सचिन वाज़े- शोहरत की खातिर बन बैठा एक खौफनाक साजिश का मास्टरमाइंड!

सचिन वाज़े. ये वो नाम है, जो मुंबई में बहुत आम है. मगर करीब 40 साल पहले तक कोह्लापुर में ये नाम बहुत बदनाम था. बाइक पर दबंगई करने के लिए. पुलिस में नौकरी मिली तो लोगों ने सोचा अब सुधर जाएगा. मगर अब तो उसे वर्दी में दबंगई करने का लाइसेंस मिल गया था. वो ताबड़तोड़ फैसले ले रहा था. आरोपियों को बिना अदालत का इंतज़ार किए खुद ही सज़ा दे रहा था. अब उसे रोकना मुश्किल हो गया था.

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सचिन वाज़े ने ऐसी खौफनाक साजिश रची, जिसे जानकर हर कोई हैरान है सचिन वाज़े ने ऐसी खौफनाक साजिश रची, जिसे जानकर हर कोई हैरान है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 मार्च 2021,
  • अपडेटेड 4:40 PM IST

पूरे शहर में उसे लोग अब सिरफिरा बाइकर कहने लगे थे. बड़ा मज़ा आता था उसे एक्सीलेटर का कान उमेटने में. साइलेंसर से धू-धू कर के निकलता धुआं उसे खुशी देता था और वो रफ्तार में किसी से पीछे रह जाए, ये उसे गंवारा नहीं था. दिन ब दिन उसकी दीवानगी बढ़ती जा रही थी. 18 बरस की उसकी जवानी उबाल मार रही थी. फिर किसी ने उसे एक मश्वरा दिया. जवानी गंवाने की नहीं. कमाने की चीज़ है और इस मश्वरे ने उसकी रफ्तार की सिम्त बदल दी. 

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भारतीय संविधान के मुताबिक अपने कर्तव्यों का पूरी लगन, निष्ठा और ईमानदारी के साथ पालन करने की कसम खाकर साल 1990 में उस बाइकर ने मुंबई पुलिस फोर्स ज्वाइन की. बतौर सब इंस्पेक्टर उसे पहली पोस्टिंग ही मिली गढ़चिरौली. नक्सल प्रभावित इस इलाके में पुलिसवाले अपनी जान हथेली पर लेकर ड्यूटी करते हैं और इन हालात में वो पहुंचा गढ़चिरौली. उसका नाम था सचिन वाज़े. 

सचिन वाज़े. ये वो नाम है, जो मुंबई में बहुत आम है. मगर करीब 40 साल पहले तक कोह्लापुर में ये नाम बहुत बदनाम था. बाइक पर दबंगई करने के लिए. पुलिस में नौकरी मिली तो लोगों ने सोचा अब सुधर जाएगा. मगर अब तो उसे वर्दी में दबंगई करने का लाइसेंस मिल गया था. वो ताबड़तोड़ फैसले ले रहा था. आरोपियों को बिना अदालत का इंतज़ार किए खुद ही सज़ा दे रहा था. अब उसे रोकना मुश्किल हो गया था. 

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सड़कों पर मारे-मारे फिरने के उलट, ये ज़िम्मेदारी भरी नौकरी मुश्किल तो थी. लेकिन वर्दी का रौब और उसकी वजह से मिलने वाली इज़्ज़त सचिन वाज़े को भा रही थी. उसे मज़ा आता था अपनी वर्दी का रौब झाड़ने में. बीच सड़क अपराधियों को पीटने में. और अब तो उसे अपनी दबंगई दिखाने से रोकने वाला भी कोई नहीं था. जल्द ही वाज़े के काम को देखते हुए उसे ठाणे ट्रांस्फर कर दिया गया. वहां भी वो मुश्किल से मुश्किल केसेज़ को चुटकियों में सुलझाने लगा. 

केस सुलझाने की उसकी गिनती लॉटरी के नंबरों की तरह जल्दी जल्दी बदल रही थी.. क्योंकि वो पुलिस की इस नौकरी को ड्यूटी की तरह नहीं.. बल्कि एन्जॉय कर के कर रहा था. ठाणे पुलिस में स्पेशल स्क्वॉड बनाई गई और उसमें उसे शामिल नहीं किया गया. बल्कि वाज़े ही उस स्क्वॉड को हेड कर रहा था. वाज़े के काम को देखते हुए उसे ठाणे से मुंब्रा के मुस्लिम बाहुल इलाके का चार्ज दिया गया. यहां भी वो कमाल पर कमाल करता चला जा रहा था. यहां उसने वो कर दिखाया जो बड़े से बड़े नेता नहीं कर पा रहे थे. हिंदू-मुस्लिम एकता.

