पुलिस वालों के नाक-कान काट लेता था असली गब्बर

शोले एक ऐसी फिल्म थी, जिसका हर किरदार आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है. खासकर वो किरदार जो विलेन होते हुए भी स्टार बन गया था. वो किरदार था डाकू गब्बर सिंह. दरअसल गब्बर काल्पनिक नहीं बल्कि एक असल डाकू का नाम था. जिसने एक दशक तक चंबल में राज किया था.

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50 के दशक में गब्बर सिंह पुलिस के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गया था 50 के दशक में गब्बर सिंह पुलिस के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन गया था

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 25 फरवरी 2016,
  • अपडेटेड 7:43 PM IST

शोले एक ऐसी फिल्म थी, जिसका हर किरदार आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है. खासकर वो किरदार जो विलेन होते हुए भी स्टार बन गया था. वो किरदार था डाकू गब्बर सिंह. दरअसल गब्बर काल्पनिक नहीं बल्कि एक असल डाकू का नाम था. जिसने एक दशक तक चंबल में राज किया था. वह पुलिस के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया था. गब्बर पुलिस वालों से बेहद नफरत करता था.

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कौन था गब्बर सिंह
चंबल का कुख्यात डाकू गब्बर सिंह उर्फ़ गबरा का जन्म 1926 में भिंड जिले के डांग गांव में हुआ था. वह गांव का एक साधारण युवक हुआ करता था लेकिन बाद में उसने जुर्म की दुनिया का रुख कर लिया था. गब्बर ने 1955 में अपना घर और गांव छोड़ दिया था. और वह उस वक्त के चर्चित कल्याण सिंह गूजर के गैंग में शामिल हो गया था.

अपना गैंग बनाया
गब्बर सिंह ने गैंग में शामिल होकर कई वारदातों को अंजाम दिया. मगर उसकी दोस्ती कल्याण गूजर के साथ ज्य़ादा दिनों तक नहीं चली. कुछ महीने बाद ही गब्बर सिंह ने अपना गैंग बना लिया था. धीरे-धीरे उसका नाम चंबल की घाटियों में गोलियों के साथ गूंजने लगा था. उसका गिरोह अब उसके नाम से कुख्यात हो गया था.

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गब्बर का आतंक
मध्य प्रदेश के बीहड़ों में 50 के दशक में गब्बर का नाम आतंक का पर्याय बनता जा रहा था. लोग उसके नाम से खौफ खाने लगे थे. पुलिस महकमा भी उसकी हरकतों से परेशान था. आए दिन वो संगीन वारदातों को अंजाम दे रहा था. पुलिस रिकार्ड में उसके नाम से मामले बढ़ते जा रहे थे. चंबल में उसके नाम की तूती बोलने लगी थी. भिंड, ग्वालियर, इटावा, ढोलपुर में गब्बर का इतना ख़ौफ था कि उसके बारे में कोई बात करने को भी तैयार नहीं होता था.

लोगों के नाक कान काट लेता था गब्बर
एक किसी तांत्रिक ने डाकू गब्बर सिंह से कहा था कि अगर वह अपनी कुल देवी को 116 लोगों के कटे हुए नाक कान चढ़ाएगा तो पुलिस या किसी और की गोली उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. यह बात गब्बर के दिमाग में घर कर चुकी थी. उस वक्त डाकू गब्बर सिंह ने प्रण लिया था कि वो अपनी कुल देवी के सामने 116 लोगों के नाक कान काटकर देवी को भेंट चढ़ाएगा. और उसके बाद गब्बर ने सैंकड़ों लोगों के नाक कान काट डाले. जिनमे अधिकतर पुलिस वाले शामिल थे.

इनामः पूरे पचास हजार
गब्बर के जुर्म की किताब में हर दिन एक नया पन्ना जुड़ता जा रहा था. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत तीन राज्यों की पुलिस उसे तलाश रही थी. उसे पकड़ना बहुत मुश्किल काम था. इसी वजह से पुलिस ने 50 के उस दशक में डाकू गब्बर सिंह के सिर पर 50 हजार रुपये का नकद इनाम रखा था. उस दौर में यह भारत में किसी वॉन्टेड अपराधी के सिर पर रखा गया सबसे बड़ा इनाम था.

