जुनैद भाई, आपको कुछ हो गया तो हमें खाना कौन खिलाएगा... जंतर-मंतर पर अभिजीत दिपके (CJP आंदोलन के मुखिया) ने जिसके लिए ये बात कही थी, वो अब अकेले पड़ गए हैं.
वही मोहम्मद जुनैद... जो जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन शुरू (6 जून से ) होने के बाद से अभिजीत दिपके समेत दूसरे लोगों के लिए खाना-पानी का इंतजाम कर रहे थे.
दिपके भी उनके साथ बैठकर खाना खाते थे. पूरे हक से उनसे कहते थे, 'सबके खाने-पीने का इंतजाम कर दो.'
जब जुनैद की तबीयत बिगड़ती, तो उनकी चिंता भी करते थे. अनशन के शुरुआती दिनों में तो जुनैद, सोनम वांगचुक के साथ साए की तरह नजर आते थे. मंच हो, धरना हो या लोगों की जरूरतें... वो हर जगह मौजूद थे.
धर्म की वजह से उन्होंने कइयों के ताने भी सुने, फिर भी वो डटे रहे. लेकिन आखिर में उसी पल से वो दूर रह गए... जिस पल के लिए ये पूरी लड़ाई लड़ी गई थी. यानी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा.
आज उस पल का जिक्र भर होता है, तो मोहम्मद जुनैद फफक-फफक कर रो पड़ते हैं. जिससे जुड़े वीडियोज सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं.
25 जुलाई को जुनैद कहां गायब हुए?
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर जश्न मन रहा था. तब जुनैद कहां थे? इस सवाल पर जुनैद कहते हैं, '24 जुलाई की रात मुझे कुत्ते ने काट लिया था. मैं रैबीज का टीका लगवाने के लिए RML हॉस्पिटल गया था. रात को करीब 12 बजे के आसपास हम (मैं और एक मेरा साथी) बाहर निकले, हमने ऑटो बुक किया. हम 50-60 मीटर ही चल पाए थे कि सामने से फिल्मी स्टाइल में एक गाड़ी आई. बिना नंबर प्लेट की सफेद स्कॉर्पियो. हम डर जाते हैं कि अब कुछ गलत होने वाला है. गाड़ी वाले उतरकर ऑटो में आ गए और बीच में हम दोनों को दबा लिया.'
जुनैद आगे बताते हैं, 'हमें घबराया देख वो कहने लगे की हम दिल्ली पुलिस से हैं. उन्होंने अपना आईडी कार्ड भी दिखाया. लेकिन उन्होंने अपना चेहरा कवर कर रखा था. फिर हमें उन्होंने हमारी आंखें कवर की और अपनी गाड़ी में बैठा लिया. फिर बहुत देर तक गाड़ी चलती रही. फिर किसी बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर पर हमको रख दिया. पूरी रात वहीं रखा. पहले बोला कि 10 मिनट में साहब आ रहे हैं. अगर हमने संतोषजनक जवाब दिए तो हमें अभी छोड़ देंगे. लेकिन पूरी रात कोई नहीं आया.'
जुनैद के मुताबिक, '25 की सुबह करीब 11:30 बजे एक अफसर आया. उन्होंने कुछ सवाल-जवाब किए. जैसे खाने-पीने का जुगाड़ कहां से कर रहे, पैसा कहां से आ रहा आदि. हमने कहा की सब लोग मिल जुलकर कर रहे हैं. जाहिर सी बात है कि इतना बड़ा काम एक व्यक्ति के लिए संभव ही नहीं है. जवाबों से वो संतुष्ट हो गए, उन्होंने कहा की इनको ले जाकर छोड़ दो. फिर हमें गाड़ी में बैठाया. पांच-छह घंटे लगातार गाड़ी चलती रही. आंखों से पट्टी लगातार बंधी रही.'
