आजतक के सुरक्षा सभा कार्यक्रम में 'वर्दी की वायरल आवाज' सत्र के दौरान दो विशिष्ट योद्धाओं का स्वागत जोरदार तालियों के साथ किया गया. ब्रिगेडियर सौरभ सिंह शेखावत और कर्नल राजीव भरवान, जो लद्दाख की बर्फीली चोटियों से लेकर पूर्वोत्तर के घने जंगलों तक काउंटर इंसर्जेंसी अभियानों की कमान संभाल चुके हैं.
कर्नल भरवान अपने प्लेटफॉर्म टसोल्जर अनप्लग्ड' के जरिए लाखों लोगों तक भारतीय सेना का पराक्रम पहुंचा रहे हैं. ब्रिगेडियर शेखावत के सर पर इस बार मरून बेरे की जगह पगड़ी थी, लेकिन उनकी बातों में वही साहस और स्पष्टता झलक रही थी जो वर्दी में रहते हुए उन्होंने साबित किया है.
कहानियों की ताकत और युवाओं तक पहुंचने का महत्व
सेना की वर्दी में देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में अभियान चलाने वाले ये अधिकारी आज युवाओं के बीच देशप्रेम और सैन्य जीवन की असली तस्वीर पेश कर रहे हैं. बातचीत में यह बात बार-बार उभरी कि सैनिक जब अपनी कहानियां साझा करते हैं तो उनका असर बहुत गहरा होता है.
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सामान्य नागरिक सेना से प्यार करते हैं क्योंकि सेना समाज का ही हिस्सा है. किसानों के बच्चे ही सैनिक और अधिकारी बनते हैं. जब कोई अनुशासित वर्दीधारी बात करता है तो समाज उसे ध्यान से सुनता है. कर्नल भरवान ने साफ कहा कि वे युवाओं को वही बताते हैं जिसकी उन्हें जरूरत है, न कि जो वे सुनना चाहते हैं. रील और रियल में फर्क समझाना जरूरी है. सोशल मीडिया पर लोग अल्फा बनने की चाह रखते हैं लेकिन उस जीवन को जीने को तैयार नहीं होते.
सीधी बात, साफ संदेश और प्राथमिकताओं का फर्क
फौजी भाषा सीधी, सादी और स्पष्ट होती है. इसमें कोई घुमाव नहीं. कर्नल भरवान ने बताया कि सफलता चाहिए तो संघर्ष देखना होगा, आजादी के नारे लगाने से ज्यादा जिम्मेदारी लेनी होगी. विकल्प बहुत हैं लेकिन प्रतिबद्धता कम है. फौज में दिमाग से ज्यादा दिल लगाया जाता है.
प्राथमिकता क्रम साफ है- पहले देश और देशवासी, फिर यूनिट और अंत में खुद. आजकल युवाओं को यह सिखाया जाता है कि सब कुछ 'मैं' केंद्रित है, जबकि वर्दी सिखाती है कि जवाबदेही सिर्फ अपनी है. कोई और जिम्मेदार नहीं. हुक्म, हुक्म की तरह लगना चाहिए, दरख्वास्त की तरह नहीं. लक्ष्य तय हो तो गोली लगे तब भी आगे बढ़ना है. बात वही बोलनी चाहिए जो सामने वाले के हित में हो, न कि जो वह सुनना चाहता हो.
डर का सच और उसका सामना करने का फौजी तरीका
डर स्वाभाविक है. युद्ध में पहली गोली चलने से पहले चिंता होती है, दिल की धड़कन तेज होती है, लेकिन फायरफाइट शुरू होते ही डर गायब हो जाता है. फोकस सिर्फ इस बात पर रहता है कि अगर हमने नहीं मारा तो हम मरेंगे. कर्नल भरवान ने बताया कि डर को आकार दो, बोर्ड पर उसका रूप बनाओ और फिर उसका सामना करो. भागने से डर और बड़ा हो जाता है.
फौज सिखाती है कि लंबी सांस लो, निशाना साधो और लक्ष्य पर गोली चलाओ. सिविल जीवन में भी यही लागू होता है- परीक्षा, इंटरव्यू या बीमारी का डर हो, उसे सामने से देखो. उन्होंने स्काइडाइविंग का अनुभव साझा किया जहां डर के बावजूद कूदने वाले लोग बाद में हवाई यात्रा करने लगे. डर निकल जाता है जब आप उसे जीत लेते हैं.
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सिविल जीवन और प्रेरणा का संदेश
सेना से सिविल जीवन में आने के बाद भी ये अधिकारी युवाओं को प्रेरित करते रहे हैं. कई उम्मीदवार घंटों पढ़ते हैं लेकिन असफलता पर हार मान लेते हैं. सलाह साफ है- निर्णय ले लिया है तो लगे रहो, विकल्प खत्म करो, गलतियां सुधारो और मेहनत करते रहो.
आबादी और प्रतिस्पर्धा ज्यादा है लेकिन हार मानने का विकल्प नहीं. ब्रिगेडियर या कर्नल का 'मम्मा' निकनेम जैसी हल्की-फुल्की बातों से भी पता चलता है कि कठोर जीवन के बावजूद हास्य बना रहता है. पांच साल के बच्चे ने उन्हें मम्मा कहना शुरू कर दिया था और वह नाम चल निकला.
समाज पर वर्दी की आवाज का असर
अंत में यह संदेश मजबूत रहा कि सेना की कहानियां सिर्फ सैनिक बनने वालों के लिए नहीं हैं. सामान्य जीवन जीने वाले लोग भी इनसे सीख सकते हैं- जवाबदेही, प्रतिबद्धता, डर का सामना और देश को प्राथमिकता. सोशल मीडिया पर दूसरों को फॉलो करने से पहले खुद को अनसब्सक्राइब मत करो.
अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनो. वर्दी की यह वायरल आवाज युवाओं को याद दिलाती है कि असली ताकत शब्दों और कर्म दोनों में है. ब्रिगेडियर सौरभ सिंह शेखावत और कर्नल राजीव भरवान जैसे योद्धा न सिर्फ लड़े हैं बल्कि अब शब्दों से भी देश को मजबूत कर रहे हैं.
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