हापुड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक जिला-स्तरीय शहर, व्यापार का बड़ा केंद्र और औद्योगिक हब है, और यह दिल्ली नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) का हिस्सा है. यह लंबे समय से आस-पास के इलाकों के लिए एक अहम बाजार रहा है और साथ ही पश्चिमी यूपी की राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीटों में से एक रहा है.
जाति (SC) के लिए आरक्षित है और मेरठ लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. इसमें हापुड़ म्युनिसिपल बोर्ड का इलाका, बाबूगढ़ नगर पंचायत और इस क्षेत्र के कई गांव शामिल हैं, जिससे इस सीट का स्वरूप शहरी और ग्रामीण दोनों तरह का है.
हापुड़ में अब तक 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. शुरुआती सालों में कांग्रेस का दबदबा रहा और उसने अब तक सबसे ज्यादा सात बार यह सीट जीती है. बीजेपी ने यह सीट चार बार जीती है, जिसमें पिछले दो चुनाव भी शामिल हैं, जबकि बीएसपी ने इसे दो बार जीता है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने भी एक-एक बार यह सीट जीती है.
कांग्रेस के गजराज सिंह ने 2012 में चौथी बार जीत हासिल की. इससे पहले वे 1985, 1989 और 1993 में भी यह सीट जीत चुके थे. उन्होंने मौजूदा बीएसपी विधायक धर्मपाल सिंह को 22,152 वोटों से हराया. धर्मपाल सिंह ने इससे पहले 2002 और 2007 में लगातार दो बार बीएसपी के लिए यह सीट जीती थी.
बीजेपी ने 2017 में विजय पाल के जरिए यह सीट जीती, जिन्होंने मौजूदा कांग्रेस विधायक गजराज सिंह को 15,006 वोटों से हराया. 2022 में, विजय पाल ने बीजेपी के लिए यह सीट बरकरार रखी और गजराज सिंह को 7,034 वोटों से हराया. गजराज सिंह तब RLD में शामिल हो गए थे. विजय पाल को 97,862 वोट मिले, जबकि गजराज सिंह को 90,828 वोट मिले.
लोकसभा चुनावों में भी हापुड़ के वोटिंग पैटर्न में बदलाव देखा गया है. हापुड़ सीट पर 2009 में BJP, BSP से 1,703 वोटों से आगे थी और 2014 में यह अंतर बढ़कर 31,729 वोट हो गया, जबकि 2019 में BSP ने BJP पर 18,446 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में, इस सीट पर समाजवादी पार्टी BJP से 11,622 वोटों से आगे रही, भले ही मेरठ सीट पर कुल मिलाकर BJP के अरुण गोविल जीते. यह पैटर्न दिखाता है कि यहां विधानसभा और संसदीय चुनाव के नतीजे हमेशा एक ही दिशा में नहीं जाते हैं.
समय के साथ यहां वोटरों की संख्या लगातार बढ़ी है. रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या 2012 में 296,679, 2017 में 345,001, 2019 में 357,554, 2022 में 368,481 और 2024 में 380,186 थी. वोटिंग प्रतिशत भी आम तौर पर अच्छा रहा है- 2012 में 62.38%, 2017 में 64.54%, 2019 में 65.74%, 2022 में 67.01% और 2024 में 59.67%.
हापुड़ हिंदू-बहुसंख्यक सीट है. यह एक आरक्षित सीट है जहां अनुसूचित जाति के वोटर एक बड़ा समूह बनाते हैं और कुल वोटरों का 26.87% हिस्सा हैं. शहरी वोटरों की संख्या ग्रामीण वोटरों से थोड़ी ज्यादा है. 55.37% वोटर शहरी हैं जबकि 44.63% वोटर गांवों में रहते हैं. इस वजह से, आस-पास की कई ग्रामीण सीटों की तुलना में इस सीट का स्वरूप ज्यादा मिला-जुला है. इस सीट पर दलित, OBC और व्यापारी जातियों के वोटरों का असर रहा है, जिससे यहां पार्टियों के बीच मुकाबला कड़ा बना रहता है.
