उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन तय है, लेकिन सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर सहमति नहीं बन पा रही है. कांग्रेस की तरफ से सीटों की मांग की जा रही है. यूपी के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम से लेकर इमरान मसूद तक 150 सीटों की मांग कर रहे हैं, लेकिन अखिलेश यादव का कहना है कि सीटों की संख्या की बात ही नहीं है, बस 'विनिंग कैंडिडेट' (जिताऊ उम्मीदवार) चाहिए.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने एक रुख पर कायम हैं कि 'प्रत्याशी का नाम बताइए, सीट ले जाइए.' अखिलेश यादव के इस सख्त संदेश का सीधा मतलब है कि सीट बंटवारा सिर्फ मांगों या दावों के आधार पर नहीं होगा, बल्कि उम्मीदवार की जीतने की क्षमता ही सबसे बड़ा पैमाना बनेगी.
यूपी में सपा ने कांग्रेस को 2024 में 17 लोकसभा सीटें दी थी, जिसके लिहाज से 80 से 85 विधानसभा सीटें 2027 के चुनाव में बनती है. कांग्रेस ने 100 से ज्यादा सीटों की डिमांड कर रही है. ऐसे में अखिलेश यादव ने शर्तों का वीटो लगा दिया है?
कांग्रेस के सामने सपा ने रखीं शर्तें
सपा प्रमुख अखिलेश यादव सीट शेयरिंग पर लगातार एक ही बात कहते आ रहे हैं कि गठबंधन में सीटों की संख्या नहीं, बल्कि जीत सबसे अहम होगी. जो प्रत्याशी जीत दर्ज कर सकता है, उसे ही सीट मिलनी चाहिए. 2024 के लोकसभा चुनाव की तर्ज पर ही 2027 के चुनाव के लिए भी सपा ने सीट शेयरिंग पर अपनी बात रख दी है. अखिलेश यादव का मानना है कि प्रत्याशी के चयन से ही चुनावी नतीजे तय होते हैं.
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सपा का कहना है कि कांग्रेस को यूपी की जिन विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ना है, उन सीटों के साथ अपने संभावित उम्मीदवारों के नाम स्पष्ट करने होंगे. सपा ने उन सीटों की सूची मांगी है. कांग्रेस जिन सीटों पर दावेदारी कर रही है, वहां उसका जनाधार और राजनीतिक आधार क्या है, यह स्पष्ट करना होगा. सपा की मांग है कि कांग्रेस उम्मीदवार की जीत की कितनी संभावना है, इसका आकलन भी बताए.
अखिलेश का आक्रामक रुख क्यों?
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठबंधन ने 105 सीटों पर कांग्रेस को मौका दिया था, लेकिन कांग्रेस महज 7 सीटें ही जीत पाई थी. अखिलेश 2027 के चुनाव में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते हैं. सपा इस बार किसी भी हालत में गैर-गंभीर दावों या बिना जमीनी आधार वाली सीटों पर समय और सीटें बर्बाद नहीं करना चाहती.
कांग्रेस की तरफ से करीब 100 सीटों पर दावेदारी की बातें सामने आई थीं. अखिलेश यादव का तर्क है कि गठबंधन में केवल सीटें संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि बीजेपी को हराने के लिए बांटी जाएंगी. इसलिए, जिस सीट पर कांग्रेस के पास जिताऊ और मजबूत चेहरा होगा, वहां सपा तुरंत सीट देने को तैयार है. इसके लिए सीटों के साथ उम्मीदवारों के नामों की फेहरिश्त अखिलेश यादव मांग रहे हैं.
सहारनपुर, रायबरेली, अमेठी और बाराबंकी जैसे जिलों में जहां सपा का मजबूत आधार रहा है या उनके विधायक जीते हुए हैं, वहां सपा अपनी सीटें छोड़ने को तैयार नहीं है. अखिलेश का मानना है कि कांग्रेस को केवल वही सीटें दी जाएं जहां उसके पास मजबूत स्थानीय उम्मीदवार उपलब्ध हों.
अखिलेश का कहना है कि नाम सामने आते ही पहले दिन ही पता चल जाता है कि प्रत्याशी टिकेगा या नहीं. प्रत्याशी के चयन में भी वोट होता है. उनका कहना है कि अगर हमें बीजेपी से चुनाव लड़ना है तो प्रत्याशी मजबूत होना चाहिए. इसीलिए अखिलेश यादव कांग्रेस से सीटों के साथ उम्मीदवारों के नाम मांग रहे हैं.
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कांग्रेस पर दबाव बनाने का दांव तो नहीं?
अखिलेश यादव के इस फॉर्मूले से कांग्रेस के प्रदेश संगठन पर जल्द से जल्द अपने प्रत्याशियों की मजबूत सूची और रिपोर्ट कार्ड पेश करने का दबाव बढ़ गया है. यह बात भी सपा जानती है कि यूपी में कांग्रेस जितनी सीटें मांग रही है, उतनी सीटों पर उसके पास मजबूत प्रत्याशी नहीं हैं. यही दांव 2024 के चुनाव में भी चला था, जिसमें अखिलेश यादव ने प्रयागराज सीट पर अपनी पार्टी के प्रत्याशी को कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़ाया था.
सपा यूपी में 'इंडिया' गठबंधन के मुख्य चेहरे और 'बड़े भाई' की भूमिका में खुद को मजबूती से स्थापित कर रही है. अखिलेश यह संदेश देना चाहते हैं कि राज्य में गठबंधन की ड्राइविंग सीट सपा के पास ही रहेगी. सपा का कहना है कि सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए टिकट देने के बजाय हर सीट पर मजबूत उम्मीदवार उतारने की रणनीति से गठबंधन बीजेपी को हर विधानसभा क्षेत्र में सीधी चुनौती देने का प्लान बना रहा है.
अखिलेश यादव का यह रुख साफ करता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में 'सहानुभूति' या 'संख्या' नहीं, बल्कि 'जिताऊ उम्मीदवार' ही सीट बंटवारे की चाबी बनेगा. ऐसे में कांग्रेस को अगर सीटें चाहिए तो उसे अपने उम्मीदवारों के नामों की फेहरिश्त सौंपनी होगी. हालांकि, कांग्रेस भी इस बात को समझते हुए पहले ही अपने प्रत्याशियों के नामों को शॉर्टलिस्ट करके तैयार रख चुकी है. अब देखना है कि सपा और कांग्रेस में समझौते का क्या फॉर्मूला निकलता है.
कुबूल अहमद