Ramayana Review: भव्यता के नाम पर रामायण की आत्मा से खिलवाड़?

क्या रामायणम सिर्फ भव्यता और VFX तक सिमटकर रह गई? यश का रावण कितना दमदार है और रणबीर-साई पल्लवी ने कैसा काम किया? पढ़ें हमारा बेबाक रिव्यू.

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रामायण फिल्म कैसी है- मेरे नजरिए से (Photo: Screengrab) रामायण फिल्म कैसी है- मेरे नजरिए से (Photo: Screengrab)

आरती गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 05 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:13 PM IST
फिल्म:एपिक फैंटेसी
3/5
  • कलाकार : रणबीर कपूर, यश, साई पल्लवी, रवि दुबे, रकुलप्रीत सिंह, अरुण गोविल
  • निर्देशक :नितेश तिवारी

रामायण की कहानी भारतीय दर्शकों के लिए सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ या पौराणिक कथा नहीं, बल्कि भावनाओं, आस्था और संस्कारों से जुड़ी ऐसी गाथा है, जिसके हर किरदार का अपना एक खास प्रभाव है. ऐसे में जब पर्दे पर रामायण को नए अंदाज में दिखाने की कोशिश होती है, तो दर्शकों की उम्मीदें भी काफी बढ़ जाती हैं.

मैंने भी इसी उम्मीद के साथ प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा और डायरेक्टर नितेश तिवारी की रामायण फिल्म देखी, लेकिन कई मायनों में निराशा हाथ लगी. हालांकि, कुछ दृश्य ऐसे जरूर थे, जिन्होंने मेरा ध्यान फिल्म से हटने नहीं दिया.

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तो आइए, फिल्म की कहानी पर बात करने के बजाय सीधे इसके ट्रीटमेंट पर रोशनी डालते हैं, क्योंकि रामायण की कहानी अमूमन सभी की जानकारी में है. अगर इसके तथ्यों और घटनाओं की गहराई में जाऊं, तो ऐसी कई बातें हैं जो खटकती हैं. फिल्म कई मौकों पर सिनेमाई स्वतंत्रता लेते हुए वास्तविकता से परे चली जाती है और सिर्फ एक भव्य सिनेमाई अनुभव देने की कोशिश करती है. हालांकि, इस पहलू पर हम अगले आर्टिकल में बात करेंगे. फिलहाल, इस पर ध्यान देते हैं कि मेरे नजरिए से फिल्म कैसी है.

रावण के उदय से होती है भव्य दुनिया की शुरुआत

नितेश तिवारी की इस फिल्म की शुरुआत अनुपम खेर की आवाज से होती है, जिसमें सृष्टि की रचना की कहानी सुनाई जाती है. शुरुआत से ही फिल्म एक भव्य दुनिया रचने की कोशिश करती है. इसके बाद रावण की मां कैकसी का इंद्र समेत अन्य देवताओं के साथ युद्ध दिखाया जाता है, जिसमें उनकी हार हो जाती है. यह दृश्य मुझे 'कल्कि 2898 एडी' की याद दिलाता है, जहां गरीबी की मार झेल रहे लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं और अपने मसीहा के इंतजार में हैं. यहां वह मसीहा रावण बनता है.

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इसके बावजूद एक बड़ी बात खटकती है कि फिल्म रावण के जन्म के प्रसंग को छूती तक नहीं है. उसके पिता ऋषि विश्रवा का जिक्र भी सिर्फ एक बार, मां कैकसी के जरिए होता है. इससे पहले रावण की रुचि सिर्फ संगीत में दिखाई जाती है. मां के सामने सच्चाई आने के बाद वह तपस्या करने निकल पड़ता है और दशानन से रावण बनकर लौटता है.

यहां एक दर्शक और रामायण की प्रशंसक होने के नाते मैं महादेव के साथ उसका जुड़ाव भी मिस करती हूं. फिल्म में ब्रह्मा जी के लिए रावण की तपस्या तो दिखाई गई है, लेकिन महादेव की आराधना का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह छोड़ दिया गया है. इसके नाम पर सिर्फ रावण का तांडव दिखाकर उसके उदय को दर्शा दिया गया है. रावण के रूप में यश को प्रचंड और रौद्र दिखाने के चक्कर में निर्देशक नितेश तिवारी उसके व्यक्तित्व के दूसरे पहलुओं को उभारना भूल गए.

