आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा उत्सव में आस्था के साथ ही परंपरा और कलाओं का समावेश देखने को मिला. 10 दिन तक चले इस आयोजन में देवी कनक दुर्गा की पूजा, शास्त्रीय संगीत, लोककलाओं और देशभर के हस्तशिल्प ने लोगों का ध्यान खींचा.
अब राज्य सरकार की कोशिश है कि विजयवाड़ा को धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक आकर्षण के बड़े केंद्र के रूप में भी पहचान मिले. दशहरे के दौरान आयोजित इस उत्स्व का समापन 20 अक्टूबर को हुआ. इस आयोजन में देश की कई हस्तियों ने भाग लिया. मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और चीन के एक प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी ने भी आयोजन को खास बनाया.
मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के मुताबिक, विजयवाड़ा उत्सव जैसे आयोजन आस्था, ज्ञान और तकनीक को एक साथ लाने का मौका देते हैं. उन्होंने राज्य की कला, परंपराओं और तेलुगू संस्कृति को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया. सरकार की योजना विजयवाड़ा की धार्मिक पहचान को व्यापक पर्यटन से जोड़ने की है, ताकि शहर को वाराणसी और मैसूर जैसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की तरह पहचान मिल सके.
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देवी के दर्शन के साथ कला और खरीदारी का आकर्षण
विजयवाड़ा के सांसद केसिनेनी शिवनाथ ने बताया कि नवरात्रि के दौरान हर दिन करीब 1.5 लाख से 2 लाख श्रद्धालु कनक दुर्गा देवी के दर्शन करने पहुंचते हैं. यह शहर के धार्मिक महत्व को दिखाता है. उत्सव में शास्त्रीय कलाओं, लोक प्रस्तुतियों, भक्ति कार्यक्रमों और प्रदर्शनियों के साथ ग्रामीण कारीगर समिति का सरस मेला भी लगा.
दक्षिणी क्षेत्र में पहली बार आयोजित इस मेले में देश के अलग-अलग हिस्सों के कारीगरों ने अपने सामानों की प्रदर्शनी की. साथ ही इस आयोजन के जरिए पारंपरिक कलाकारों, शिल्पकारों, छोटे कारोबारियों और विक्रेताओं को भी अपनी कलाओं को लोगों के सामने रखने के लिए मंच मिला.
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