भारत के सिनेमाघरों में 11 सितंबर को एक ऐसी फिल्म दस्तक देने जा रही है, जिसकी कहानी सिर्फ पर्दे पर दिखाई जाने वाली कोई ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि आज भी बेहद संवेदनशील जियोपॉलिटिकल मुद्दे से जुड़ी हुई है. फिल्म का नाम है Four Rivers, Six Ranges और इसका निर्देशन किया है दार्जिलिंग में जन्मे तिब्बती फिल्ममेकर शेनपेन खिमसार ने. पर चीन इस फिल्म पर बौखला गया है.
फिल्म 1959 में तिब्बत से भारत में दलाई लामा के पलायन और उस दौरान उनकी सुरक्षा में जुटे तिब्बती प्रतिरोध संगठन Chushi Gangdruk के लड़ाकों की कहानी बताती है. दलाई लामा को सकुशल भारत पहुंचाने में इसी संगठन के लड़ाकों की अहम भूमिका रही है. फिल्म का नाम इसी रेजिस्टेंस ग्रुप के नाम पर रखा गया है. चुशी गंगद्रुक का तिब्बत में अर्थ चार नदियां और छह पर्वत श्रृंखलाएं होता है.
यह नाम पूर्वी तिब्बत के खाम इलाके से जुड़ा है और बाद में इसी नाम से एक तिब्बती सशस्त्र प्रतिरोध आंदोलन ने भी सुर्खियां बटोरीं. फिल्म इसी आंदोलन के उन लड़ाकों को केंद्र में रखती है, जो 1959 में दलाई लामा को तिब्बत से निकालकर भारत तक सुरक्षित पहुंचाने के मिशन में शामिल थे. दिलचस्प बात ये है कि फिल्म के प्रोड्यूसर डोर्जी वांगडी देवत्सांग के पिता भी दलाई लामा के तिब्बत से भारत आने में मदद करने वाले लोगों में शामिल थे.
फिल्म की कहानी उनकी किताब Flight at the Cuckoo’s Behest से भी प्रेरित है. निर्देशक ने इस प्रोजेक्ट पर वर्षों तक शोध किया और उस रेजिस्टेंस ग्रुप से जुड़े बुजुर्ग लड़ाकों और उनके परिवारों से मुलाकात की, जो उस दौर के प्रत्यक्ष गवाह थे. लेकिन इस फिल्म को बनाना कहानी लिखने से कहीं ज्यादा मुश्किल था. असली चुनौती शूटिंग लोकेशन थी.
फिल्म की शूटिंग नेपाल के मुस्तांग इलाके में हुई है, जो चीन की सीमा के बेहद करीब है. निर्देशक शेनपेन खिमसार के मुताबिक नेपाल में तिब्बत, दलाई लामा या चीन विरोधी गतिविधियों से जुड़ी फिल्म की शूटिंग के लिए अनुमति हासिल करना बेहद मुश्किल था.
उनका कहना है कि नेपाल पर चीन का काफी दबाव है और ऐसे विषय वाली फिल्म को सीधे मंजूरी मिलना लगभग असंभव था इसलिए फिल्म की टीम को एक असाधारण रास्ता अपनाना पड़ा. असली फिल्म की कहानी बताने वाली स्क्रिप्ट जमा करने के बजाय खिमसार ने नेपाल के अधिकारियों के सामने एक काल्पनिक स्क्रिप्ट पेश की, जिसका नाम था The Himalayan Robin Hood. यही वह स्क्रिप्ट थी जिसके नाम पर शूटिंग की अनुमति हासिल की गई और फिर उसी अनुमति के जरिए असली फिल्म Four Rivers Six Ranges की शूटिंग की गई.
फिल्म की शूटिंग किसी सामान्य फिल्मी शेड्यूल की तरह नहीं हुई. आमतौर पर इस स्तर की पीरियड एक्शन फिल्म को शूट करने में डेढ़ से दो महीने तक का समय लगता है, लेकिन खिमसार और उनकी टीम के पास इतना समय नहीं था. निर्देशक के मुताबिक उन्होंने पूरी फिल्म महज 19 दिनों में शूट कर डाली. वह भी करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई वाले हिमालयी इलाके में, बेहद कठिन मौसम और सीमित संसाधनों के बीच.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म का बजट भी लगभग छह करोड़ रुपये था. इतनी ऊंचाई पर शूटिंग, सीमित बजट, पहली बार काम कर रहे कलाकारों और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के बीच 19 दिनों में फिल्म पूरी करना अपने आप में इस प्रोजेक्ट की सबसे असाधारण बातों में से एक है.
अब सवाल यह है कि चीन इस फिल्म से इतना नाराज क्यों है? इसकी वजह सीधे फिल्म की कहानी और उसका राजनीतिक दृष्टिकोण है. फिल्म में तिब्बती लड़ाकों को अपने धर्म, जमीन और दलाई लामा की रक्षा के लिए हथियार उठाते हुए दिखाया गया है यानी फिल्म तिब्बत के इतिहास को उस नजरिए से देखती है, जिसमें तिब्बती प्रतिरोध और आजादी की आकांक्षा कहानी के केंद्र में है.
चीन की प्रतिक्रिया इसी वजह से बेहद तीखी रही है. चीन के सरकारी मीडिया ने 20 अगस्त को फिल्म पर एक लंबा लेख प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था Four Rivers, Six Ranges: A fictitious rewrite of Xizang's history. इसमें फिल्म पर इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया गया. चीन ने फिल्म को तिब्बत को चीन से अलग दिखाने वाली कोशिश और अलगाववाद के नैरेटिव से जोड़ दिया. चीनी पक्ष का कहना है कि तिब्बत चीन का अभिन्न हिस्सा रहा है और फिल्म इस ऐतिहासिक स्थिति को चुनौती देने की कोशिश करती है. फिल्म के निर्देशक खुद इस विवाद को लेकर काफी मुखर हैं. अगस्त में फिल्म के हिंदी ट्रेलर लॉन्च के दौरान खिमसार ने दावा किया कि चीनी सरकार ने फिल्म को रोकने की कोशिश की थी.
वहीं, भारत में फिल्म की रिलीज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका विषय भारत के अपने इतिहास से सीधे जुड़ता है. 1959 में दलाई लामा तिब्बत से निकलकर भारत पहुंचे थे और तब से भारत में उनका निर्वासित जीवन तिब्बत के राजनीतिक प्रश्न का अहम हिस्सा बना हुआ है. Four Rivers Six Ranges उस पलायन को किसी राजनयिक दस्तावेज की तरह नहीं, बल्कि उन आम तिब्बती लड़ाकों की नजर से देखने की कोशिश करती है, जिन्होंने खतरनाक हिमालयी रास्तों से दलाई लामा को सुरक्षित निकालने में मदद की थी. इस लिहाज से फिल्म केवल दलाई लामा की कहानी नहीं है. यह उन लोगों की कहानी भी है, जिनका नाम इतिहास की मुख्यधारा में अपेक्षाकृत कम सुनाई देता है.
फिल्म को लेकर एक और खास बात यह है कि यह किसी बड़े स्टूडियो की भारी-भरकम फिल्म नहीं है. सीमित बजट में बनी यह अंग्रेजी भाषा की फिल्म है, जिसमें तिब्बती कलाकारों ने बड़ी संख्या में काम किया है. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने हिंदी वॉयसओवर दिया है, जबकि हॉलीवुड एक्टर और तिब्बत समर्थक रिचर्ड गेरे ने भी फिल्म का खुलकर सपोर्ट किया.
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क