भारतीय कॉर्पोरेट जगत और जॉब मार्केट में इस वक्त एक नया और अजीब संकट देखने को मिल रहा है. कर्मचारी अपना काम तो पूरा कर रहे हैं, लेकिन उससे आगे बढ़कर कुछ भी 'एक्स्ट्रा' करने को तैयार नहीं हैं. 'ग्रेट प्लेस टू वर्क इंडिया' की 2026 की एक नई स्टडी में इस बदलाव को 'एफर्ट रिसेशन' यानी 'प्रयासों की मंदी' का नाम दिया गया है.
इंडियन एक्सप्रेस में छपी इस रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि देश की 63% कंपनियों (सर्वेक्षण में शामिल 380 में से 240 कंपनियों) में कर्मचारियों के 'विवेकपूर्ण प्रयास' में औसतन 5% की गिरावट आई है.
क्या है यह 'Discretionary Effort' और क्यों आ रही है कमी?
सरल शब्दों में कहें तो 'विवेकपूर्ण प्रयास' काम का वो हिस्सा है जिसके लिए कोई कंपनी किसी कर्मचारी को मजबूर नहीं कर सकती. जैसे बिना कहे किसी समस्या को ठीक करने के लिए देर तक रुकना, अपनी जिम्मेदारी से बाहर जाकर टीम की मदद करना, या सिर्फ ऑफिस में हाजिरी लगाने के बजाय आगे बढ़कर जिम्मेदारी संभालना. भारतीय कॉरपोरेट्स में अब इसी 'एक्स्ट्रा पुश' का ग्राफ लगातार गिर रहा है. कर्मचारी अब साफ कर चुके हैं कि जितनी सैलरी, उतन ही काम होगा.
किस सेक्टर का क्या है हाल?
रिटेल सेक्टर: इस मंदी की सबसे बड़ी मार रिटेल सेक्टर पर पड़ी है, जहां 88% कंपनियों ने कर्मचारियों के प्रयासों में कमी दर्ज की है.
IT और प्रोफेशनल सर्विसेज: आईटी और प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर भी इससे अछूते नहीं हैं, यहाँ 77% कंपनियों में यह गिरावट देखी गई है.
कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट: यहां 71% कंपनियां इस संकट से जूझ रही हैं.
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर: ये सेक्टर सबसे मजबूत बनकर उभरा है. यहाँ सिर्फ 44% कंपनियों में ही गिरावट देखी गई, और वो भी औसतन सिर्फ 3% रही.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग में काम करने वालों के पास 'नीश स्किल्स' (विशेष हुनर) होती है, जिससे वे अपने काम से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं, जबकि आईटी और रिटेल में नौकरियां बदलना आसान होता है. रिपोर्ट में लीडरशिप को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और सीधा कनेक्शन सामने आया है.
रिपोर्ट के अनुसार जब कर्मचारियों को लगता है कि उनके लीडर्स या मैनेजर्स सचमुच उनकी परवाह करते हैं, तो उनका एक्स्ट्रा काम करने का जज्बा 99% तक पहुंच जाता है. लेकिन जहां इस केयर की कमी होती है, वहां यह सीधे गिरकर 29% पर आ जाता है. यह पूरे रिपोर्ट का सबसे बड़ा (70 अंकों का) अंतर है. यही नहीं इंस्पायरिंग लीडरशिप होने पर प्रयास 98% रहता है, न होने पर 32% पर आ जाता है.
दिलचस्प बात यह है कि कंपनियां जो पैसा भारी-भरकम ट्रेनिंग, मेंटरिंग या स्किल डेवलपमेंट (L&D) बजट पर खर्च कर रही हैं, उससे वर्क एथिक्स में सिर्फ 25 अंकों का ही सुधार दिख रहा है. यानी समस्या स्किल बढ़ाने की नहीं, बल्कि मैनेजर्स का अपने एम्प्लॉइज के साथ इंसानी बर्ताव करने की है.
जेन-जी (Gen Z) और AI का डबल अटैक
इस 'एफर्ट रिसेशन' के पीछे एक बड़ा कारण कार्यबल में आ रहा जनरेशनल शिफ्ट भी है. भारत के वर्कफोर्स में अब जेन-जी (Gen Z) की हिस्सेदारी बढ़कर 26% हो गई है, जो 2023 के मुकाबले करीब दोगुनी है. ये पिछले चार सालों में सालाना 16% की रफ्तार से बढ़े हैं. ये बदलाव ठीक उसी समय हो रहा है जब वर्कप्लेस में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का दखल बढ़ रहा है.
लगभग 58% सीएचआरओ (CHROs) का मानना है कि वे एक साथ दो मोर्चों पर जूझ रहे हैं. इसमें एक तरफ जनरेशनल गैप को संभालना और दूसरी तरफ AI ट्रांसफॉर्मेशन. इनमें से आधे (50%) अधिकारियों ने माना कि वे पूरी तरह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आज की युवा पीढ़ी को काम के लिए क्या चीज प्रेरित करती है.
देखा जाए तो रिपोर्ट पूरी तस्वीर साफ करती है कि वर्कफोर्स लीडरशिप के पुराने ढांचों के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बदल रहा है. कर्मचारी काम करना नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि वे एक्स्ट्रा मेहनत करना इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी कंपनियों और लीडर्स को उनकी कोई परवाह नहीं है.