कश्मीर का नाम लेते ही जेहन में सेब के बाग, केसर के खेत और बर्फ से ढके पहाड़ आते हैं. लेकिन अब घाटी की एक और चीज कारोबार की दुनिया में अपनी जगह बनाने की तैयारी कर रही है. नाम है रेनबो ट्राउट... ठंडे पानी में पलने वाली यह मछली कश्मीर के लिए रोजगार और कमाई का नया रास्ता खोल सकती है.
मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले के कंगन में सिंध नदी के किनारे एशिया का सबसे बड़ा ट्राउट फिश फार्म स्थापित किया गया है. इसके पीछे मकसद सिर्फ मछली का उत्पादन बढ़ाना नहीं है. कोशिश है कि कश्मीर में पैदा होने वाली ट्राउट घाटी के बाजारों से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचे. इससे कारोबार बढ़े और स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए मौके मिलें. सवाल है कि ट्राउट मछली में ऐसा क्या खास है? कश्मीर का मौसम इसके लिए इतना मुफीद क्यों माना जाता है? और क्या मछली पालन घाटी में रोजगार का एक बड़ा जरिया बन सकता है?
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पहले ट्राउट मछली को समझिए. ट्राउट कोई ऐसी मछली नहीं है जिसे किसी भी तालाब में डालकर आसानी से पाला जा सके. इसे ठंडा, साफ और ऑक्सीजन से भरपूर पानी चाहिए. कश्मीर की बर्फीली चोटियों से निकलने वाली नदियां और ठंडा मौसम इसके लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करते हैं.
यही वजह है कि घाटी में ट्राउट पालन की संभावनाएं लंबे समय से मौजूद रही हैं. पहले यह क्षेत्र मुख्य रूप से सरकारी हैचरी और मत्स्य पालन से जुड़ी योजनाओं के जरिए आगे बढ़ता रहा. अब निवेशक भी इस कारोबार में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. गांदरबल के कंगन में सिंध नदी के किनारे स्थापित बड़ा फिश फार्म इसी बदलाव की कहानी कहता है. यहां कोशिश है कि ट्राउट पालन को सीमित उत्पादन से निकालकर बड़े व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाया जाए. प्रोजेक्ट डायरेक्टर यूनुस ट्रंबू ने ट्राउट पालन की संभावनाओं और बाजारों तक पहुंच बनाने को लेकर कहा कि तैयारियां चल रही हैं.
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अब सवाल यह है कि इससे स्थानीय लोगों को क्या मिलेगा? जवाब सिर्फ मछली बेचने से होने वाली कमाई तक सीमित नहीं है. मान लीजिए कि किसी इलाके में ट्राउट का उत्पादन बढ़ता है. तो मछलियों के पालन के लिए कर्मचारियों की जरूरत होगी. उनके प्रजनन और देखभाल के लिए हैचरी चलानी होगी.
मछलियों के लिए फीड चाहिए होगा. उत्पादन के बाद प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, स्टोरेज और परिवहन की व्यवस्था भी करनी होगी. यानी मछली फार्म के बाहर भी रोजगार के कई रास्ते बन सकते हैं. स्थानीय युवाओं को मछली पालन, तकनीकी देखभाल और सप्लाई चेन से जुड़े काम मिल सकते हैं. किसान और छोटे उद्यमी भी इस क्षेत्र में अवसर तलाश सकते हैं.
कश्मीर की ट्राउट दूसरे राज्यों तक कैसे पहुंचेगी? यहीं से इस कारोबार की सबसे अहम चुनौती शुरू होती है. मछली पैदा करना एक बात है और उसे सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर ग्राहक तक अच्छी हालत में पहुंचाना दूसरी बात. ट्राउट की ताजगी बनाए रखने के लिए कोल्ड-चेन, रेफ्रिजरेशन, प्रोसेसिंग और बेहतर ट्रांसपोर्ट की जरूरत होगी.
अगर ये व्यवस्थाएं मजबूत होती हैं, तो कश्मीर में उत्पादित ट्राउट को घाटी से बाहर भी बाजार मिल सकता है. इससे उत्पादकों को ज्यादा ग्राहकों तक पहुंचने का मौका मिलेगा. लेकिन बड़े बाजार का मतलब अपने आप बड़ा मुनाफा नहीं होता. परिवहन पर कितना खर्च आएगा, ग्राहक किस कीमत पर मछली खरीदने को तैयार होंगे और दूसरे उत्पादकों से मुकाबला कैसा रहेगा, ये सभी बातें कारोबार की सफलता तय करेंगी.
निजी निवेश से क्या बदलेगा?
जब किसी क्षेत्र में निजी निवेश आता है, तो उत्पादन बढ़ाने, नई तकनीक अपनाने और बाजार से सीधे जुड़ने के अवसर बन सकते हैं. ट्राउट पालन में भी यही संभावना देखी जा रही है. कंगन का यह फिश फार्म दूसरे उद्यमियों को भी इस क्षेत्र में इनवेस्टमेंट के लिए इंस्पायर कर सकता है. अगर ऐसा होता है, तो घाटी में मछली पालन से जुड़े कारोबार का दायरा बढ़ सकता है.
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हालांकि, परियोजना के आकार को देखकर रोजगार या उत्पादन के आंकड़े मान लेना ठीक नहीं होगा. इसके लिए यह जानना जरूरी है कि फार्म की वास्तविक उत्पादन क्षमता कितनी है, कितने लोगों को रोजगार मिला है और आने वाले समय में बाजार की मांग कितनी बढ़ती है. ट्राउट पालन के लिए साफ और ठंडे पानी की जरूरत है. इसलिए उत्पादन बढ़ाने के साथ जल संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल भी जरूरी होगा. मछलियों में बीमारियों पर कंट्रोल, पानी की क्वालिटी और अच्छी फीड पर ध्यान देना पड़ेगा.
फिलहाल, गांदरबल के कंगन में स्थापित ट्राउट फार्म इस दिशा में एक बड़ी पहल के रूप में सामने आया है. इसे एशिया का सबसे बड़ा ट्राउट फिश फार्म बताया जा रहा है. अगर प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ तकनीक, निवेश और बाजार का सही तालमेल बैठता है, तो ट्राउट पालन घाटी में रोजगार का नया रास्ता खोल सकता है.
अशरफ वानी