30 हज़ार की कमाई का सच! डिलीवरी पार्टनर की जेब से जाता है ये पैसा

डिलीवरी पार्टनर या बाइक टैक्सी राइडर्स के कई ऐसे खर्च होते हैं, जो प्लेटफॉर्म शुरुआत में सामने नहीं रखते हैं. कई जगह खर्च खुद से भी करना पड़ता है, ऐसे में महीने में होने वाली नेट कमाई ग्रॉस कमाई से काफी अलग हो सकती है.

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एक महीने में डिलीवरी पार्टनर को अपनी जेब से कई खर्च करने होते हैं. एक महीने में डिलीवरी पार्टनर को अपनी जेब से कई खर्च करने होते हैं.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 1:29 PM IST

सोशल मीडिया पर ये हवा बनाई जाती है कि डिलीवरी पार्टनर या राइडर का काम करके भी लोग महीने का 30 से 50 हज़ार रुपये तक कमा रहे हैं. स्विगी, जोमैटो, जेप्टो या ब्लिंकिट जैसे प्लेटफॉर्म महीने में ₹30,000 तक कमाने का दावा करते हैं. लेकिन यह पूरी रकम डिलीवरी पार्टनर या ड्राइवर की शुद्ध बचत नहीं होती. इसमें कई तरह की कटौतियां और खर्च शामिल होते हैं. ये समझना हर किसी के लिए ज़रूरी हो जाता है.

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क्यूंकि प्लेटफॉर्म की तरफ से सीधे काटी जाने वाली फीस, वर्कर की अपनी जेब से होने वाले खर्च और पेनल्टी या नुकसान जैसी बातें इस कमाई को काफी कम कर देती हैं. इन सभी शर्तों को जोड़ने पर ₹30,000 की कुल कमाई में से घर ले जाने वाली असल बचत काफी कम रह जाती है.

कहां-कहां होता है डिलीवरी पार्टनर का खर्च?

इसको आप अलग-अलग उदाहरण से समझ सकते हैं. जैसे प्लेटफॉर्म की सीधी कटौतियों की बात करें तो स्विगी जुड़ने के लिए लगभग ₹1500 की फीस लेती है, जिसे वर्कर की कमाई से कई किश्तों में काटा जाता है. 

ज़ेप्टो वर्कर के पेआउट से ऑनबोर्डिंग फीस, ट्रेनिंग फीस, क्वालिटी कंजर्वेशन फीस और सिक्योरिटी डिपॉजिट की कटौती करता है. उबर कमाई में से अपनी सर्विस फीस और शहर या स्थानीय सरकार के चार्ज काटता है. रैपिडो अपने प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल के बदले कैप्टन से टैक्स सहित सब्सक्रिप्शन फीस वसूलता है. वर्कर को होने वाला भुगतान हमेशा लागू टैक्स की कटौती के बाद किया जाता है.

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इसके अलावा कई खर्च ऐसे हैं जो वर्कर को अपनी जेब से उठाने पड़ते हैं. वाहन, जैसे टू-व्हीलर, को चलाने और उसके रखरखाव का पूरा खर्च डिलीवरी वर्कर को ही उठाना पड़ता है. जिन वर्कर के पास अपना वाहन नहीं है, उन्हें बाइक, साइकिल या कार किराए पर लेनी पड़ती है, जो कमाई में से एक और बड़ा खर्च होता है. 

काम के लिए ज़रूरी स्मार्टफोन का खर्च भी वर्कर को खुद वहन करना होता है. वर्कर को अपने खर्च पर अनिवार्य वाहन बीमा, पर्सनल एक्सीडेंटल डेथ कवरेज और हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी भी खरीदनी होती है.

कमाई पर असर डालने वाली एक और बड़ी बात पेनल्टी और नुकसान है. यदि वर्कर की लापरवाही से ऑर्डर डैमेज होता है, डिलीवर किया गया ऑर्डर गलत होता है, या ऑर्डर पिकअप से पहले कैंसिल हो जाता है, तो वर्कर को उस ऑर्डर की सर्विस फीस नहीं दी जाती है. किसी नुकसान या चोरी की स्थिति में, ऑर्डर की भरपाई या जुर्माना भी वर्कर के पेआउट से काटा जा सकता है.

यानी प्लेटफॉर्म फीस, टैक्स, पेट्रोल, किराया, रखरखाव, स्मार्टफोन, बीमा और पेनल्टी जैसी कटौतियों को निकालने के बाद ₹30,000 की ग्रॉस अर्निंग्स में से बचने वाली रकम काफी कम रह जाती है. यही वजह है कि दावा की गई कुल कमाई और घर ले जाने वाली असल बचत में बड़ा फर्क होता है. ऐसे में डिलीवरी पार्टनर या राइडर की जॉब इतनी भी आसान नहीं है.

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