जुनैद आगे कहते हैं, 'फिर शाम को करीब 6 बजे हमें उतारा और छोड़कर चले गए. आंखों की पट्टी खोली तो देखा सामने पहाड़ ही पहाड़. आसपास कोई बोर्ड तक नहीं दिखा. हमने एक से पूछा तो पता चला कि आप मसूरी देहरादून (उत्तराखंड) में हो.'
क्या पुलिस ने कोई मारपीट की? इस सवाल पर जुनैद कहते हैं, 'नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ. पुलिस ने अच्छा बर्ताव किया. खाना आदि भी दिया. किसी पुलिसवाले ने एक उंगली तक नहीं लगाई.'
जुनैद के घरवालों को भी पुलिस ने उठाया
आंदोलन में शामिल होने की कीमत सिर्फ मोहम्मद जुनैद ने नहीं चुकाई. इसकी आंच उनके पूरे परिवार तक पहुंची. गाजियाबाद पुलिस ने उनके पिता और भाई से भी पूछताछ की. जुनैद बताते हैं, 'तीन दिन पहले मेरे वालिद शाम को खाना खा रहे थे. तभी पुलिसवाले उन्हें उठाकर ले गए. देर रात छोड़ा. अगले दिन सुबह 9 बजे फिर से उठा लिया. इसके बाद मेरी बहन, जो मेरठ में रहती है, वहां भी पुलिस पहुंची. उनके ससुर और देवर को भी थाने ले जाकर बैठाया. बाद में उन्हें छोड़ दिया.'
जुनैद का दावा है कि पुलिस उनके घर से पासबुक, आधार कार्ड लेकर गई. वह बोले- हमारा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. गलती सिर्फ ये है की छात्र-छात्राओं को खाना खिलाया या पानी पिलाया. इसके अलावा कोई पाप नहीं किया.
कॉकरोच आंदोलन से कैसे जुड़े जुनैद?
जुनैद बताते हैं कि वो पहले से कॉकरोच जनता पार्टी को फॉलो कर रहे थे. दिपके की तरफ से 6 जून को जंतर-मंतर पर एकत्र होने के लिए बोला गया था. इसलिए शाम को वे वहां पहुंचे. जुनैद कहते हैं कि वहां लोग शिक्षा में बदलाव के लिए जुड़े थे लेकिन इतनी गर्मी में पानी जैसी जरूरी चीज की वहां कमी थी. ऐसे में उन्होंने पहले पानी का इंतजाम किया. फिर धीरे धीरे स्नैक्स-नमकीन, फिर खाने की चीजें जुटाईं.
जुनैद के मुताबिक, वे इसके लिए किसी से पैसे या चंदा नहीं मांगते थे. वह बोले, 'हमने कभी कोई पैसा किसी से नहीं लिया. कोई बोलता था कि हम कुछ योगदान करना चाहते हैं. तो हम कहते कि कुछ ना कुछ पानी-नमकीन, बिस्कुट या कुछ पैकेट खाने के जो भी आपको ठीक लगे या मेडिसिन कुछ भी आकर दे दीजिए हम आपसे कोई कैश ऑनलाइन नहीं लेंगे.'
जुनैद बताते हैं कि इसके बाद जो कोई प्रोटेस्ट साइट पर आता वो बैग में कुछ न कुछ डाल लाता. जैसे कोई बिस्कुट, कोई पानी के पैकेट लेकर आ रहा था. कोई नमकीन ला रहा, कोई बिस्कुट ला रहा था, कोई अपनी तरफ से 20 लोगों का खाना ला रहा था. कोई 40 लोगों की थाली पैक करवा के ले आया. कोई घर पर बने दाल-चावल के आया. कुछ वेज बिरयानी बना के ले आया. इस तरह वहां सब मिल-जुल कर चल रहा था. इसमें फंडिंग की कोई जरूरत नहीं थी.
क्या जंतर-मंतर पर खाने-पीने का पूरा इंतजाम जुनैद अकेले करते थे?
इस सवाल पर जुनैद कहते हैं कि शुरुआत उन्होंने जरूर की थी, लेकिन धीरे-धीरे यह जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं रही.
