उत्तर प्रदेश के हाथरस से बहुत दुखद खबर मिली है. शहर से सटे रतिभानपुर में सत्संग के दौरान अचानक भगदड़ मच गई. भगदड़ मचने से 100 से ज्यादा लोगों की मौत की आशंका जताई जा रही है. जिला अधिकारी ने अब तक 60 लोगों की मौत की पुष्टि कर दी है. हादसे में मरने वालों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे शामिल हैं. हो सकता है ये आंकड़ा कल तक और बढ़ जाए.
जरा सोचकर देखिए किसी ने सत्संग जैसे पावन आयोजन में आने से पहले सोचा भी नहीं होगा कि तमाम कोनों से जुटी संगत में इतना बड़ा नरसंहार हो जाएगा. इसमें लापरवाही किसी की भी हो, लेकिन इन आयोजनों में भीड़ के मनोविज्ञान को समझना और उसे काबू करना एक चुनौती होता है. मनोदशा विश्लेषकों का कहना है कि कभी भी ऐसे बड़े आयोजनों में भीड़ के मनोविज्ञान को समझते हुए उसे काबू करने की तैयारी करना जरूरी होता है. आइए जानते हैं कि कैसे काम करता है भीड़ का मनोविज्ञान..
निष्क्रिय झुंड में बदल जाती है क्रियाशील भीड़
भोपाल के जाने माने मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि हमेशा भीड़ के सदस्य किसी एक विषय पर एक राय होने के बावजूद उनके व्यक्तिगत विचार और कार्यशैली भिन्न होती है. लेकिन जब बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं तो उनमें स्थिरता का अभाव होता है. वो एक अलग तरह के रोमांच से संचालित होते हैं. यदि कोई सत्संग में हिस्सा लेने आया है तो वो पहले तो एक व्यक्तित्व से संचालित है लेकिन सत्संग के समापन के साथ ही वो भीड़ से संचालित होता है. भीड़ के मनोविज्ञान को समझें तो इनमें जितना भड़कने के चांसेज होते हैं, उतना ही सुरक्षा-व्यवस्था के पालन का भी भाव होता है. लेकिन सिर्फ स्थिरता के अभाव के कारण किसी परिस्थिति विशेष में क्रियाशील भीड़ एक निष्क्रिय झुंड में बदल जाती है. इस भीड़ में निरंकुशता का आना ही भगदड़ और इस तरह की घटनाओं की परिणति कर देती है.
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आम जिंदगी में भी काम करती है क्राउड मेंटिलिटी
IHBAS दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि सामाजिक मनोविज्ञान में इसे मॉब मेंटेलिटी, हर्ड मेंटेलिटी, ग्रुपथिंक या क्राउड साइकोलॉजी के तौर पर बताया गया है. इसमें अध्ययनकर्ताओं ने ये निष्कर्ष पाए हैं कि कैसे भीड़ में कोई व्यक्ति लार्जर ग्रुप से प्रभावित होता है. साल 1950 के दशक में, शोधकर्ताओं ने एक खास प्रयोग के जरिये जाना कि कैसे लोग सामाजिक मानदंडों से मेल खाने के लिए अपने व्यवहार को बहुत आसानी से बदल देते हैं.
इस प्रयोग में ये पाया गया कि एक व्यक्ति को जब सात लोगों एक गुप्त समूह में रखकर सवाल पूछा गया तो ग्रुप ने गलत उत्तर दिया. वो भी गलत उत्तर से प्रभावित हो गया. इस प्रयोग में गुप्त सहयोगियों ने जान-बूझकर गलत उत्तर दिया था, लेकिन उस व्यक्ति को सही उत्तर पता होने के बावजूद उसने गलत उत्तर दिया. डॉ ओमप्रकाश कहते हैं कि इस उदाहरण से हमें समझना चाहिए कि कैसे हर इंसान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी भीड़ से प्रभावित होता है, मसलन हम किसी खास जगह जाते हैं या कोई फिल्म देखने जाते हैं, या कोई खास फूड खाते हैं तो ये फैसले भी लोगों से प्रभावित होते हैं. हम उनसे ड्रिवेन होते हैं. क्राउड मेंटिलिटी कई बार किसी एक दुकान की तरफ हमें खींच ले जाती है क्योंकि लगता है जहां भीड़ है, वो कुछ खास वजहों से ही है, भीड़ हमेशा सही कर रही है, हम अपने अधोमष्तिस्क में कई बार ऐसी मान्यता दे चुके होते हैं.
