उत्तर प्रदेश: दशकों से छपरौली सीट पर RLD का कब्जा... क्या है इस सीट पर सियासी मिजाज़

बागपत की छपरौली विधानसभा सीट राष्ट्रीय लोकदल का मजबूत गढ़ है, जहां दशकों से चौधरी चरण सिंह परिवार की राजनीतिक विरासत कायम है. इस सीट पर जाट और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

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RLD अध्यक्ष जयंत चौधरी (फाइल फोटो) RLD अध्यक्ष जयंत चौधरी (फाइल फोटो)

मनुदेव उपाध्याय

  • बागपत,
  • 04 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:25 AM IST

बागपत की छपरौली सीट मात्र एक विधानसभा सीट नहीं है, इसे राष्ट्रीय लोकदल का अभेद्य किला माना जाता है. यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत का ऐसा गढ़ है, जहां दशकों से चौधरी चरण सिंह और उनके परिवार की राजनीतिक विरासत की गूंज सुनाई दी है. 

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के दौर से इस सीट पर राष्ट्रीय लोकदल का कब्जा है. और आज भी यहां राष्ट्रीय लोकदल का दबदबा कायम है. यही कारण है कि छपरौली को राष्ट्रीय लोकदल का अभेद्य किला मानी जाती है. लेकिन इस बार 2027 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर क्या होता है, यह देखना होगा. 

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छपरौली सीट का इतिहास

अगर इस सीट के इतिहास की बात करें तो साल 2007 के विधानसभा चुनाव में छपरौली सीट से राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवार अजय तोमर ने जीत हासिल की थी. उस समय बसपा के गजेंद्र मुन्ना दूसरे स्थान पर रहे थे. फिर साल 2012 में भी राष्ट्रीय लोकदल ने अपने इस कब्जे को बरकरार रखा. इस बार वीरपाल राठी ने इस सीट पर जीत हासिल की.

2017 में भी छपरौली में राष्ट्रीय लोकदल का विजय रथ चला. राष्ट्रीय लोकदल के सहेंद्र सिंह रमाला ने बीजेपी के सत्येंद्र सिंह को शिकस्त देकर इस सीट पर RLD का कब्जा बरकरार रखा. हालांकि चुनाव के बाद उन्होंने बीजेपी का थामन लिया. 

साल 2022 में सहेंद्र रमाला बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. जनता ने RLD पर भरोसा जताया और डॉ. अजय कुमार विधायक चुने गए. इससे पहले 2002 में भी डॉ. अजय कुमार ने छपरौली में जीत दर्ज की थी. छपरौली का इतिहास चौधरी चरण सिंह परिवार की राजनीतिक विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है. 

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पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह खुद इस सीट से छह बार विधायक रह चुके हैं. इसके बाद उनकी बेटी सरोज ने 1985 में यहां से विधानसभा चुनाव जीता, जबकि उनके बेटे अजित सिंह भी 1991 में छपरौली से विधायक बने. यही वजह है कि छपरौली को पश्चिमी यूपी में चौधरी चरण सिंह परिवार के सबसे मजबूत राजनीतिक किलों में गिना जाता है. यहां की राजनीति में सिर्फ चुनावी आंकड़े नहीं, बल्कि किसान, जाट और ग्रामीण राजनीति की विरासत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

क्या कहते हैं जातीय आंकड़े

छपरौली के चुनावी गणित में जाट और मुस्लिम मतदाता सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं. दोनों समुदायों का एकजुट रुख किसी भी चुनाव में जीत-हार की दिशा तय करने की क्षमता रखता है. छपरौली सीट को समझें तो जाट मतदाता यहां सबसे प्रभावशाली सामाजिक आधार माने जाते हैं. इनके साथ मुस्लिम, अनुसूचित जाति, गुर्जर, कश्यप, सैनी, ब्राह्मण, त्यागी और दूसरे ग्रामीण समुदाय चुनावी परिणाम पर असर डालते हैं. 2026 की अंतिम मतदाता सूची के मुताबिक, छपरौली विधानससभा में कुल 2,93,080 मतदाता हैं.

अनुमानित तौर पर छपरौली विधानसभा क्षेत्र में करीब 1.30 से 1.32 लाख जाट मतदाता हैं, करीब 60 हजार मुस्लिम मतदाता हैं, कश्यप मतदाता करीब 25 हजार है, गुर्जर मतदाता करीब 15 से 20 हजार है, SC मतदाता करीब 11% है, ब्राह्मण मतदाता करीब 15 हजार है और लगभग 10 हजार राजपूत मतदाता है.

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हालांकि जातीय आंकड़े अलग-अलग स्रोतों और चुनावों में बदल सकते हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर जाट मतदाताओं की बड़ी संख्या और मुस्लिम मतदाताओं का रुख छपरौली के चुनावी समीकरण में बेहद अहम माना जाता है.

छपरौली की खासियत सिर्फ यह नहीं कि यहां RLD बार-बार जीतती रही है. असली कहानी यह है कि चौधरी चरण सिंह के नाम से जुड़ी किसान राजनीति की जड़ें यहां बेहद गहरी हैं. यही राजनीतिक विरासत आगे चलकर अजित सिंह और फिर RLD की सियासत का आधार बनी.

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कई चुनावों में सत्ता का समीकरण बदला, उम्मीदवार बदले, पार्टियों के चेहरे बदले, लेकिन छपरौली का राजनीतिक मिजाज लंबे समय तक RLD के पक्ष में बना रहा. यही कारण है कि पश्चिमी यूपी की सियासत में जब भी RLD के गढ़ की बात होती है, तो छपरौली का नाम सबसे पहले लिया जाता है.

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोकदल विधायक डॉ अजय कुमार अपने किए गए विकास कार्यों को बताते हुए 2027 में पार्टी की जीत का दावा कर रहे साथ ही BJP गठबंधन का साथ आना भी पार्टी के लिए अच्छा मान रहे है. जबकि सपा जिलाध्यक्ष मनोज चौधरी किसानों के मुद्दे और कई बुनियादी समस्या का हवाला देते हुए समाजवादी पार्टी का परचम लहराने की हूंकार भर रहे हैं. 

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