जब किसी इंसान का नाम ही उसकी पहचान और उसका आंदोलन बन जाए, तो समझ लीजिए कि उस नाम के पीछे पसीने और संघर्ष का एक बहुत लंबा इतिहास छुपा है. रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में चल रहे सत्याग्रह के दौरान जब राहुल क्रांति की तबीयत बिगड़ी, तो रात में ही उन्हें तेज़ बुखार और असह्य सिरदर्द के कारण अस्पताल ले जाया गया. सुबह होते-होते दर्द इतना बढ़ गया कि बर्दाश्त से बाहर हो गया और उन्हें ICU में भर्ती करना पड़ा.
लेकिन इस टूटते शरीर के पीछे एक ऐसे योद्धा की कहानी है, जिसने कोर्ट के मुकदमों से लेकर सड़कों की लाठियों तक, हर मोर्चे पर अभ्यर्थियों के लिए जीत हासिल की है. आज जब रांची की सड़कों पर उबाल है, हर कोई सरकार की तरफ उम्मीद से देख रहा है, ऐसे में राहुल का दृढ़ विश्वास आज भी कायम है कि वो जब जब अभ्यर्थियों के हक की आवाज उठाते हैं, उन्हें जीत ही मिली है, aajtak.in से बातचीत में राहुल ने कहा कि जेपीएससी और जेएसएससी प्रोटेस्ट में भी सरकार को झुकाकर मानेंगे, हम पीछे हटने वालों में नहीं है. आइए जानते हैं राहुल के नाम और उनके काम की पूरी कहानी...
कैसे पड़ा 'राहुल क्रांति' नाम?
राहुल का असली नाम राहुल कुमार ही था, लेकिन उनके नाम के आगे 'क्रांति' जुड़ने की कहानी बेहद भावुक करने वाली है. वो बताते हैं कि मैंने सबसे पहले झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) द्वारा जारी उस लिस्ट का विरोध किया था, जिसे बिना मेरिट लिस्ट के प्रकाशित करके काउंसलिंग कराई जा रही थी. जब पूरे झारखंड के शिक्षकों पर अन्याय हो रहा था, तब राहुल अकेले JSSC के दफ्तर का घेराव करने पहुंचे और पुरजोर आवाज़ उठाई.
शिक्षकों ने दिया 'उपाधि' का तोहफा: राहुल के इस निडर संघर्ष और जीत को देखकर राज्य भर के शिक्षकों ने एक स्वर में कहा कि हमारे हक के लिए अगर कोई क्रांति ला सकता है, तो वो सिर्फ आप हैं. उसी दिन से शिक्षकों द्वारा दी गई यह उपाधि उनकी पहचान बन गई और नाम हो गया 'राहुल क्रांति'.
10 बड़े आंदोलनों का रिकॉर्ड और 100% सफलता
राहुल क्रांति केवल बातें करने वाले छात्र नेता नहीं हैं. वे आंकड़ों, तथ्यों और क़ानून के पक्के खिलाड़ी हैं. राहुल बताते हैं कि अब तक करीब 10 प्रदर्शन और आंदोलन लड़ चुके हैं. उन्हें 10 में से 10 आंदोलनों में जीत हासिल हुई है. JPSC, JSSC CGL, सहायक आचार्य, लेडी सुपरवाइज़र से लेकर उम्र सीमा में छूट तक, राहुल अब तक अपने जीवन में कम से कम 10 बड़े आंदोलनों की अगुवाई कर चुके हैं और हर एक आंदोलन में छात्रों को जीत दिलाई है.
हाई कोर्ट में सरकार को हराया: राहुल बताते हैं कि 4वीं JPSC में जब हज़ारों अभ्यर्थी उम्र सीमा बीत जाने के कारण बाहर हो रहे थे, तो राहुल खुद मुख्य याचिकाकर्ता बने और झारखंड हाई कोर्ट में केस लड़कर जीत हासिल की. इसी अदालती जीत के दम पर उन्हें और सैकड़ों अभ्यर्थियों को 14वीं JPSC में बैठने का मौका मिला.
होटल में लीक हुआ पेपर और टूट गया JPSC मेंस निकालने का सपना
राहुल कोई असफल अभ्यर्थी नहीं हैं, वे JPSC के मेंस (Mains) परीक्षा तक पहुंचे हुए मेधावी छात्र हैं. लेकिन उनका आरोप है कि झारखंड के परीक्षा तंत्र के भ्रष्टाचार ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया. राहुल बताते हैं कि जब उन्होंने PT क्वालीफाई करके पहली बार JPSC का मेंस लिखा, तब रांची रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में पर्चे बिक रहे थे और उत्तर लिखवाए जा रहे थे.
पूरी लगन से मेंस की परीक्षा लिखने के बावजूद वे धांधली और भ्रष्टाचार की वजह से फाइनल लिस्ट से बाहर हो गए. यही वो पल था जब उन्होंने तय किया कि वे सिर्फ अपने लिए परीक्षा नहीं देंगे, बल्कि इस सड़ चुके सिस्टम को सुधारने के लिए लड़ेंगे.
40 की उम्र, गृहिणी पत्नी, दो मासूम बच्चे...
33 साल की उम्र के बाद शादी करने वाले राहुल क्रांति आज 40 वर्ष के पड़ाव पर हैं. घर पर एक गृहिणी पत्नी हैं, जो हर पल उनकी सलामती की दुआ मांगती हैं. साथ ही दो मासूम बच्चे हैं, एक 6-साढ़े 6 साल की बेटी और एक साढ़े 3 साल का बेटा. राहुल कहते हैं कि वो बच्चों के भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं. 40 की उम्र में जहां लोग अपने करियर में सेटल हो जाते हैं, वहीं मैं आज भी ICU के बेड से लेकर धुर्वा मोड़ की सड़कों तक अभ्यर्थियों के हक की लड़ाई लड़ रहा हूं.
जब उनसे पूछा गया कि क्या इस बार भी जीत मिलेगी? तो ICU के बेड से भी राहुल का एक ही जवाब था कि जब 10 बार लड़े और जीते हैं, तो इस बार भी सरकार को झुकना ही पड़ेगा. यह लड़ाई सिर्फ मेरी नहीं, आने वाली पीढ़ी की है.
मानसी मिश्रा