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नेहरु भी थे परेशान
डाकू गब्बर सिंह को पकड़ना पुलिस के लिए मुश्किल हो गया था. जब जब पुलिस और उसके गिरोह का आमना सामना होता था. तो उल्टे मुठभेड़ में पुलिस को ही ज़्यादा नुकसान झेलना पड़ता था. उस दौर में चंबल में करीब 16 गैंग थे लेकिन डाकू गब्बर सिंह का गैंग सब पर भारी थी. देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी चबंल के हालात और डाकुओं के गिरोह को लेकर काफ़ी फिक्रमंद थे.

युवा अधिकारियों को मिली थी जिम्मेदारी
डाकू गब्बर सिंह को लेकर देश और प्रदेश की सरकारें परेशान थी. हर कोई उसका खात्मा चाहता था. बात 1959 की है. एक अहम बैठक में गब्बर को खत्म करने के लिए योजना बनाई गई. और उसे खत्म करने का ज़िम्मा युवा पुलिस अधिकारी राजेंद्र प्रसाद मोदी को सौंपा गया. उस वक्त मोदी डिप्टी एसपी थे. उन्होंने उसी साल कुख्यात डकैत पुतलीबाई के खिलाफ़ चलाए गए ऑपरेशन में भी भागीदारी की थी. मगर गब्बर सिंह का एनकाउंटर आईपीएस अफसर के.एफ. रुस्तमजी ने किया था. वह पद्म विभूषण अवॉर्ड पाने वाले एक मात्र पुलिस ऑफिसर थे. के.एफ. रुस्तमजी 6 साल से ज्यादा समय तक तत्कालीन प्रधानमंत्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी भी रहे थे.

ऐसे मारा गया था गब्बर
'द ब्रिटिश, द बैंडिट्स एंड द बॉर्डरमैन' के किताब के मुताबिक नवंबर 1959 में डीएसपी मोदी को रामचरण नाम के एक गांववाले ने गब्बर सिंह के बारे में अहम जानकारी दी. क्योंकि मोदी ने एक बार उसके बच्चे की जान बचाई थी. जानकारी मिलते ही पुलिस हरकत में आ गई थी. 13 नवंबर के दिन पुलिस ने गब्बर के ठिकाने को घेर लिया. दोनों तरफ से ज़बर्दस्त गोलीबारी होने लगी थी. डीएसपी मोदी रात होने से पहले ऑपरेशन ख़त्म करना चाहते थे. वो लड़ते-लड़ते गब्बर गैंग के काफ़ी करीब पहुंच गए. मोदी ने डाकुओं पर दो ग्रेनेड फेंके और हमला किया. फिर भी डाकुओं की तरफ से फायरिंग जारी थी. एक ग्रेनेड गब्बर सिंह के पास गिरा और उसका जबड़ा बुरी तरह जख्मी हो गया था. कुछ देर बाद चबंल का आतंक डाकू गब्बर सिंह मारा जा चुका था. पुलिस ने उसके पूरे गैंग का सफाया कर दिया था. यह मुठभेड़ लोगों के सामने हुई थी. गांव वाले और राहगीर एक रेलगाड़ी की छत पर खड़े होकर मुठभेड़ देख रहे थे. ऐसे ही हाइवे पर बसों की छतों पर लोग जमा थे.

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गब्बर सिंह पर किताब
डाकू गब्बर सिंह के कई किस्से तत्कालीन आईपीएस अफसर केएफ रुस्तमजी की डायरी में दर्ज थे. रुस्तमजी 50 के दशक में मध्य प्रदेश पुलिस के महानिरीक्षक थे. रुस्तमजी रोज़ाना डायरी लिखा करते थे. जिसे बाद में आईपीएस अधिकारी पीवी राजगोपाल ने एक क़िताब की शक्ल दी. उस किताब का नाम था 'द ब्रिटिश, द बैंडिट्स एंड द बॉर्डरमैन.' राजगोपाल ने यह किताब रुस्तमजी की इजाजत और उन्ही के मार्ग दर्शन में लिखी थी.

ऐसे 'शोले' में आया डाकू गब्बर सिंह
शोले फिल्म के गब्बर की कहानी भले ही सीधे-सीधे असली गब्बर की कहानी से अलग थी. लेकिन फिल्म के लेखक सलीम खान चबंल के खूंखार डाकु गब्बर सिंह की कहानी से अच्छी तरह वाकिफ थे. इसकी वजह यह थी कि सलीम के पिता भी मध्य प्रदेश पुलिस में अधिकारी थे. सलीम उन्ही से आए दिन गब्बर के बारे में सुना करते थे. जब वे शोले फिल्म की कहानी लिख रहे थे. तो वहीं से डाकू गब्बर सिंह का किरदार उनके जेहन में आया था.

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