जिस गांव ने देश को 38 जवान, अफसर और देशभक्ति की मिसाल दी, उस गांव के बच्चे जब एक ही मास्टर साहब के भरोसे अपनी किस्मत गढ़ने को मजबूर थे, तो aajtak.in ने इस खबर को प्रमुखता से उठाया था. विकास के तमाम दावों के बीच 72 बच्चों को अकेले पढ़ा रहे शिक्षक और समण गांव का दर्द जैसे ही देश के सामने आया, शिक्षा विभाग की नींद टूट गई. खबर का बड़ा असर हुआ है और विभाग ने आनन-फानन में दो शिक्षकों की अस्थायी व्यवस्था कर दी है.
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. राहत तो मिली है, पर ग्रामीणों और छात्रों का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ है.
कामचलाऊ व्यवस्था से काम नहीं चलेगा
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के भिलंगना ब्लॉक स्थित समण गांव के राजकीय जूनियर हाईस्कूल में aajtak.in की खबर का असर तो दिख गया है, पर छात्रों और ग्रामीणों ने सरकार के सामने साफ रुख अपना लिया है. बच्चों और ग्रामीणों की मांग है कि सरकार अटैचमेंट या कामचलाऊ व्यवस्था बंद करे और स्कूल में तुरंत स्थायी यानी रेगुलर शिक्षकों की तैनाती करे.
ग्रामीणों का कहना है कि कामचलाऊ व्यवस्था से बच्चों का भविष्य संवरने वाला नहीं है. आज दो शिक्षक भेजे गए हैं, कल फिर उन्हें वापस बुला लिया जाएगा, तो बच्चे फिर उसी ढर्रे पर आ जाएंगे.
जोत सिंह चौहान को मिली थोड़ी राहत, पर सवाल अब भी वही
पिछले दो सालों से अकेले ही 72 बच्चों की हाजिरी, पढ़ाई, मिड-डे मील से लेकर सारे सरकारी कागजी काम का बोझ उठा रहे शिक्षक जोत सिंह चौहान को फिलहाल दो जोड़ी हाथ और मिल गए हैं. लेकिन यह सवाल अब भी जस का तस बना हुआ है कि आखिर पहाड़ी इलाकों के सरकारी स्कूलों के साथ यह सौतेला व्यवहार कब तक चलेगा?
समण गांव की करीब दो हजार की आबादी आज भी पलायन को मात देकर अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेज रही है. प्राथमिक स्कूल में 92 बच्चे हैं, तो इंटर कॉलेज में 300 छात्र. जब गांव के लोग शिक्षा के प्रति इतने जागरूक हैं और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपने लाल भेज रहे हैं, तो क्या सरकार उन्हें दो पक्के शिक्षक भी नहीं दे सकती?
पंकज भट्ट