ऑपरेशन सिंदूर से चीन की चुनौती तक, पूर्व नौसेना प्रमुख ने बताई भारत की रणनीति

पूर्व चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने ऑपरेशन सिंदूर से लेकर भविष्य के युद्ध, तेजी से बदलती तकनीक, समुद्री सुरक्षा और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी पर विस्तार से बात की.

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आजतक के मंच पर पूर्व चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी (Photo-ITG) आजतक के मंच पर पूर्व चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 07 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:51 PM IST

आजतक की ‘सुरक्षा सभा’ के सेशन ‘ताकत वतन की’ में पूर्व चीफ ऑफ नेवल स्टाफ एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने अपने कार्यकाल, ऑपरेशन सिंदूर, मॉडर्न वॉरफेयर में तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी, मैरीटाइम सिक्योरिटी और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी समेत कई अहम मुद्दों पर बात की.

दिनेश कुमार ने कहा कि उनके करीब 25 महीने के कार्यकाल के दौरान भारतीय नौसेना ने कई महत्वपूर्ण पहलों पर काम किया. उन्होंने अपनी टीम की सराहना करते हुए कहा कि नेवल हेडक्वार्टर से लेकर कमांड हेडक्वार्टर, सैनिकों और डिफेंस सिविलियंस तक सभी ने पूरी प्रतिबद्धता और जुनून के साथ काम किया.

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उन्होंने कहा कि नौसेना के क्लासिक रोल में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उसका मिलिट्री या कॉम्बैट रोल है. पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारतीय सशस्त्र बलों ने जिस तरह अपनी तैयारियों और क्षमताओं का प्रदर्शन किया, उसमें नौसेना ने भी अहम भूमिका निभाई. उन्होंने बताया कि आतंकी हमले के बाद 96 घंटे के भीतर नौसेना ने अपनी कुछ एक्सरसाइज और वेपन फायरिंग के जरिए अपनी इंटेंट और कैपेबिलिटी दोनों को स्पष्ट किया. उनके मुताबिक, उनके कार्यकाल के दौरान एक प्रमुख फोकस यह था कि भारतीय नौसेना को हर समय कॉम्बैट रेडी रखा जाए.

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उन्होंने कहा कि नौसेना के अधिकारियों, सेलर्स और डिफेंस सिविलियंस के लिए उनका संदेश लगातार यही रहा कि देश के समुद्री हितों की रक्षा के लिए हर समय तैयार रहना जरूरी है. उनका मूल मंत्र था- कहीं भी, कभी भी और किसी भी परिस्थिति में राष्ट्रीय समुद्री हितों की रक्षा के लिए तैयार रहना.

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ऑपरेशन सिंदूर में मिलीं कई बड़ी सीख

ऑपरेशन सिंदूर को लेकर दिनेश कुमार ने कहा कि इस ऑपरेशन के दौरान उन्हें राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के बीच बेहद करीबी तालमेल देखने को मिला. उन्होंने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व के बीच लगातार संवाद हुआ, जो उनके लिए एक बड़ी सीख थी. उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य नेतृत्व को ऑपरेशन के दौरान पर्याप्त स्वतंत्रता और फ्लेक्सिबिलिटी दी गई थी. सेना को यह तय करने की आजादी थी कि कब, कहां और किस तरह कार्रवाई करनी है, जबकि साथ ही यह भी ध्यान रखा गया कि स्थिति को किस स्तर तक ले जाना है और एस्केलेशन को कैसे नियंत्रित करना है.

दिनेश कुमार के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने आधुनिक युद्ध में तेज निर्णय लेने, सैन्य क्षमताओं और राजनीतिक-सैन्य तालमेल के महत्व को एक बार फिर सामने रखा.

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'टेक्नोलॉजी सोचने की रफ्तार से भी तेज बदल रही'

मॉडर्न वॉरफेयर में टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी सोचने की रफ्तार से भी तेज बदल रही है. अगर कोई व्यक्ति यह सोचता है कि किसी खास तकनीक से कुछ किया जा सकता है, तो संभव है कि दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में कोई उस तकनीक को विकसित करने पर पहले से काम कर रहा हो. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए संघर्षों ने दिखाया है कि युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है. आर्मेनिया-अजरबैजान संघर्ष से लेकर रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों तक, ऑटोनॉमस सिस्टम, अनमैन्ड प्लेटफॉर्म और दूसरी नई तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा है. उनके मुताबिक, इसका असर मैरीटाइम डोमेन पर भी साफ दिखाई दे रहा है.

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'टेक्नोलॉजी सिर्फ Enabler है, इंसान का फैसला सबसे अहम'

उन्होंने टेक्नोलॉजी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए एक अहम बात कही कि टेक्नोलॉजी को इनेबलर के तौर पर देखना चाहिए, इंसान के विकल्प के तौर पर नहीं. उन्होंने कहा कि कंप्यूटर, सेंसर, सिस्टम और नेटवर्क किसी कमांडर या ऑपरेटर को जरूरी इनपुट दे सकते हैं और निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं. 

