28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब से इजरायल इस जंग का अहम हिस्सा बना हुआ है. ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' में इजरायली एयर फोर्स ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान के न्यूक्लियर साइट्स, मिसाइल ठिकानों और कमांड सेंटर्स पर हमले किए. इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई, जो इजरायल के लिए बड़ी सफलता मानी गई.
नेतन्याहू लंबे समय से ईरान को इजरायल के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते रहे हैं. उनका कहना है कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बना रहा है और इजरायल को इसे रोकना चाहिए. युद्ध शुरू होने के बाद इजरायल ने ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के खिलाफ लेबनान में भी कार्रवाई तेज कर दी.
अब जब अमेरिका और ईरान के बीच जुलाई 2026 में नया टकराव शुरू हुआ है, तो सवाल उठ रहा है कि नेतन्याहू की हालिया सेरेमनी रद्द करने और सीक्रेट मीटिंग करने का मतलब क्या है. क्या इजरायल अब और बड़े पैमाने पर युद्ध में कूदने वाला है?
सेरेमनी कैंसल और सीक्रेट मीटिंग
हाल के दिनों में नेतन्याहू ने एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेरेमनी अचानक रद्द कर दी. इसके बजाय उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों के साथ बंद कमरे में लंबी मीटिंग की. इजरायली मीडिया के मुताबिक, यह मीटिंग ईरान के साथ बढ़ते तनाव, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिका-ईरान टकराव और लेबनान की स्थिति पर केंद्रित थी.
अमेरिकी डिफेंस सेक्रेटरी पेटे हेगसेथ की इजरायल यात्रा भी रद्द हो गई, जो NATO समिट के दौरान होनी थी. नेतन्याहू ने इसे 'कुछ अच्छा हो सकता है' बताया, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अमेरिका-ईरान सीजफायर के बावजूद इजरायल अपनी रणनीति पर काम कर रहा है.
नेतन्याहू की सरकार ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने पर जोर दे रही है, जबकि ट्रंप प्रशासन होर्मुज खोलने और आर्थिक राहत पर फोकस कर रहा है. यह मीटिंग ऐसे समय में हुई जब ईरान ने होर्मुज में जहाजों पर हमले किए और अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की. इजरायल चुप नहीं बैठा है. उसने लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले जारी रखे हैं, जो ईरान का प्रॉक्सी फोर्स माना जाता है.
न्यूक्लियर खतरा और क्षेत्रीय सुरक्षा
इजरायल का मानना है कि ईरान सिर्फ न्यूक्लियर नहीं, बल्कि मिसाइलें, ड्रोन्स और प्रॉक्सी ग्रुप्स (हिजबुल्लाह, हमास आदि) के जरिए इजरायल को घेर रहा है. नेतन्याहू की रणनीति हमेशा से 'ईरान को अकेला छोड़ना नहीं' रही है. फरवरी के हमलों में इजरायल ने ईरान की कई क्षमताओं को नुकसान पहुंचाया, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं किया.
अब सीक्रेट मीटिंग में संभवतः तीन बड़े मुद्दे चर्चा हुए होंगे...
इजरायल के पास ईरान पर हमला करने की क्षमता है, लेकिन पूरा युद्ध लड़ने के लिए अमेरिकी समर्थन जरूरी है. ट्रंप और नेतन्याहू के बीच रिश्ते अच्छे रहे हैं, लेकिन MoU के बाद कुछ तनाव दिखा है. इजरायल MoU को बाध्यकारी नहीं मानता और कहता है कि उसके सुरक्षा हित ऊपर हैं.
इजरायल और गहरा कूद सकता है?
इजरायल पहले से ही युद्ध में कूद चुका है. फरवरी से अब तक इजरायल ने ईरान और उसके सहयोगियों पर सैकड़ों हमले किए हैं. लेकिन 'और गहरा कूदना' का मतलब बड़े पैमाने पर जमीनी या बड़े हवाई ऑपरेशन हो सकते हैं.
संभावित कदम...
चुनौतियां भी हैं. इजरायल की अर्थव्यवस्था और सेना लंबे युद्ध से थक रही है. घरेलू राजनीति में नेतन्याहू पर दबाव है. अमेरिका अगर पूर्ण युद्ध नहीं चाहता तो इजरायल अकेला बड़ा रिस्क नहीं लेगा. हालांकि, नेतन्याहू की सीक्रेट मीटिंग से साफ है कि इजरायल तैयार रहना चाहता है. अगर ईरान होर्मुज या इजरायल पर कोई बड़ा हमला करता है, तो इजरायल तुरंत जवाब देगा.
अगर इजरायल और ज्यादा हमला करता है तो पूरा मिडिल ईस्ट जल सकता है. सऊदी अरब, यूएई जैसे देश चुपचाप इजरायल का समर्थन कर रहे हैं क्योंकि वे भी ईरान से डरते हैं. लेकिन रूस और चीन ईरान के पक्ष में हैं, जो स्थिति को जटिल बनाता है. तेल की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं. अगर इजरायल-ईरान टकराव बढ़ा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर और असर पड़ेगा.
नेतन्याहू की सेरेमनी रद्द करना और सीक्रेट मीटिंग करना सामान्य कदम नहीं है. यह दिखाता है कि इजरायल ईरान युद्ध को बहुत गंभीरता से ले रहा है. इजरायल पहले से ही शामिल है, लेकिन अब पूरी तरह से और बड़े हमलों की तैयारी कर रहा है. ट्रंप के साथ तालमेल बनाए रखते हुए नेतन्याहू ईरान को कमजोर करने की अपनी रणनीति पर अडिग हैं. आने वाले दिनों में स्थिति और साफ होगी, लेकिन मध्य पूर्व में शांति अभी दूर नजर आ रही है.
ऋचीक मिश्रा