सिनेमा में आवाज का काफी महत्व होता है... ये किसी भी किरदार की खास पहचान होती है, कई बार आप बिना देखे ही आवाज से पहचान जाते हैं कि ये आवाज किस किरदार की है. आवाज किसी एक्टर की एक्टिंग में जान फूंकने का काम करती है. लेकिन तब क्या हो जब वही जानी-पहचानी आवाज पर्दे पर किसी और ही एक्टर के मुंह से निकले और आप चकरा जाएं?
कुछ ऐसा ही एक्सपीरियंस इस समय नितेश तिवारी की मचअवेटेड महाकाव्य फिल्म 'रामायण' को देखकर हुआ. करीब 4000 करोड़ रुपये के भव्य बजट वाली इस फिल्म का बज हर तरफ है. फिल्म में कन्नड़ सिनेमा के 'रॉकी भाई' यानी यश लंकापति रावण के किरदार में नजर आ रहे हैं. उनका स्क्रीन प्रेजेंस, आक्रामक तेवर और स्वैग देखते ही बनता है. लेकिन जैसे ही वे हिंदी में संवाद बोलते हैं, एक अजीब सा डिस्कनेक्शन महसूस होता है और इसकी वजह है उनकी हिंदी डबिंग.
रावण की आवाज सुनकर किसकी याद आई?
'रामायण' में यश के इस अहम किरदार को अपनी भारी-भरकम आवाज दी है मशहूर एक्टर और वॉयस आर्टिस्ट शरद केलकर ने. इसमें कोई शक नहीं है कि शरद की आवाज का वजन, गहराई और गूंज कमाल की है. उन्होंने अपनी आवाज से कई बड़े किरदारों को अमर किया है लेकिन यहां समस्या आवाज की क्वालिटी में नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़े उस 'पॉप-कल्चर कनेक्शन' में है जो दर्शकों के दिमाग में सालों से बैठा हुआ है.
जैसे ही परदे पर यश का रावण गरजता है, दिमाग तुरंत साल 2015 की तरफ यानी प्रभास की फिल्म 'बाहुबली' की यादों में खो जाता है. शरद केलकर ने ही उस ऐतिहासिक फिल्म में अमरेंद्र और महेंद्र बाहुबली के लिए हिंदी में डबिंग की थी. वह आवाज आज भी हमारे जेहन में एक न्यायप्रिय और महान योद्धा के रूप में जिंदा है. अब वही जानी-पहचानी आवाज जब एक खूंखार खलनायक यानी 'रावण' के मुंह से निकलती है, तो ध्यान कहानी से भटककर सीधे उस पुरानी याद से जा उलझता है.
मेकर्स से कहां हुई चूक?
डबिंग के इस खेल में सबसे बड़ा पेंच यही फंसता है कि बाहुबली की आवाज में एक पवित्रता, धर्म और मर्यादा का भाव था. इसके उलट, रावण के किरदार में अहंकार, असीम ज्ञान का घमंड और एक खतरनाक क्रूरता साफ झलकनी चाहिए. जब उसी पुरानी टोन को एक खलनायक के रूप में सुना जाता है, तो किरदार का वो खौफनाक और अलग असर थोड़ा फीका पड़ जाता है. सच कहें तो अगर यश खुद अपनी फिल्मों के लिए हिंदी में डबिंग करते, तो शायद वो इस किरदार के साथ और भी ज्यादा न्याय कर पाते, क्योंकि उनकी अपनी आवाज में भी एक नेचुरल भारीपन और दबंगई है.
हालांकि K.G.F और टॉक्सिक में दर्शकों ने यश को एक अलग और नए अंदाज में सुना था. तब उनकी डबिंग सचिन गोले ने की थी. अब शरद केलकर की ट्रेडिशनल-ड्रामा वॉइस यश के मॉडर्न और रफ-एंड-टफ स्क्रीन प्रेजेंस के साथ पूरी तरह मेल खाती हुई महसूस नहीं होती. इसमें कोई दोराय नहीं कि शरद केलकर एक बेहतरीन आर्टिस्ट हैं, लेकिन कभी-कभी उनकी आइकॉनिक पहचान किरदार पर भारी पड़ जाती है.
मेरे नजरिए में यदि 'रामायण' में यश के लिए किसी ऐसी आवाज का चुनाव किया जाता, जिसका इतिहास बाहुबली जैसा बड़ा न रहा हो, तो शायद परदे पर रावण का यह खौफनाक रूप हिंदी दर्शकों को और भी ज्यादा असरदार और नया लगता. क्योंकि जब-जब आप सिनेमाघर में रावण की आवाज को आंख बंद करके सुनेंगे, आपको यश नहीं प्रभास ही नजर आएंगे.
शिखर नेगी