है.
‘सेना के पराक्रम पर सवाल नहीं उठना चाहिए’
कुमार विश्वास ने सेना से जुड़े राजनीतिक विवादों पर भी अपनी बात रखी, उन्होंने कहा कि उनका एक बड़ा विवाद इसी बात को लेकर हुआ था कि जब सेना ने सीमा पार जाकर अपना पराक्रम दिखाया, तब सेना के सबूत मांगने के बजाय उसके पराक्रम और सैनिकों के साहस का सम्मान किया जाना चाहिए, उन्होंने कहा कि किसी सरकार या प्रधानमंत्री की आलोचना अपनी जगह हो सकती है, लेकिन इसका असर सेना के सम्मान पर नहीं पड़ना चाहिए। राजनीतिक असहमति को सेना के त्याग और बलिदान से अलग रखना जरूरी है.
‘हिंदी साहित्य की शुरुआत ही वीरगाथाओं से हुई’
सेना और साहित्य के रिश्ते पर बात करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि हिंदी साहित्य का शुरुआती इतिहास ही वीरगाथाओं से जुड़ा हुआ है. उन्होंने राजस्थान की चारण परंपरा का उदाहरण देते हुए बताया कि चारण कवि केवल राजा और सैनिकों का उत्साह बढ़ाने का काम नहीं करते थे, बल्कि जरूरत पड़ने पर राजा को उसके कर्तव्य का बोध भी कराते थे. यानी कवि का काम सिर्फ प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सही बात कहना भी था. उन्होंने कहा कि किसी सैनिक के मन में देश के लिए मर मिटने की भावना हो सकती है, लेकिन जब कोई कवि उसे शब्द देता है तो वह भावना और मजबूत हो जाती है. ‘वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो’ जैसे गीत सैनिकों के भीतर आगे बढ़ने का उत्साह पैदा करते हैं.
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