हालांकि वाज़े का फोकस स्पेशल स्क्वॉड पर ज़्यादा था. क्योंकि पॉवर उसके हाथ में थी और अब उसे शोहरत चाहिए थी. लिहाज़ा वाज़े ने शुरु किया एनकाउंटर करने का सिलसिला. ज़्यादातर सचिन वाज़े सादी वर्दी में ही नज़र आता था. लेकिन ठसक ऐसी थी कि जब वो सड़कों पर निकलता था तो उसका रौब देखने वाला होता था. अब वाजे मुंबई पुलिस महकमे की पहचान बनने लगा था. हर बड़े मामले की ज़िम्मेदारी उसी को सौंपी जा रही थी. बड़े से बड़े गैंगस्टरों और हिस्ट्रीसीटरों से वो सीधा लोहा ले रहा था. 

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क्या बिल्डर. क्या अभिनेता और क्या राजनेता सबकी जुबां पर मुसीबत के वक्त एक ही नाम आता था. सचिन वाजे. वाज़े का नाम पूरे महकमे. पूरी मीडिया की जुबान पर चढ़ने लगा था. वाज़े की पहचान एक तेज़ तर्रार पुलिस अफसर के तौर पर हो रही थी. और इसीलिए मुंबई पुलिस की एलीट क्राइम इंटेलीजेंस यूनिट यानी CIU में उसे शामिल कर लिया गया.

वाज़े अब कोई मामूली पुलिस वाला नहीं रह गया था. वो अब सुपर कॉप बन चुका था. अपनी कदकाठी. रौबदार चाल और स्टाइलिश पहनावे की वजह से वो भीड़ में अलग ही नजर आता था. बड़े से बड़ा अपराधी भी अब उसके नाम से घबराने लगा. लेकिन उसके तेवर को अभी और भी पर लगने बाकी थे. और वो पर तब लगे जब उसे प्रदीप शर्मा जैसे एनकाउंटर स्पेशियलिस्ट के साथ काम करने का मौका मिला. 

इस तरह सचिन वाजे अपनी ज़िंदगी के जिस टर्निंग प्वाइंट का इंतजार कर रहा था वो उसे मिल ही गया. प्रदीप शर्मा का भरोसा जीतने के बाद सचिन वाजे के सिर पर अपना सिक्का जमाने का ऐसा जुनून सवार हुआ कि उसने अंडरवर्ल्ड की नींव तक को हिला डाला. सचिन वाजे के सितारे अब 360 डिग्री के एंगल से पलटने लगे. 1990 का दशक खत्म होते होते सचिन वाजे मुंबई के अखबारों की सुर्खियां बनता चला गया और जिस पहचान की उसे जरूरत थी वो अब उसकी क़दमों में थी.

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फिल्मी स्टाइल में वाज़े मुंबई पर राज़ करने वाले दाऊद, छोटा राजन और अरुण गवली के गुर्गों को चुन चुनकर मार रहा था. 1993 के धमाकों के बाद गैंग्स्टर्स के साथ वाज़े की मुठभेड़ अब आम खबरों में शुमार होने लगी थीं. अब तक सचिन वाज़े 63 एनकाउंटर कर चुका था. वो उस काम को अंजाम दे रहा था जिसके बारे में किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी. क्योंकि वो कॉल ट्रेसिंग, सर्विलांस और कॉल्स इंडरसेप्ट करने का हुनर जानता था. उनकी इसी क्वालिटी की वजह से आला अफसरों ने उसे कई ऑपरेशन में अपने साथ रखा और सचिन वाजे अपने इसी हुनर की वजह से आला अफसरों की पहली पसंद बन गया.

आला अफसरों की सरपरस्ती मिलने की वजह से पूरे महकमे में सचिन वाजे की तूती बोलने लगी. उसके सीनियर भी उसने घबराने लगे. ज़ाहिर है दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचने लगा. अब उसे शोहरत के साथ पैसा भी चाहिए था. महंगी घड़ियां, परफ्यूम, कारें अब उसका नया शगल बन गया. वक्त के पहिए ने फिर से घूमना शुरु किया. साल आया 2002. मुंबई के घाटकोपर इलाके में एक ज़बरदस्त धमाका हुआ. उसमें दो लोग मारे गए और 50 से ज़्यादा घायल हो गए. 

