मिडिल ईस्ट में जारी महासंग्राम इस समय एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है. ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए भीषण मिसाइल हमलों के बाद पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि तेल अवीव इसका बदला किस तरह लेगा. लेकिन इसी बीच वैश्विक कूटनीति के मंच से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है.
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल को ईरान पर किसी भी तरह के बड़े जवाबी हमले या सीधे सैन्य एक्शन से बचने की सख्त सलाह दी है. ऐतिहासिक रूप से इजरायल के सबसे बड़े समर्थक माने जाने वाले ट्रंप का यह रुख सुरक्षा विश्लेषकों को हैरान कर रहा है. आखिर जो ट्रंप हमेशा ईरान पर कड़े प्रतिबंधों और आक्रामक नीति के पक्षधर रहे हैं, वे इस बार इजरायल के हाथ क्यों बांधना चाहते हैं?
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इस रणनीतिक यू-टर्न के पीछे कोई कमजोरी नहीं, बल्कि वॉशिंगटन का एक बहुत बड़ा और गहरा गेमप्लान छिपा हुआ है. ट्रंप प्रशासन इस समय मिडिल ईस्ट में एक ऐसी बिसात बिछा रहा है, जिससे अमेरिकी हितों की भी रक्षा हो सके और बिना किसी विनाशकारी विश्व युद्ध के ईरान को घुटनों पर लाया जा सके.
ट्रंप की इस नई और सोची-समझी रणनीति को हम मुख्य रूप से 5 बड़े रणनीतिक पॉइंट्स के जरिए समझ सकते हैं, जो यह साफ करते हैं कि अमेरिका इस समय इजरायल को सीधे टकराव से क्यों दूर रखना चाहता है.
1. खुद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में मोर्चा खोल रहा है अमेरिका
ट्रंप की रणनीति का पहला और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि वे ईरान को सजा देने का काम पूरी तरह इजरायल के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते, बल्कि इसकी कमान खुद अमेरिका के हाथों में रखना चाहते हैं. ईरान की सबसे बड़ी कमजोरी और उसकी ताकत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है.
ट्रंप का मानना है कि अगर इजरायल ने ईरान के मुख्य जमीन पर हमला किया, तो ईरान हताशा में आकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह ब्लॉक कर देगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. इससे निपटने के लिए ट्रंप खुद होर्मुज और ओमान की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना का अभेद्य मोर्चा खोल रहे हैं।
अमेरिका की योजना ईरान को आर्थिक और नौसैनिक रूप से इसी जलमार्ग पर घेरने की है. ट्रंप चाहते हैं कि इजरायल सीधे हमले के बजाय पीछे हटे, ताकि अमेरिकी सेना इस रणनीतिक चोक-पॉइंट पर ईरान की नौसैनिक गुंडागर्दी को सीधे नियंत्रित कर सके और वैश्विक तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखा जा सके.
2. इजरायल बनाम ईरान को सीधे टकराव से रोकना
ट्रंप कूटनीति का दूसरा बड़ा आधार यह है कि वे इस पूरे संकट को किसी भी कीमत पर 'इजरायल बनाम ईरान' के सीधे और खुले युद्ध में बदलने नहीं देना चाहते. यदि इजरायल और ईरान के बीच सीधे तौर पर बैलिस्टिक मिसाइलों और हवाई हमलों का दौर लंबा चलता है, तो यह जंग एक अंतहीन विनाश के चक्र में बदल जाएगी.
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एक सीधा युद्ध ईरान के भीतर की कट्टपंथी ताकतों और वहां की जनता को अपनी सरकार के पीछे एकजुट होने का मौका देगा. एक सीधा युद्ध अनिवार्य रूप से अमेरिका को भी अपनी पूरी सैन्य ताकत के साथ कूदने के लिए मजबूर करेगा, जिसे ट्रंप हमेशा से टालना चाहते हैं.
ट्रंप का अमेरिका फर्स्ट का नारा विदेशी युद्धों में अमेरिकी सैनिकों और खरबों डॉलर को झोंकने की इजाजत नहीं देता. वे जानते हैं कि सीधे टकराव से केवल तबाही होगी और इसका कोई स्थाई समाधान नहीं निकलेगा. इसलिए वे इजरायल को रोककर तनाव के ग्राफ को नीचे लाना चाहते हैं.
3. लेबनान फ्रंट और हिज्बुल्लाह के खात्मे के मोर्चे को खुला रखना
तीसरा रणनीतिक पॉइंट बेहद व्यावहारिक सैन्य कूटनीति से जुड़ा है. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि इजरायल को इस समय अपनी ऊर्जा और सैन्य संसाधनों को ईरान जैसे दूर बैठे दुश्मन पर बर्बाद करने के बजाय अपने पड़ोस में मौजूद खतरों को पूरी तरह खत्म करने पर लगाना चाहिए. इजरायल इस समय लेबनान सीमा पर हिजबुल्लाह के खिलाफ एक बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है.