दलील दी जा सकती है कि यह एक फिल्म है और आखिर कितने दृश्य दिखाए जा सकते हैं. हर कथा को अलग-अलग रामायण संग्रह से लिया गया है. हर पहलू को कवर करना मुश्किल होता है. लेकिन जब आप फिल्म को कई भागों में बनाने की स्वतंत्रता लेते हैं, तो मेरे ख्याल से पांच मिनट का एक अतिरिक्त दृश्य जोड़कर इसे और बेहतर बनाया जा सकता था.

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लाइटनिंग स्पीड से भागती फिल्म

फर्स्ट हाफ में फिल्म का बिल्डअप इतनी तेजी से आगे बढ़ता है कि कई दृश्य एक-दूसरे से ठीक तरह जुड़ ही नहीं पाते. दर्शकों को भीतर तक झकझोरने के लिए इंटरवल से पहले दिखाया गया 15 मिनट का वनवास वाला दृश्य बेहद जरूरी लगता है. हालांकि, यह दृश्य सीधे दिल में उतरता है. जब दशरथ बने अरुण गोविल पुत्र वियोग में तड़प रहे होते हैं और राम वनवास के लिए निकलते हैं, तब पिता की चीत्कार बेटे के मन को विचलित करती है. इसके बावजूद वचनबद्ध राम अपनी आगे की राह पर बढ़ जाते हैं.

फिल्म में रावण के शासन और उसके प्रभाव को दिखाने की कोशिश इतनी तेजी से की गई है कि इसी चक्कर में रामायण का असली सार कहीं पीछे छूटता नजर आता है. किरदारों के बीच संवाद और घटनाओं को जिस तेजी से आगे बढ़ाया गया है, उससे कहानी में ठहराव की कमी महसूस होती है. रामायण जैसे विषय में दर्शक सिर्फ घटनाएं नहीं देखना चाहता, बल्कि उन घटनाओं के पीछे छिपी भावनाओं को भी महसूस करना चाहता है. फिल्म इस मामले में काफी हद तक निराश करती है. किरदारों के बोलने का अंदाज और उनकी भाषा भी कई बार खटकती है.

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किरदारों की भाषा करती है परेशान

आमतौर पर जब भी हम किसी पौराणिक कथा की बात करते हैं, तो मन में अनायास ही एक सम्मान का भाव जाग उठता है. लेकिन यहां किरदारों को 'तुम' से 'तू' पर आते देर नहीं लगती. जहां तक मेरी समझ है, मैंने किसी ग्रंथ पर आधारित फिल्म या सीरीज में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल आमतौर पर नहीं देखा है. ऐसे में नितेश तिवारी की रामायण में 'तेरी-तेरा' और 'तू-तुम' जैसी भाषा का इस्तेमाल अलग ही प्रभाव छोड़ता है.

इसे सुनकर ऐसा लगता है कि फिल्म अपने किरदारों के व्यक्तित्व और उनके प्रभाव को ठीक से समझ नहीं पाई है. संवादों में वह गंभीरता और ठहराव नहीं है, जिसकी इस कहानी से उम्मीद की जाती है. भाषा में यह गंभीरता सिर्फ अरुण गोविल के बोलने के अंदाज में नजर आती है, जो इस मामले में बाकी किरदारों से बिल्कुल अलग प्रभाव छोड़ते हैं.

भव्यता और वीएफएक्स के बीच उलझी फिल्म

फिल्म का वीएफएक्स ठीक-ठाक है. दिव्य अस्त्रों और वीएफएक्स के जरिए रची गई भव्य दुनिया पर्दे पर एक अलग अनुभव देने की कोशिश करती है. फिल्म के विजुअल्स और बड़े स्तर पर फिल्माए गए दृश्य इसकी ताकत हैं. लेकिन इसी भव्यता और भावनात्मक जुड़ाव के बीच मेकर्स उलझते नजर आते हैं. एक तरफ फिल्म दिव्य अस्त्रों, विशाल युद्ध और भव्य दुनिया के जरिए दर्शकों को आकर्षित करना चाहती है, तो दूसरी तरफ कहानी के भावनात्मक पहलुओं को भी पकड़ने की कोशिश करती है. नतीजा यह होता है कि दोनों के बीच संतुलन बिगड़ जाता है और रामायण की आत्मा कहीं पीछे छूट जाती है.

