सूरत में ई-कॉमर्स क्षेत्र में धोखाधड़ी का बड़ा मामला सामने आया है. साइबर क्राइम पुलिस ने एक बड़े फर्जी ऑर्डर रैकेट का पर्दाफाश किया है. बताया जा रहा है कि सेलर प्रोटेक्शन फंड पॉलिसी का गलत फायदा उठाकर ठगों ने महज 9 दिनों में हजारों फर्जी COD ऑर्डर बनाए और कंपनी को ₹42 लाख का नुकसान पहुंचाया.
साइबर क्राइम पुलिस की तकनीकी जांच में खुलासा हुआ कि ये सभी संदिग्ध ऑर्डर एक ही मोबाइल नंबर, कस्टमर ID, डिवाइस और IP एड्रेस का इस्तेमाल करके किए गए थे.
संदिग्ध ऑर्डर का पैटर्न सामने आने पर ONLINE SITE ने संबंधित सेलर आईडी के खिलाफ कार्रवाई की. सेलर आईडी ब्लैकलिस्ट होने के बाद कंपनी ने पूरे मामले की शिकायत साइबर क्राइम पुलिस से की.
वहीं शिकायत के बाद पुलिस ने केवल संबंधित सेलर अकाउंट की जांच तक सीमित न रहकर, इसके पीछे काम करने वाले लोगों, बैंक खातों, डिजिटल डिवाइस और अन्य सेलर आईडी की भी जांच शुरू कर दी.
पुलिस ने जानकारी दी कि आरोपियों ने 'सुखविलास क्रिएशन' नाम की सेलर ID का इस्तेमाल करके केवल नौ दिनों में लगभग 5 हजार 121 फर्जी ऑर्डर किए थे. ये सभी ऑर्डर मुख्य रूप से COD मोड में किए गए थे. आरोपियों के कथित तरीके के अनुसार, पहले बड़ी संख्या में ऑर्डर जेनरेट किए जाते थे और फिर 'सेलर प्रोटेक्शन फंड पॉलिसी' के तहत पेमेंट हासिल किया जाता था.
पुलिस ने बताया, ऑर्डर का पेमेंट तीन दिनों के भीतर मिलने के बाद चौथे दिन ऑर्डर कैंसिल कर दिए जाते थे. पुलिस का आरोप है कि इस तरह ऑर्डर की संख्या बढ़ाकर कंपनी की पेमेंट प्रक्रिया का गलत फायदा उठाया गया.
इस मामले में पुलिस को सबसे जरूरी तकनीकी सबूत यह मिला कि हजारों ऑर्डर अलग-अलग ग्राहकों के नाम पर होने के बावजूद, उनके पीछे का डिजिटल स्रोत एक ही था.
जांच में पता चला कि 5 हजार 121 ऑर्डर एक ही डिवाइस और एक ही IP एड्रेस से किए गए थे. इसके अलावा, एक ही मोबाइल नंबर और कस्टमर आईडी के इस्तेमाल की जानकारी भी सामने आई है. इस असामान्य पैटर्न के आधार पर साइबर क्राइम पुलिस ने ऑर्डर डेटा, IP एड्रेस, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी और बैंकिंग ट्रांज़ैक्शन की कड़ियों को जोड़कर जांच आगे बढ़ाई.
पुलिस ने बताया है कि जांच के दौरान अशरफ और उसके पार्टनर रक्षित समेत अन्य लोगों की संलिप्तता सामने आई है. पुलिस के अनुसार, अशरफ और रक्षित पिछले करीब दो साल से ई-कॉमर्स क्षेत्र से जुड़े हुए थे. जांच में यह बात सामने आई है कि फर्ज़ी ऑर्डर बनाने और उनके आधार पर आर्थिक लाभ उठाने में दोनों की भूमिका थी.
पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या दोनों आरोपी पहले से ही इस तरह की गतिविधियों में शामिल थे और क्या अन्य सेलर अकाउंट का भी इस्तेमाल किया गया था. जांच के दौरान रक्षित से जुड़े बैंक खाते की पड़ताल करने पर पुलिस को एक और अहम जानकारी मिली है. पता चला है कि उसके एक बैंक खाते में सिर्फ़ 10 महीनों में लगभग ₹2.46 करोड़ का लेन-देन हुआ है.
पुलिस इस बात की वित्तीय जांच कर रही है कि इतनी बड़ी रकम का लेन-देन कहां से हुआ, किसे भुगतान किया गया और के साथ हुई धोखाधड़ी से इसका क्या संबंध है. पुलिस जांच में भौतिक ठुम्मर का नाम भी सामने आया है.
पुलिस के बताया, अशरफ़ ने फर्ज़ी ऑर्डर बनाने के लिए भौतिक की मदद ली थी. इसके अलावा, जांच में यह भी पता चला है कि आशीष वोरा भी इस नेटवर्क से जुड़ा हुआ है.
पुलिस को पता चला है कि आशीष टेलीग्राम के ज़रिए झारखंड के जामताड़ा से जुड़े एक ठग गिरोह के संपर्क में था. जांच के मुताबिक, आशीष प्रति ऑर्डर मिलने वाले कमीशन में बिचौलिए की भूमिका निभाता था.
पुलिस जांच में यह जानकारी सामने आई है कि उसे प्रति ऑर्डर मिलने वाले लगभग ₹120 में से ₹30 कमीशन के तौर पर मिलते थे. इस पूरे मामले में जामताड़ा कनेक्शन पुलिस के लिए जांच का एक अहम पहलू बन गया है.
जांच में यह भी मालूम चला है कि आरोपी टेलीग्राम के जरिए जामताड़ा से जुड़े मॉड्यूल के संपर्क में थे. पुलिस को शक है कि इस नेटवर्क के ज़रिए नकली सेलर आईडी बनाना, उनका इस्तेमाल करना और किसी एक सेलर आईडी के ब्लैकलिस्ट होने पर दूसरी आईडी से फिर से गतिविधियां शुरू करने का तरीका अपनाया जाता था.
फिलहाल पुलिस टेलीग्राम चैट, डिजिटल डिवाइस, वित्तीय लेन-देन और अन्य तकनीकी सबूतों की मदद से जामताड़ा समेत दूसरे राज्यों में मौजूद संभावित साथियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है.
ब्रिजेश दोशी