ब्लास्ट के सिलसिले में कई गिरफ्तारियां हुई. और इनमें एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ख्वाजा युनूस भी शामिल था. जिसे सचिन वाज़े और उसकी टीम ने इस बेरहमी से पीटा की उसने लॉकअप में ही दम तोड़ दिया. जिसके बाद वाज़े को पुलिस फोर्स से सस्पेंड कर दिया गया. सस्पेंड रहने के दौरान उसने शिव सेना ज्वाइन की थी. लेकिन पिछले साल यानी 2020 में उसे पुलिस फोर्स में बहाल कर दिया गया. और इस बार उसने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दांव खेलने का फैसला किया. 

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एंटीलिया - एक साज़िश 
25 फरवरी देर रात देश के सबसे अमीर आदमी मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के बाहर एक स्कॉर्पियो लावारिस हालत में खड़ी मिलती है. मुकेश अंबानी के सुरक्षा गार्ड में से कोई एक शख्स सौ नंबर पर कॉल करता है. कॉल सौ नंबर पर किया गया था. लेकिन लोकल पुलिस से पहले ही मौके पर क्राइम ब्रांच यूनिट में तैनात असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे मौके पर पहुंच जाते हैं. गाड़ी की तलाशी ली जाती है. गाड़ी के अंदर जिलेटिन की 20 छड़, मुकेश अंबानी के सुरक्षा काफिले में तैनात कई गाड़ियों के फर्ज़ी नंबर प्लेट, मुंबई इंडियन का एक बैग और एक लेटर मिलता है. लेटर मुकेश अंबानी और उनकी पत्नी नीता अंबानी के नाम पर टूटी फूटी अंग्रेज़ी में लिखा था. लेटर का मज़मून था. 'ये तो सिर्फ ट्रेलर है, नीता भाभी, मुकेश भैया, ये तो सिर्फ एक झलक है. अगली बार सामान पूरा होकर वापस आएगा और इंतजाम पूरा हो गया है.'

इसके बाद जब स्कॉर्पियो के इंजन और चेसिस नंबर की जांच की जाती है. तो पता चलता है कि इस गाड़ी का असली नंबर एमएच 02 एवाई 2815 है. और ये गाड़ी ठाणे में रहनेवाले मनसुख एम हिरेन के नाम रजिस्टर्ड है. पुलिस मनसुख हिरेन से पूछताछ करती है. मनसुख हिरेन बताते हैं कि उनकी ये गाड़ी 17 फरवरी को नागूर फ्लाईओवर के नज़दीक ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे से चोरी हो गई थी. अब तक मामले की जांच एपीआई सचिन वाजे को सौंप दी गई थी. मामले की जांच अभी जारी थी. पर तभी कहानी में एक सनसनीखेज़ मोड़ आता है. 

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4 मार्च की रात आठ बजे मनसुख हिरेन के पास एक फोन आता है. मनसुख के भाई विनोद मनसुख के मुताबिक फोन किसी पुलिस अफसर का था और उसने पूछताछ के लिए उन्हें थाने बुलाया था. लेकिन इसके बाद मनसुख हिरेन का फोन रहस्यमयी तरीके से स्विच्ड ऑफ हो जाता है. मनसुख का दस बजे तक घर ना लौटना और उनका मोबाइल बंद होना. घरवालों को चिंता में डाल देता है. लिहाज़ा वो फौरन पुलिस में जाकर इस तरह मनसुख के अचानक गायब हो जाने की रिपोर्ट लिखवाते हैं. मगर उन्हें क्या पता था. एंटीलिया के बाहर जो साज़िश रची गई. उसमें मनसुख को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. 

शतरंज की बिसात पर राजा भी होता. वज़ीर भी होता हैं. मगर आगे सबसे पहले प्यादे को किया जाता है. जानते हैं क्यों. क्योंकि प्यादा और कुछ नहीं महज़ एक मोहरा होता है. एंटीलिया कांड में मनसुख की स्कॉर्पियो कार देखने के बाद मनसुख हिरेन को बहुत से फोन आने लगे. नाते-रिश्तेदारों. पुलिसवालों और मीडिया के. मगर जो आखिरी फोन उसे एक पुलिसवाले ने किया. उससे मनसुख ऐसे बात कर रहा था. जैसे वो उसका दोस्त हो. मगर मनसुख इस मामले में नासमझ निकले. क्योंकि जिसे वो अपना दोस्त समझ रहे थे. वो उसे मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा था. मनसुख हिरेन और कुछ नहीं इस मामले में सिर्फ एक मोहरा बनकर रह गए थे. कॉल के बाद मनसुख घर से निकल गए.  