हापुड़ का इतिहास आधुनिक राजनीतिक दौर से भी बहुत पुराना है. मुगल काल से पहले, यह पश्चिमी गंगा के मैदानी इलाके में एक बस्ती के तौर पर विकसित हुआ था. अपनी लोकेशन की वजह से यह आस-पास के इलाके के लिए एक लोकल मार्केट के तौर पर उभरा. मुगल काल में, दिल्ली इलाके को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जोड़ने वाले व्यापारिक रास्तों की वजह से इसका महत्व और बढ़ गया. अंग्रेजों के समय में, मैदानी इलाके में होने और आस-पास के कस्बों व परिवहन मार्गों से जुड़े होने के कारण हापुड़ एक प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ.
भौगोलिक दृष्टि से, हापुड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जलोढ़ मैदानों में स्थित है. यहां की जमीन समतल और उपजाऊ है, जिससे शहर के आस-पास और पूरे निर्वाचन क्षेत्र में खेती को बढ़ावा मिला है. इलाके की समतल जमीन और सड़क संपर्क ने इसे व्यापारिक केंद्र और छोटे उद्योगों के आधार के रूप में विकसित होने में भी मदद की है.
सड़क संपर्क हापुड़ की मुख्य खूबियों में से एक है. यह हाईवे और जिला सड़कों के जरिए गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर और बड़े NCR क्षेत्र से जुड़ा हुआ है, साथ ही दिल्ली, नोएडा और ग्रेटर नोएडा तक सड़क मार्ग से यात्रा करना भी आसान है. हापुड़ एक महत्वपूर्ण रेलवे कॉरिडोर पर भी स्थित है, जहां से रेल संपर्क इसे दिल्ली, मेरठ, मुरादाबाद और पश्चिमी यूपी के अन्य हिस्सों से जोड़ते हैं.
यहां की मौजूदा अर्थव्यवस्था में व्यापार, कृषि, परिवहन, सेवाएं और छोटे पैमाने पर विनिर्माण शामिल हैं. हापुड़ खास तौर पर स्टेनलेस स्टील के पाइप और ट्यूब, पापड़, पेपर कोन और इनसे जुड़े उद्योगों के लिए जाना जाता है. इसके थोक बाजार और परिवहन गतिविधियां इसे आस-पास के गांवों और छोटी बस्तियों के लिए एक सेवा केंद्र भी बनाती हैं.
आस-पास के कस्बों और शहरों में गढ़मुक्तेश्वर (लगभग 20 किमी दूर), बुलंदशहर (लगभग 35 किमी दूर), मेरठ (लगभग 35 किमी दूर), गाजियाबाद (लगभग 45 किमी दूर), नोएडा (लगभग 55 किमी दूर), ग्रेटर नोएडा (लगभग 50 किमी दूर), दिल्ली (लगभग 60 किमी दूर) और राज्य की राजधानी लखनऊ (सड़क मार्ग से लगभग 433 किमी दूर) शामिल हैं. NCR और पश्चिमी यूपी क्षेत्र के बीच स्थित होने के कारण हापुड़ को व्यापारिक और राजनीतिक, दोनों तरह का महत्व मिला है.
भले ही BJP ने पिछले दो विधानसभा चुनावों में यह सीट जीती हो, लेकिन जीत का अंतर इतना बड़ा नहीं रहा है कि इस सीट को बनाए रखना उसके लिए आसान हो. संसदीय चुनावों में पार्टी का मिला-जुला प्रदर्शन बताता है कि 2027 में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार का चयन, जातिगत संतुलन और गठबंधन की स्थिति बहुत मायने रखेगी. संभावना है कि 2027 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी, उनमें हापुड़ भी शामिल होगी.
(अजय झा)