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हाथरस की घटना में ऐसा क्या रहा होगा?
अब अगर हाथरस की घटना की बात करें तो यहां जुटी भीड़ अपनी खास पसंद शेयर कर रही थी. ब खेल, सत्संग या किसी कंपटिशन जैसे आयोजन में हम भाग ले रहे होते हैं तो वहां हमारी मेंटिलिटी मैच करने का प्रतिशत और ज्यादा बढ़ जाता है. हम यहां समान रुचि साझा करते हैं. एक साथ भजन गाना, तालियां बजाना, जयकारे को एक साथ चिल्लाकर बोलने से हमारे भीतर रोमांच का स्तर बढ़ जाता है. ये रोमांच की स्थिति इंसान को विचार के स्तर पर एक दूसरे से जोड़ती भी है और क्रियाकलाप के स्तर पर अलग भी करती है. यहां जो हुआ उसे सामूहिक चेतना को एक दिशा में करके रोका जा सकता था. अगर ऐसे आयोजनों में कोई वक्ता एकसाथ सबको संबोधित करे, उन्हें नियम कानूनों का भय दिखाए या अफवाह फैलाने वाले की पहचान उजागर होने की बात करे तो भी इसे रोका जा सकता है. लेकिन अगर भीड़ अराजक हो जाती है, उन्हें अपनी पहचान खुलने का भय नहीं होता है. ऐसे में वो या तो उद्दंड होकर या जान बचाने के लिए भागते हैं, इसी तरह ऐसी घटनाएं अंजाम ले लेती हैं.
कम्यूनिकेशन टूल बहुत जरूरी
राजस्थान के मनोचिकित्सक डॉ अनिल शेखावत कहते हैं कि ऐसे मामलों में भीड़ किसी एक फेथ यानी विश्वास पर काम करती है. दुनिया में कई ऐसे भी उदाहरण हैं जब भीड़ ने एकजुटता दिखाकर किसी की हेल्प की. वहीं ये घटना भीड़ के भगदड़ में बदलने की है. ऐसी घटना में कोई विवाद या किसी अफवाह की खास भूमिका होती है. इस स्थिति में सबसे बड़ा रोल कम्युनिकेशन का होता है, अगर ऐसे मामलों में कम्यूनिकेशन इतना अच्छा हो कि कुछ लोगों की ही तात्कालिक सोच बदली जा सके तो ऐसी घटना रुक सकती है. इसके लिए सबके मोबाइल पर सामूहिक संदेश या फिर किसी एक अथॉरिटी की बात सबतक पहुंच जाए तो इस तरह की घटना रुक सकती है.
जानिए- हाथरस में क्या हुआ, किसकी गलती?
सत्संग की योजन समिति से जुड़े महेश चंद्र ने आजतक से फोन पर हुई बातचीत में कहा कि हमने जिला प्रशासन से अनुमति लेकर कार्यक्रम कराया था. कार्यक्रम में एक लाख से अधिक श्रद्धालु आयोजन मौजूद थे. कार्यकम खत्म होने के बाद भगदड़ मच गई. वो कहते हैं कि हादसा प्रशासन की कमजोरी की वजह से हुआ है. कार्यक्रम खत्म होने के बाद कीचड़ में लोग एक के ऊपर एक गिरते रहे, कोई संभालने वाला नहीं था. मैं भंडारे का काम देख रहा था.
उन्होंने बताया कि हाथरस में ये कार्यक्रम 13 साल बाद हुआ है. हमारे पास 3 घंटे की परमिशन थी. 1.30 बजे कार्यक्रम खत्म होने के बाद घटना हुई है. प्रशासन को अनगिनत श्रद्धालुओं के कार्यक्रम में आने की जानकारी दी गई थी. जहां इंतजाम किए गए थे, वहां बहुत भीड़ थी. कार्यक्रम में 12 से साढ़े 12 हजार सेवादार थे. हमने इतने स्तर पर पूरे इंतजाम किए थे. एंबुलेंस नहीं थी. कार्यक्रम खत्म हुआ तो लोग एक साथ भागने लगे और भगदड़ मच गई. बरसात के मौसम में कीचड़ की वजह से लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे थे.
मानसी मिश्रा