पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने बुधवार को वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के दौरान अपनाई गई कुछ प्रक्रियाओं की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए. उन्होंने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या फॉर्म 6 और ERO-Net सिस्टम में किए गए बदलावों के लिए सही प्रक्रिया का पालन किया गया था.
उनकी यह टिप्पणी 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट पर मचे विवाद के बीच आई है, जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और आदेशों पर 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी.
आयुक्तों द्वारा बताई गई आपत्तियों में नए वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले 'फॉर्म 6' में बदलाव और वोटर लिस्ट के डेटाबेस को सेंट्रलाइज़ करना शामिल था, लवासा ने कहा कि इन मुद्दों की जांच होनी चाहिए, चाहे तीनों कमिश्नर इन बदलावों पर सहमत हुए हों या नहीं.
इंडिया टुडे के साथ एक खास इंटरव्यू में लवासा ने कहा, "भले ही तीनों कमिश्नर सहमत हो गए हों, लेकिन क्या जरूरी मंज़ूरी की प्रक्रिया से गुज़रे बिना 'फॉर्म 6' में बदलाव करना कानूनी था? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर अभी भी विचार किया जा सकता है."
लवासा ने यह भी सवाल उठाया कि क्या ERO-Net सिस्टम ने इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स की कानूनी शक्तियों पर असर डाला है, जो वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने के बारे में फैसले लेने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं.
गोवा के एक मामले का ज़िक्र करते हुए जहां एक ERO कथित तौर पर 97 लोगों की पात्रता से संतुष्ट होने के बावजूद उन्हें फाइनल वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ पाया था, लावासा ने कहा कि ऐसी स्थिति चिंता पैदा करेगी.
उन्होंने कहा, "अगर ERO को ऐसा लगा कि वे 97 लोगों की पात्रता के बारे में पक्का होने के बावजूद उन्हें शामिल नहीं कर सकते, तो यह निश्चित रूप से एक समस्या है."
सेंट्रलाइज़्ड वोटर लिस्ट डेटाबेस पर सवाल उठाए
लवासा ने कहा कि वोटर लिस्ट डेटाबेस को सेंट्रलाइज़ करना अपने आप में कोई समस्या नहीं है, लेकिन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ERO के पास अपनी कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल करने की क्षमता बनी रहनी चाहिए.
उन्होंने कहा, "भारत के चुनाव आयोग के पास किसी वोटर के भविष्य के बारे में फ़ैसला करने का अधिकार नहीं है कि उसे लिस्ट में शामिल किया जाए या नहीं. इसलिए, ERO ही वह अधिकारी है जिसके पास पूरा अधिकार होता है."
उन्होंने कहा कि सेंट्रलाइज़्ड डेटाबेस बनाए रखा जा सकता है, बशर्ते कानूनी रूप से अधिकृत ERO के पास सिस्टम के संबंधित हिस्से तक पहुंच हो और वे अपने अधिकार क्षेत्र में वोटर लिस्ट में बदलाव कर सकें.
लवासा ने कहा, "कानूनी रूप से अधिकृत व्यक्ति के पास अपने सीमित अधिकार क्षेत्र तक पहुंच होनी चाहिए, ताकि वह कानून के अनुसार वोटर लिस्ट में बदलाव कर सके."
लवासा ने असहमति को समझाया
चुनाव आयुक्त संधु और जोशी की बताई गई आपत्तियों पर लवासा ने कहा कि चुनाव आयोग के अंदर राय में अंतर का मतलब अपने आप औपचारिक असहमति नहीं होती है.
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को बातचीत की पूरी जानकारी देनी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल हो कि क्या दोनों कमिश्नरों ने खास मुद्दों पर एक ही राय रखी, क्या उनकी राय पर विचार किया गया और क्या वे आखिर में फैसलों से सहमत थे या उनकी राय को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.
उन्होंने कहा, "अगर किसी बातचीत में किसी ने अपनी राय रखी है और चुनाव आयोग ने फैसला लेने से पहले उस पर ध्यान दिया है, तो चुनाव आयोग को पूरे तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ यह बताना चाहिए."
लवासा ने कहा कि औपचारिक असहमति तब मानी जाएगी जब कमिश्नर आयोग के सामने किसी एजेंडे पर अलग-अलग राय रखें.
उन्होंने कहा, "असहमति तब होती है जब आयोग के सामने कोई एजेंडा रखा जाता है. दो लोगों की एक राय होती है और एक व्यक्ति की दूसरी राय होती है. इसे ही असहमति कहते हैं."
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि कोई चुनाव कमिश्नर चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज से जुड़े मामलों पर कैबिनेट सेक्रेटरी को पत्र क्यों लिखेगा. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को ऐसी बातचीत के पीछे की वजह बतानी चाहिए.
लवासा ने कहा, "चेक और बैलेंस होने चाहिए." उन्होंने कहा कि निगरानी का एक और स्तर जवाबदेही और सुपरविज़न को मज़बूत करेगा.
चुनाव आयोग का कहना है कि उसके फैसले, जिनमें SIR से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, सर्वसम्मति से लिए गए थे और अलग-अलग बातचीत या राय में अंतर को संस्थागत असहमति नहीं माना जाना चाहिए.
लवासा ने कहा कि पूरे रिकॉर्ड के बिना इस विवाद का सही अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. उन्होंने कहा, "इन सभी चीज़ों पर बहुत ज़्यादा स्पष्टीकरण की ज़रूरत है."
आजतक ने भी चुनाव आयोग से तीन सवालों के जवाब जानने चाहे.
1. फ़ॉर्म 6 में बदलाव क्यों किया गया?
2. जब EC ने चिंता जताई, तो उनकी चिंताओं के बावजूद आदेश क्यों दिए गए?
3. डेटा को सेंट्रलाइज़ क्यों किया गया?
चुनाव आयोग की ओर से जारी जवाब में इन सवालों का जवाब नहीं मिला है.
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