अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चले आ रहे भीषण तनाव के बाद अब एक बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता की खबर आ रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में घोषणा की है कि अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता लगभग तय हो चुका है. इस पर आने वाले वीकेंड में हस्ताक्षर किए जा सकते हैं. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका पाकिस्तान को लगा है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहां के सैन्य प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पिछले कई महीनों से दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने की पुरजोर कोशिशों में जुटे थे. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस ऐतिहासिक समझौते की अंतिम मुहर इस्लामाबाद में लगेगी, जिससे वैश्विक पटल पर उसकी साख बढ़ेगी. लेकिन ट्रंप के बयान ने साफ कर दिया है कि यह डील पाकिस्तान में नहीं, बल्कि यूरोप के किसी शहर में साइन होने जा रही है.
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प्रशांत महासागर की तरह भू-राजनीति में भी पल-पल समीकरण बदलते हैं. अमेरिका और ईरान के बीच का यह समझौता वैश्विक ऊर्जा बाजार, खासकर कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. ट्रंप ने संकेत दिया है कि इस समझौते के दस्तावेज अपने फाइनल स्टेज में हैं.
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस खुद इस हस्ताक्षर समारोह में शामिल होने के लिए यूरोप जा सकते हैं. जहां एक तरफ इस समझौते से मध्य पूर्व में बड़े युद्ध का खतरा टलने की उम्मीद है. वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान की मुनीर-शहबाज जोड़ी की महीनों की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है.
पाकिस्तान की कूटनीतिक मध्यस्थता और 'इस्लामाबाद अकॉर्ड' का सपना
इस साल फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद पाकिस्तान ने खुद को एक वैश्विक शांतिदूत के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी. सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सीधे वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बैकचैनल कूटनीति का जिम्मा संभाला था.
अप्रैल के महीने में पाकिस्तान की मध्यस्थता के चलते ही अमेरिका और ईरान के बीच एक अस्थाई युद्धविराम संभव हो पाया था, जिसके बाद ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए फिर से खोल दिया था.
पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम को 'इस्लामाबाद अकॉर्ड'का नाम देकर शांति वार्ता की मेजबानी अपने देश में करना चाहता था. पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री मोहसिन नकवी ने हाल ही में तेहरान का दौरा कर ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के लिए शहबाज शरीफ का एक विशेष लिखित संदेश भी सौंपा था.
पाकिस्तान का मानना था कि अगर यह डील उसके घर में साइन होती है, तो उसे भारी आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता मिलेगी. लेकिन अमेरिका ने अंतिम समय पर पाकिस्तान को दरकिनार कर यूरोप को इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनाने के लिए चुना.
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ट्रंप का यू-टर्न: हमलों की धमकी के बाद अचानक शांति समझौते का एलान
डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला उनके चिर-परिचित अनिश्चित व्यवहार का एक और उदाहरण है. गुरुवार की सुबह तक ट्रंप ईरान के तेल बुनियादी ढांचों, विशेष रूप से खार्ग द्वीप पर विनाशकारी मिसाइल हमले करने और ईरान पर प्रतिबंध कड़ा करने की धमकी दे रहे थे.
उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वह ईरान को ऐसा सबक सिखाएंगे जो आज तक किसी ने नहीं देखा होगा. लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद, उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एलान कर दिया कि उन्होंने नियोजित सैन्य हमलों को रद्द कर दिया है क्योंकि दोनों देशों की बातचीत हाई लेवल पर पहुंच चुकी है.
व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस से पत्रकारों को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि हमने अभी ईरान के साथ युद्ध का एक शानदार समझौता किया है. जैसे ही हम इस पर हस्ताक्षर करेंगे, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आधिकारिक रूप से पूरी तरह खुल जाएगा. यह हस्ताक्षर बहुत जल्द, शायद इसी वीकेंड पर यूरोप में हो सकते हैं.
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ट्रंप ने यह भी दावा किया कि इस समझौते को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई ने भी अपनी मंजूरी दे दी है. इस समझौते के तहत ईरान स्थाई रूप से परमाणु हथियार न बनाने और न ही खरीदने पर सहमत हुआ है, जिसके बदले में अमेरिका उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों और बंदरगाहों की नाकेबंदी को तुरंत हटा लेगा.
ईरान का रुख: समझौते पर अभी भी पूरी तरह मुहर लगना बाकी
एक तरफ जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस सौदे को लेकर बेहद आश्वस्त दिख रहे हैं. इसे अंतिम रूप दे चुके हैं. वहीं ईरान इस पर फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. तेहरान में ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बगाई ने ट्रंप के दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका के साथ समझौते की खबरें अभी महज अटकलें हैं. ईरान अभी तक किसी अंतिम फैसले पर नहीं पहुंचा है.
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि हालांकि बातचीत के मसौदे का एक बड़ा हिस्सा तैयार कर लिया गया है, लेकिन अमेरिका लगातार अपनी शर्तों और रुख में बदलाव करता रहा है, इसलिए जब तक पूरी तरह से दस्तावेजों की समीक्षा नहीं हो जाती, ईरान इसे अंतिम नहीं मानेगा.
ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर कलीबाफ ने भी स्पष्ट किया है कि ईरान अपने राष्ट्रीय अधिकारों और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा. हालांकि, जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी हमलों के कारण ईरान को जो भारी नुकसान उठाना पड़ा है, उसके चलते वह भी इस आर्थिक नाकेबंदी से बाहर निकलने के लिए जल्द से जल्द डील साइन करना चाहता है.
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यूरोप ही क्यों? पाकिस्तान के हाथ से क्यों फिसला मौका
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस हाई-प्रोफाइल डील के लिए पाकिस्तान की धरती पर पूरी तरह भरोसा नहीं करना चाहता था. पाकिस्तान की अपनी सुरक्षा स्थिति, चीन के साथ उसकी बढ़ती नजदीकियां और वहां की सेना का राजनीति में अत्यधिक हस्तक्षेप वॉशिंगटन के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहा है.
इसके विपरीत, यूरोप (जैसे जेनेवा या वियना) ऐतिहासिक रूप से ऐसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय परमाणु और शांति समझौतों के लिए एक तटस्थ और सुरक्षित मंच प्रदान करता रहा है. भले ही ट्रंप ने युद्धविराम कराने के लिए पूर्व में आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ की तारीफ की थी, लेकिन जब बात अंतिम वैश्विक समझौते की आई, तो अमेरिका ने अपने पश्चिमी सहयोगियों की मौजूदगी में इसे अंजाम देना बेहतर समझा.
इस फैसले से पाकिस्तान की वैश्विक स्तर पर बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल करने और अपनी छवि चमकाने की उम्मीदों को करारा झटका लगा है. अब सबकी निगाहें यूरोप पर टिकी हैं, जहां अगले कुछ दिनों में मध्य पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था की नई दिशा तय हो सकती है.
ऋचीक मिश्रा