ट्रंप चाहते हैं कि इजरायल का लेबनान फ्रंट पूरी तरह ओपन रहे और ध्यान वहीं केंद्रित रहे. हिज्बुल्लाह, ईरान का सबसे मजबूत और खतरनाक छद्म संगठन है. अगर इजरायल ईरान के चक्रव्यूह में फंस गया, तो लेबनान में हिज्बुल्लाह को दोबारा संगठित होने और संभलने का मौका मिल जाएगा.
ट्रंप की रणनीति यह है कि पहले ईरान के हाथों और पैरों (जैसे हिजबुल्लाह और हूती) को पूरी तरह काट दिया जाए, जिससे ईरान क्षेत्रीय स्तर पर बिल्कुल अकेला और कमजोर हो जाए. हिज्बुल्लाह का खात्मा ईरान के लिए किसी सीधे मिसाइल हमले से कहीं बड़ा और स्थाई झटका होगा.
4. बातचीत और आर्थिक दबाव को एक और आखिरी मौका देना
डोनाल्ड ट्रंप खुद को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक बड़ा 'डील-मेकर' मानते हैं. उनकी कूटनीति का चौथा स्तंभ यह है कि वे सैन्य विनाश से पहले हमेशा बातचीत, कड़े आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के घालमेल को एक आखिरी मौका देना चाहते हैं. ट्रंप का मानना है कि ईरान पर सीधे बम गिराने से उसकी परमाणु और मिसाइल बनाने की जिद और बढ़ जाएगी.
ट्रंप ईरान पर मैक्सिमम प्रेशर की नीति को दोबारा लागू करना चाहते हैं. इसके तहत ईरान के तेल निर्यात को पूरी तरह शून्य पर लाना, उसके वित्तीय लेन-देन पर वैश्विक पाबंदियां लगाना और उसे इस कदर आर्थिक रूप से पंगु बना देना शामिल है कि तेहरान खुद बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर हो जाए.
ट्रंप इजरायल को रोककर ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि यदि वह अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं और उग्रवाद को छोड़ने के लिए तैयार होता है, तो बातचीत के रास्ते अभी भी खुले हैं, अन्यथा अमेरिकी प्रतिबंध उसे आर्थिक रूप से पूरी तरह बर्बाद कर देंगे.
5. अरब सहयोगियों को ईरानी गुस्से से बचाए रखना
ट्रंप की रणनीति का पांचवां और सबसे संवेदनशील बिंदु अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों, जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और जॉर्डन की सुरक्षा से जुड़ा है. ये देश अमेरिका के महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार हैं, जिन्होंने इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर किए थे.
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यदि इजरायल ने ईरान पर कोई बड़ा हमला किया, तो ईरान इसका बदला सीधे इजरायल से लेने के बजाय उसके पड़ोस में स्थित इन तेल उत्पादक अरब देशों पर निकाल सकता है. ईरान के सुसाइड ड्रोन और मिसाइलें सऊदी अरब के तेल रिफाइनरियों या यूएई के वाणिज्यिक केंद्रों को निशाना बना सकती हैं.
ट्रंप जानते हैं कि अगर खाड़ी देश इस युद्ध की आग में झुलस गए, तो पूरा मिडिल ईस्ट दशकों पीछे चला जाएगा. अमेरिका के हाथ से एक बड़ा बाजार निकल जाएगा. इसलिए, अपने इन अरब मित्रों को ईरानी मिसाइलों के गुस्से से बचाए रखने के लिए ट्रंप इजरायल के आक्रामक कदमों पर फिलहाल ब्रेक लगा रहे हैं.
ट्रंप का 'ग्रैंड डिजाइन' और आगे की राह
कुल मिलाकर देखा जाए तो डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इजरायल को ईरानी हमले का बदला लेने से रोकना किसी भी तरह से ईरान के प्रति उनका नरम रुख नहीं है, बल्कि यह बेहद चतुर और दूरगामी 'ग्रैंड डिजाइन'का हिस्सा है. ट्रंप एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं- वे वैश्विक तेल बाजार को बचा रहे हैं. अमेरिकी सैनिकों को सीधे युद्ध से दूर रख रहे हैं.
हिजबुल्लाह के सफाए के लिए इजरायल को स्पेस दे रहे हैं. अपने अरब सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं. ईरान को आर्थिक रूप से घुटनों पर लाने का जाल बुन रहे हैं. अब देखना यह होगा कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू वाशिंगटन के इस कूटनीतिक दबाव को किस हद तक स्वीकार करते हैं. मिडल ईस्ट की यह बिसात आने वाले दिनों में क्या नया रंग दिखाती है.
ऋचीक मिश्रा