पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से किसान, जाट और मुस्लिम समीकरणों की प्रयोगशाला रही है. जयंत चौधरी की 'राष्ट्रीय लोकदल' के भाजपा-एनडीए (NDA) गठबंधन में शामिल होने के बाद विपक्षी 'INDIA ब्लॉक' यानी सपा-कांग्रेस गठबंधन पश्चिमी यूपी में 'आत्मनिर्भर' बनने की फिराक में है. ऐसे में सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उसके बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लोकदल के अध्यक्ष चौधरी सुनील सिंह ने मुलाकात कर गठबंधन में शामिल होने की इच्छा जाहिर की है.
सुनील सिंह ने 2027 में अखिलेश यादव को सीएम और 2029 में राहुल गांधी को पीएम बनाने का ऐलान किया. इसके साथ ही उन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात के दौरान गठबंधन और किसानों से जुड़े मुद्दों पर बात की और इंडिया ब्लॉक में 35 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग रखी.
अखिलेश यादव और राहुल गांधी के साथ सुनील सिंह का मेल-मिलाप और 'इंडिया' गठबंधन में उनके जुड़ाव के पीछे एक सोची-समझी रणनीतिक पटकथा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या नाम और चौधरी चरण सिंह की मूल विरासत का दावा जयंत चौधरी की मजबूत सियासी जमीन में सेंध लगा पाएगा?
जानिए कौन हैं लोकदल वाले सुनील सिंह
चौधरी सुनील सिंह पश्चिमी यूपी के एक प्रमुख सियासी चेहरे और 'लोकदल' पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. वे चौधरी चरण सिंह द्वारा 1979 में स्थापित मूल 'लोकदल' के नाम, विचार और चुनाव चिन्ह (खेत जोतता किसान) के उत्तराधिकार का दावा करते हैं. सुनील सिंह का जन्म 1 जनवरी 1971 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुआ था. उन्होंने इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद बिजनेस मैनेजमेंट में एमबीए किया और फिर सियासत में कदम रख दिया,.
सुनील सिंह को सियासत अपने पिता से विरासत में मिली हैं. वे एक प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से आते हैं. उनके पिता चौधरी राजेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री और वरिष्ठ विधायक रह चुके हैं।.राजेंद्र सिंह पुराने समाजवादी नेता थे और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह व मुलायम सिंह यादव दोनों के बेहद करीबी माने जाते थे.
सुनील सिंह सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) के सदस्य रह चुके हैं.उन्हें मुलायम सिंह यादव का बेहद करीबी माना जाता रहा है. वर्ष 2017 में जब सपा में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच विवाद हुआ था, तब सुनील सिंह ने खुलकर मुलायम सिंह का समर्थन किया था. उन्होंने मुलायम सिंह को अपनी पार्टी 'लोकदल' के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने तक का प्रस्ताव दिया था. अब अखिलेश यादव के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरने का दांव चल रहे हैं.
जयंत चौधरी की काट बनाने की कोशिश
उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी नई सियासी प्रयोगशाला बन रही है, जिस पर सभी दल नजरें लगाए हुए हैं. ऐसे में विपक्षी गठबंधन भी पश्चिमी यूपी में अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त करने के लिए काफी मशक्कत कर रहा है. जयंत चौधरी के एनडीए खेमे के साथ जाने के बाद सपा और कांग्रेस ने लोकदल के रूप में एक सहयोगी को तलाशा है.
विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि जयंत चौधरी ने भाजपा के साथ जाकर चौधरी चरण सिंह की किसान और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से समझौता कर लिया है. ऐसे में सुनील सिंह के 'लोकदल' को चौधरी चरण सिंह की 'सच्ची और मूल विरासत' के रूप में पेश करने की योजना है. जयंत के एनडीए में जाने के बाद पश्चिमी यूपी का मुस्लिम मतदाता रालोद से छिटका है. सपा-कांग्रेस सुनील सिंह को साथ रखकर जाट-मुस्लिम-किसान एकता की नई धुरी गढ़ना चाहती हैं.
