स्वदेशी रुक्मिणी टर्मिनल... इजरायल पर कम होगी निर्भरता, हिंद महासागर में खुफिया कम्युनिकेशन आसान

भारतीय नौसेना ने नए GSAT-7R सैटेलाइट के लिए स्वदेशी रुक्मिणी टर्मिनल बनाने को EOI जारी किया. पुराने इजरायली टर्मिनल को बदलकर सुरक्षित समुद्री कम्युनिकेशन मजबूत किया जाएगा.

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पिछले साल नवंबर में इसरो ने नौसेना का सैटेलाइट GSAT-7R लॉन्च किया था. (Photo: ISRO) पिछले साल नवंबर में इसरो ने नौसेना का सैटेलाइट GSAT-7R लॉन्च किया था. (Photo: ISRO)

मंजीत नेगी

  • नई दिल्ली,
  • 28 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:28 PM IST

भारतीय नौसेना समुद्र में अपने सुरक्षित कम्युनिकेशन को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ा रही है. नौसेना ने अपने नए कम्युनिकेशन सैटेलाइट GSAT-7R के साथ काम करने वाले स्वदेशी सैटेलाइट टर्मिनल डेवलप करने के लिए मेक-II श्रेणी के तहत एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) जारी किया है. इन टर्मिनलों को रुक्मिणी टर्मिनल कहा जा रहा है. ये जहाज आधारित C-बैंड और Ku-बैंड सैटकॉम टर्मिनल होंगे जो नौसेना की कम्युनिकेशन क्षमता को नई ऊंचाई देंगे.

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नौसेना का सैटेलाइट कम्युनिकेशन अब पुराने जीसैट-7 रुक्मिणी से अगली पीढ़ी के GSAT-7R की ओर शिफ्ट हो रहा है. पुराना रुक्मिणी 2013 में लॉन्च हुआ था. नया GSAT-7R 2 नवंबर 2025 को इसरो के LVM3-M5 रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजा गया. यह करीब 4400 किलोग्राम वजन का है. भारत का अब तक का सबसे भारी कम्युनिकेशन सैटेलाइट है. 

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यह मल्टी-बैंड कवरेज देता है जिसमें C-बैंड, एक्सटेंडेड C-बैंड और Ku-बैंड शामिल हैं. इससे जहाजों, पनडुब्बियों, विमानों और मैरीटाइम ऑपरेशंस सेंटर्स के बीच सुरक्षित आवाज, डेटा और वीडियो लिंक संभव होते हैं. इसका कवरेज क्षेत्र करीब 3500 किलोमीटर तक फैला है जो पूरे हिंद महासागर क्षेत्र को कवर करता है.

पुराने टर्मिनलों की समस्याएं

अभी जो टर्मिनल इस्तेमाल हो रहे हैं वे मूल रूप से इजरायल से लिए गए थे. अब भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड उनका रखरखाव कर रहा है. ये टर्मिनल 10 से 12 साल पुराने हो चुके हैं. इनमें प्रोडक्ट सपोर्ट की कमी और धीमी डेटा ट्रांसफर की समस्याएं आ रही हैं. इसलिए नौसेना इन्हें नए स्वदेशी टर्मिनलों से बदलना चाहती है जो नए सैटेलाइट के साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें.

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यह परियोजना डिफेंस एक्विजिशन प्रोसीजर की मेक-II श्रेणी के तहत आती है. इसमें उद्योग खुद विकास का खर्च वहन करता है. प्रोटोटाइप बनाने के लिए सरकार की ओर से कोई फंडिंग नहीं दी जाती. हार्डवेयर और एम्बेडेड सॉफ्टवेयर में न्यूनतम 50 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री अनिवार्य है. 

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फिलहाल यह परियोजना MSME के लिए आरक्षित है. स्टार्टअप और अधिकतम पांच सदस्यों वाले कंसोर्टियम भी इसमें भाग ले सकते हैं. ये टर्मिनल नौसेना के नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध के लिए बेहद जरूरी हैं. 

इसकी पहली झलक 2014 के ट्रॉपेक्स अभ्यास में मिली थी जिसमें करीब 60 युद्धपोत और 75 विमान रुक्मिणी सैटेलाइट के जरिए एक साझा ऑपरेशनल पिक्चर से जुड़े थे. इसमें कोई भी यूनिट सेंसर का काम कर सकती है और दूसरी यूनिट शूटर का. यानी जानकारी जुटाने और हमला करने की क्षमता पूरे बेड़े में साझा होती है. नए टर्मिनल इस क्षमता को और तेज, सुरक्षित और एंटी-जैमिंग बनाएंगे.

स्वदेशी टर्मिनल के होंगे बड़े फायदे

यह पहल नौसेना की आत्मनिर्भरता यानी आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा है. स्वदेशी युद्धपोतों और नए GSAT-7R सैटेलाइट के साथ-साथ ये टर्मिनल यह सुनिश्चित करेंगे कि तट से दूर समुद्र में भी सुरक्षित और भरोसेमंद कम्युनिकेशन बना रहे. समुद्री युद्ध में कम्युनिकेशन की भूमिका निर्णायक होती है. 

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दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर या जैमिंग के बावजूद संपर्क बनाए रखना बहुत जरूरी है. स्वदेशी टर्मिनल से विदेशी निर्भरता कम होगी और जरूरत पड़ने पर तेजी से अपग्रेड या मरम्मत संभव होगी. उद्योग को अब ईओआई के आधार पर प्रस्ताव देना होगा. विकास प्रक्रिया में तकनीकी चुनौतियां आ सकती हैं जैसे उच्च समुद्री परिस्थितियों में टर्मिनल की मजबूती, साइबर सुरक्षा और तेज डेटा रेट सुनिश्चित करना.  

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