लेकिन आखिर में यह तय करना कि फायर करना है या इंतजार करना है, यह फैसला इंसान ही लेता है. इसी तरह वेपन कंट्रोल, टारगेट ट्रैकिंग और दूसरे ऑपरेशनल फैसलों में भी सेंसर और सिस्टम मदद करते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय इंसानी दिमाग का होता है. उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना इसी सोच के साथ टेक्नोलॉजी को अपना रही है.

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2005 से ही टेक्नोलॉजी पर फोकस

त्रिपाठी ने बताया कि भारतीय नौसेना ने काफी पहले यह महसूस कर लिया था कि भविष्य के युद्ध में टेक्नोलॉजी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होने वाली है. इसी सोच के तहत 2005 में अधिकारियों की ट्रेनिंग में B.Tech डिग्री की शुरुआत की गई. उन्होंने कहा कि इसका मकसद अधिकारियों को आने वाली नई तकनीकों को समझने और उनसे जुड़े संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार करना था. भारतीय नौसेना एक बेहद टेक्नोलॉजी इंटेंसिव सर्विस है और टेक्नोलॉजी उसके डीएनए का हिस्सा है. आज के युवा अधिकारी पहले की तुलना में ज्यादा टेक्नोलॉजी-सैवी हैं और आधुनिक सिस्टम को बेहतर तरीके से समझते हैं.

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युद्ध अब पहले जैसा नहीं रहेगा

भविष्य के युद्ध की प्रकृति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध को पुराने तरीके से देखना मुश्किल होगा. उन्होंने युद्ध की बदलती प्रकृति को समझाते हुए कहा कि अब युद्ध की रफ्तार बहुत तेज हो रही है और शांति तथा युद्ध के बीच की सीमाएं भी धुंधली होती जा रही हैं. उन्होंने बताया कि इसी वजह से उन्होंने नौसेना में ‘बिना पूर्व सूचना के समुद्र में जाने के लिए तैयार’ रहने का सिद्धांत लागू किया था. इसका मतलब है कि किसी जहाज या पनडुब्बी को समुद्र में जाने का आदेश मिलने का अर्थ केवल अभ्यास या सामान्य अभियान नहीं है. समुद्र में जाने के बाद किसी भी समय परिस्थितियां बदल सकती हैं और वह अभियान वास्तविक संघर्ष की स्थिति में बदल सकता है. इसलिए नौसेना को हर समय युद्ध के लिए तैयार रहना जरूरी है.

'भविष्य के युद्ध में Hard Power का कोई विकल्प नहीं'

मैरीटाइम सिक्योरिटी और भविष्य की चुनौतियों पर उन्होंने कहा कि अगले कुछ वर्षों में क्या होगा, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट हुई है कि हार्ड पावर का कोई विकल्प नहीं है. बातचीत और कूटनीति की अपनी भूमिका है, लेकिन जब रक्षा और सशस्त्र बलों की बात आती है तो मजबूत सैन्य क्षमता जरूरी है. दुनिया में कई संघर्ष लंबे समय तक चल रहे हैं और बार-बार रुकने के बाद फिर शुरू हो रहे हैं. ऐसे माहौल में सैन्य शक्ति का महत्व और बढ़ जाता है.

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उन्होंने आगे कहा कि नौसेना की जिम्मेदारी सिर्फ युद्ध के समय नहीं होती. भारत की ब्लू इकोनॉमी और समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. भारत की अर्थव्यवस्था समुद्र से गहराई से जुड़ी है, इसलिए समुद्री क्षेत्र में लगातार सर्विलांस जरूरी है. खासकर ऐसे समय में जब अलग-अलग क्षेत्रों में टैंकरों और दूसरे समुद्री जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं. उन्होंने कहा कि भविष्य में समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां किस दिशा में जाएंगी, यह निश्चित रूप से बताना मुश्किल है, लेकिन दुनिया में बदलते घटनाक्रम यह जरूर बताते हैं कि देशों को अपनी समुद्री और सैन्य क्षमताओं को मजबूत रखना होगा.

हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी पर क्या बोले?

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों से जुड़े सवाल पर त्रिपाठी ने कहा कि दुनिया की करीब 70 प्रतिशत सतह पानी से ढकी है और महासागर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. जहां पानी है और किसी देश के पास ऐसे प्लेटफॉर्म हैं जो पानी के रास्ते वहां तक पहुंच सकते हैं, वहां उसकी पहुंच संभव है. इसलिए समुद्री शक्ति को केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता. उनके मुताबिक, हिंद महासागर में बदलते रणनीतिक समीकरणों को समझने के लिए व्यापक समुद्री दृष्टिकोण जरूरी है. भविष्य में जिस देश के पास मजबूत समुद्री क्षमता, तकनीक और दूर तक पहुंचने वाले प्लेटफॉर्म होंगे, वह अपने राष्ट्रीय हितों की बेहतर तरीके से रक्षा कर सकेगा.

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