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फिल्म रामायण के माहौल और किरदारों का ऑरा बनाने के लिए रियलिज्म का सहारा लेती है, लेकिन कई बार यही कोशिश उसके पौराणिक प्रभाव को कमजोर कर देती है.

इंटरवल के बाद फिल्म थोड़ी गति पकड़ती है और कुछ दृश्य अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं. शूर्पणखा के प्रसंग के बाद राक्षसों का वध फिल्म के सबसे बेहतरीन दृश्यों में शामिल है. यहां एक्शन और कहानी का मेल बेहतर नजर आता है. रावण के दस सिर दिखाने वाला दृश्य भी काफी प्रभावशाली है. रावण के व्यक्तित्व और उसकी ताकत को दर्शाने के लिहाज से यह सीन खास बन पड़ता है. वहीं, सीता हरण का दृश्य भी प्रभावित करता है. इस प्रसंग में फिल्म अपने भव्य अंदाज और दृश्यात्मक प्रस्तुति के जरिए दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहती है.

फिल्म की USP है जटायु

फिल्म की शुरुआत रावण की कहानी से होती है, लेकिन इसका समापन राम की प्रतिज्ञा के साथ होता है. फिल्म देखते हुए पहले ही अंदाजा हो जाता है कि इसका अंत इसी तरह होगा. लेकिन इस पूरे सफर में जो किरदार लगातार आपका ध्यान अपनी ओर खींचता है, वह है जटायु. भले ही इस किरदार को पूरी तरह वीएफएक्स की मदद से तैयार किया गया है, लेकिन अनुपम खेर की आवाज इसे जीवंत करने में कोई कसर नहीं छोड़ती. यकीन मानिए, जटायु आपके दिल में एक अलग जगह बना लेगा.

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राम के किरदार में रणबीर कपूर ठीक लगते हैं, वहीं साई पल्लवी अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं. यश का ऑरा पूरी फिल्म में छाया रहता है और रावण के रूप में उनकी मौजूदगी दमदार लगती है. हालांकि, कई बार भव्य सेट्स के सामने किरदार इतने छोटे नजर आते हैं कि उस दुनिया पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है. फिल्म की भव्यता और किरदारों के बीच संतुलन की कमी भी खटकती है.

फिल्म की बाकी स्टार कास्ट की बात करें तो इसमें रवि दुबे, अरुण गोविल, लारा दत्ता, रकुल प्रीत, शोभना, विवेक ओबेरॉय, शीबा चड्ढा और कुणाल कपूर जैसे कई कलाकार नजर आते हैं. सभी ने अपने किरदारों को बेहतर ढंग से निभाने की पूरी कोशिश की है. हालांकि, यश, साई पल्लवी, कई मौकों पर रणबीर कपूर और शोभना के साथ-साथ शीबा चड्ढा भी खास तौर पर प्रभावित करती हैं. इन कलाकारों ने अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से दर्शकों के दिल में जगह बनाई है.

साफ और सीधी भाषा में कहें तो 'रामायणम' में भव्यता, ठीक-ठाक वीएफएक्स और कुछ प्रभावशाली दृश्य जरूर हैं, लेकिन सिर्फ बड़े सेट्स, दिव्य अस्त्रों और रावण के रौद्र रूप से रामायण की आत्मा नहीं पकड़ी जा सकती. फिल्म का तेज बिल्डअप, दृश्यों के बीच कमजोर जुड़ाव, किरदारों की अटपटी भाषा और भावनाओं की कमी इसे एक अधूरा अनुभव बनाते हैं.

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रामायण की आत्मा से दूर रह गई रामायणम

फिल्म कहानी के स्तर पर उस गहराई तक नहीं पहुंच पाती, जिसकी रामायण जैसी महान कथा से उम्मीद की जाती है. समझ नहीं आता कि क्या इसे जेन-जी (Gen Z) वाली रामायण बनाने की कोशिश की गई है? इंटरवल के बाद कुछ दृश्य फिल्म को संभालते जरूर हैं, लेकिन कहानी में जिस ठहराव, गंभीरता और भावनात्मक गहराई की जरूरत थी, वह पूरी तरह नजर नहीं आती. रामायण जैसी महान कथा को सिर्फ भव्यता के सहारे नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं और मूल सार को समझकर पर्दे पर उतारने की जरूरत है.

इसीलिए मैं इस फिल्म को 3 स्टार देना ही सही समझती हूं.

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