उनके मुताबिक, 'सिख भाई भी आए. हिन्दू भी आए. बहुत से सेवादार जुड़े. गुरुद्वारों से लंगर आने लगा. मंदिरों से भी खाना आया. किसान संगठनों के लोग जुड़े. कुछ राजनीतिक दलों ने भी खाना भेजा.'
जुनैद बताते हैं कि जंतर-मंतर पर CJP की ओर से एक डोनेशन बॉक्स भी रखा गया था. लोग उसमें अपनी इच्छा से दान देकर जाते थे. कभी-कभी उसी पैसे से भी आंदोलन में शामिल लोगों के लिए खाना मंगाया जाता था.
क्या CJP ने हाल जाना?
फिलहाल तक अभिजीत दीपके, सौरभ दास या आशुतोष रांका में से किसी ने जुनैद से बात नहीं की है. इसपर वह कहते हैं, 'अभी तक तो किसी का फोन नहीं आया लेकिन हो सकता है वो आराम कर रहे हों. अभिजीत भाई तो बीमार हुए थे. उनकी लीगल टीम की हेड रत्ना का मुझे फोन आया था दो-तीन बार. उन्होंने कहा था कि कोई दिक्कत हो तो बताना. मुझे लगता है कि दिपके और बाकी साथियों को जब वक्त मिलेगा वो जरूर मुझसे बात करेंगे.'
विनिंग मोमेंट छूट गया और घरवालों का दर्द... जुनैद के पास बस यही दो अफसोस
'आदमी अगर जानवर भी रखता है, तो उससे भी मोहब्बत हो जाती है. हम तो 35 दिन साथ रहे...'
ये कहते हुए जुनैद कुछ पल के लिए रुक जाते हैं.
वो कहते हैं, 'शायद अब हम लोग कभी नहीं मिल पाएंगे. उनमें से कई लोगों के नंबर तक मेरे पास नहीं हैं. कई दूर-दराज के राज्यों से आए थे. कितने भाई ऐसे थे, जिनके पास किराए तक के पैसे नहीं थे. वो कैसे हमसे मिलने आएंगे... और हम कहां उनके पास जा पाएंगे.'
फिर बात उस दिन पर आकर ठहर जाती है... जिस दिन आंदोलन अपनी मंजिल तक पहुंचा.
जुनैद कहते हैं, 'वो बस एक क्षण था. सब मिल लेते... गले मिलते... हाथ मिला लेते. पूरी जिंदगी इस बात का अफसोस रहेगा कि जिन बच्चों की मैंने 35-36 दिन तक खिदमत की, जाते-जाते उनसे मिल भी नहीं सका. आज बस इसी बात का अफसोस है. लेकिन क्या कर सकते हैं. खुशी इस बात की है कि जिस चीज के लिए हम लड़ रहे थे, वो मिल गई.'
लेकिन जुनैद का दूसरा दर्द इससे भी गहरा है.
घर की तलाशी... पुलिस की पूछताछ... और उन सबके बीच उनके परिवार का गुजरना. वो कहते हैं, 'मैं तो झेल ही रहा हूं, लेकिन उनके (घरवालों) के साथ जो हुआ, वो बहुत गलत है. उनके साथ जो हुआ, वही मुझे सबसे ज्यादा दुखी करता है.'
कौन हैं मोहम्मद जुनैद?
मोहम्मद जुनैद गाजियाबाद के मसूरी इलाके के नाहल गांव के रहने वाले हैं. पेशे से प्रैक्टिसिंग वकील हैं.
उन्होंने गाजियाबाद के शंभु दयाल कॉलेज और फिर सुंदर दीप कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी से पढ़ाई की. कॉलेज के दिनों में छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे. बाद में कुछ समय समाजवादी पार्टी से भी जुड़े.
आंदोलनों से उनका रिश्ता नया नहीं है. CAA विरोध प्रदर्शन, 2021 के किसान आंदोलन और वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ आंदोलन में भी उन्होंने हिस्सा लिया. अगस्त 2025 में फिलिस्तीन के समर्थन में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में भी वे शामिल थे.
विष्णु रावल