आजतक ने दिल्ली के सबसे बड़े दवा बाजार में पहुंचकर जीवनरक्षक और कैंसर की दवाओं की MRP और PTR के बीच अंतर की पड़ताल की. दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन के महासचिव आशीष ग्रोवर से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की गई कि दवाओं की कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों है, कीमतें किस तरह तय होती हैं और इस व्यवस्था में मरीजों के हितों की सुरक्षा कैसे होती है.
कैंसर से संबंधित जो दवाइयां हैं, खास तौर पर लाइफ सेविंग ड्रग्स, उनकी कीमतों में इतना ज्यादा अंतर है कि 2,700 रुपये की दवाई 27,000 रुपये में बिक रही है.
आजतक ने जीवनरक्षक दवाओं के पैकेट पर छपी MRP और रिटेलर को मिलने वाली PTR की तुलना की. दवा कारोबारियों से बातचीत के जरिए कीमतों के अंतर को समझा गया और यह जानने की कोशिश की गई कि मरीजों को दवाएं खरीदते समय किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है.
आशीष ग्रोवर ने कहा कि दवाओं की कीमत का मसला काफी पुराना है. यह स्थिति सिर्फ कैंसर ही नहीं, बल्कि लगभग सभी दवाओं के साथ है. जेनेरिक दवाओं पर MRP काफी ज्यादा छपी होती है. उन्होंने कहा कि हम ट्रेडर्स हैं और हमारा मार्जिन महज 2 से 5 फीसदी ही होता है. असल मुद्दा रिटेल लेवल पर आता है, जहां डिस्काउंटिंग चलती है, जबकि होलसेल में डिस्काउंट नहीं होता.
ग्रोवर ने बताया कि दवा की जो कीमत है और जब उसे MRP पर बेचा जाता है, तो उसके बीच का जो चैनल होता है, वही इस फर्क की मुख्य वजह नजर आता है.
कैंसर मरीजों से बातचीत
दिल्ली कैंसर इंस्टीट्यूट, जहां कैंसर मरीजों और उनके केयरगिवर्स से बातचीत की गई. मरीजों और उनके परिवारों ने इलाज के खर्च, महंगी दवाओं और रोजमर्रा की चुनौतियों से जुड़ी अपनी परेशानियां साझा कीं. कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए दवाओं का खर्च एक बड़ी चिंता बना हुआ है.
आजतक ने उस बड़े सवाल को जमीनी स्तर पर समझने की कोशिश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान उठाया था. अदालत ने जीवनरक्षक दवाओं की ऊंची MRP और PTR के बीच भारी अंतर पर चिंता जताई थी और इसे मरीजों के साथ धोखाधड़ी व करदाताओं के साथ अन्याय से जोड़ते हुए सवाल किए थे.
याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 के तहत दवाओं की कीमतों के नियमन और गैर-अनुसूचित दवाओं के बड़े हिस्से का मुद्दा उठाया था. अनिवार्य जेनेरिक दवा लिखने और आवश्यक व जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण की मांग वाली PIL पर सुनवाई के दौरान अदालत ने जन औषधि केंद्रों पर जरूरी दवाएं उपलब्ध न होने की स्थिति में आम आदमी के सामने आने वाली मुश्किलों पर भी सवाल उठाए थे. मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को निर्धारित की गई थी.
शिवानी शर्मा