ग्रामीण इलाकों में कई बुजुर्ग और कैडर कार्यकर्ता आज भी 'लोकदल' नाम और 'किसान' के निशान से जुड़ाव रखते हैं. गठबंधन लोकदल के बैनर या चेहरे का सही इस्तेमाल करता है, तो जयंत चौधरी के वोट बैंक में कुछ सेंधमारी सपा-कांग्रेस के लिए फायदे की उम्मीद मानी जा रही है. सुनील सिंह ने कहा, "मैं किंग नहीं किंगमेकर बनना चाहता हूं." उन्होंने किसानों, युवाओं, रोजगार, महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों को उठाने की बात कही, लेकिन जयंत चौधरी के बारे में सुनील सिंह ने कहा कि वे उनके लिए कोई चुनौती नहीं हैं.
सुनील सिंह की सियासी ताकत कितनी है
सुनील सिंह भले ही लोकदल के जरिए जयंत चौधरी का विकल्प बनने की बात कर रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत काफी अलग है. सुनील सिंह के लोकदल का सियासी आधार बहुत सीमित है. 2017, 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा के नतीजे बताते हैं कि पार्टी का अपना कैडर ढांचा नहीं के बराबर है और अधिकांश सीटों पर इसके उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए.
जयंत चौधरी भले ही एनडीए में चले गए हों, लेकिन पश्चिमी यूपी में चौधरी चरण सिंह के परिवार के प्रति जाट समाज और किसान वर्ग का भावनात्मक जुड़ाव अभी भी बरकरार है. जयंत को केंद्र में मंत्री पद मिलने के बाद से उनका राजनीतिक वजन और बढ़ा ही है. जाट समुदाय के साथ-साथ त्यागी और दूसरी जातियों के बीच भी जयंत ने अपनी पैठ मजबूत की है, जबकि सुनील सिंह लोकदल के जरिए कुछ खास नहीं कर सके. अलीगढ़ और हाथरस के इलाके में जरूर कुछ आधार रहा है, लेकिन इतना नहीं कि जीत दर्ज कर सकें.
सुनील सिंह ने 2027 चुनाव के लिए अलीगढ़, हाथरस और हापुड़ जैसे क्षेत्रों में 35 सीटों की मांग रखी है. सपा और कांग्रेस अपने मजबूत जनाधार वाले क्षेत्रों में किसी नए या कमजोर सहयोगी को इतनी सीटें नहीं देना चाहेंगी. ऐसे में बहुत ज्यादा हुआ तो एक से दो सीटें उन्हें मिल सकती हैं, ताकि सपा-कांग्रेस उनकी पार्टी के नाम को भुना सकें.
पश्चिमी यूपी में क्या तुरुप का इक्का साबित होंगे
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा, कांग्रेस और सुनील सिंह का लोकदल एक साथ मिलकर पूरी ताकत से चुनाव लड़ते हैं, तो उसका असर पश्चिमी यूपी में देखने को मिल सकता है. अभी तक हुए चुनावी नतीजों में भले ही लोकदल को सीटें न मिली हों, लेकिन यह रालोद-भाजपा गठबंधन के खिलाफ प्रचार में एक 'वैचारिक ढाल' का काम करेगा.
पश्चिमी यूपी की कई विधानसभा सीटों पर हार-जीत का अंतर बेहद कम, 2,000 से 5,000 वोट के बीच होता है. ऐसे में सुनील सिंह का लोकदल 'जाट और किसान' के नाम पर इतने वोट भी काटकर इंडिया ब्लॉक के खाते में ले आता है, तो इसका सीधा फायदा सपा-कांग्रेस गठबंधन को मिलेगा और भाजपा-रालोद का समीकरण बिगड़ सकता है.
चौधरी सुनील सिंह का 'लोकदल' जयंत चौधरी की RLD को सीधे तौर पर पूरी तरह से बेदखल करने की स्थिति में नहीं है. हालांकि, अखिलेश यादव और राहुल गांधी के लिए सुनील सिंह एक ऐसा रणनीतिक हथियार हैं, जिसके जरिए वे पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी के एनडीए में जाने से पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने और किसान-जाट राजनीति के केंद्र में 'चौधरी चरण सिंह' के नाम की गूंज बनाए रखने की पुरजोर कोशिश करेंगे.
कुबूल अहमद