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मनसुख हिरेन- एक मोहरा
पूरी रात मनसुख की कोई खबर नहीं लगती. फिर अगले दिन यानी 5 मार्च सुबह मनसुख हिरेन की लाश मुंब्रा क्रीक के पानी में मिलती है. लाश कीचड़ में फंसी थी. पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज देती है. शुरुआती जांच के बाद मुंबई पुलिस ने बताया कि ऐसा लगता है कि मनसुख ने खुदकुशी कर ली है. लेकिन मनसुख के घरवाले ये मानने को तैयार ही नहीं कि मनसुख खुदकुशी कर सकते हैं. पुलिस की थ्योरी पर कई सवाल उठ रहे थे. क्योंकि मनसुख एक अच्छे तैराक थे. सोसायटी के बच्चों को स्विमिंग सिखाते थे और एक तैराक का यूं डूब कर मर जाना गले नहीं उतरता. दूसरा मनसुख के मुंह पर कई रूमाल थे और एक काला स्कार्फ. डूब कर मरनेवाला शख्स क्या अपने हाथों से रूमाल और स्कार्फ़ बांधेगा? इतना ही नहीं मनसुख का फोन विरार और मीरा रोड पर आखिरी बार ऑन हुआ था. जो मुंब्रा क्रीक से करीब 40 किलोमीटर दूर है. मनसुख के पास से या घर से कोई सुसाइड नोट भी नहीं मिला है.

मनसुख की मौत पर सवात तो था ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कहानी और पेचीदा हो गई. मनसुख ने खुदकुशी नहीं की बल्कि उसका क़त्ल किया गया था. पोस्टमार्टम और डॉयटम टेस्ट ये बता रहे थे कि उसकी मौत पानी में डूबने से हुई. और मौत से पहले उसके चेहरे पर लगे चोट के निशान भी क़त्ल की तस्दीक कर रहे थे. मगर कहानी में मोड़ तब आया जब ये बात सामने आई कि मनसुख और सचिन वाज़े पहले से एक दूसरे को जानते थे. यानी मनसुख हीरेन इस साज़िश का वो मोहरा था. जिसे खुद को नहीं पता था कि वो वाज़े से अपनी दोस्ती के चक्कर में किस मुसीबत में फंसने वाला है. कनेक्शन जुड़ रहे थे. क्योंकि जो कार मुकेश अंबानी के घर के बाहर मिली वो वाज़े के दोस्त की थी. क्योंकि सचिन वाज़े सौ नंबर पर कॉल करने के बाद लोकल पुलिस से भी पहले मौके पर पहुंच गए थे. क्योंकि सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड के मुताबिक सचिन वाज़े और मनसुख पिछले साल जून से ही एक दूसरे के संपर्क में थे. सचिन भी ठाणे में रहते हैं. और मनसुख भी ठाणे में रहते हैं. तो अगर ये एक साज़िश थी. तो इस साज़िश को रचा कहां गया? 

क्राइम ब्रांच सीआईयू दफ़्तर - एक अड्डा
मनसुख की मौत के बाद ये मामला अब कुछ ज़्यादा ही बड़ा हो चुका था और मामले की जांच क्राइम ब्रांच की सीआईयू यूनिट से लेकर एनआईए के हवाले करनी पड़ी. अब एंटीलिया विस्फोटक की जांच एनआईए कर रही थी और मनसुख के क़त्ल की जांच महाराष्ट्र एटीएस. जांच की पर्तें उधेड़ते हुए जब एनआईए की टीम इस मामले के मास्टरमाइंड और अब तक के हिसाब से प्राइम सस्पेक्ट असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाज़े के दफ्तर यानी मुंबई पुलिस क्राइम ब्रांच सीआईयू यूनिट में पहुंची तो वहां के हालात देखकर एनआईए को एहसास हो गया कि वाज़े का यही वो सरकारी दफ्तर है, जिसे उसने साज़िश का अड्डा बना रखा है. 

क्राइम ब्रांच सीआईयू दफ्तर के परिसर से एनआईए को एक काली मर्सिडीज़ हाथ लगती है जिसमें एंटीलिया वाले स्कॉर्पियो का ओरिजिनल नंबर प्लेट. पांच लाख रुपये कैश. नोट गिनने की एक मशीन और पेट्रोल डीज़ल से भरी बोतलें मिलती हैं. धीरे धीरे इन सारी ही चीज़ों का कनेक्शन सचिन वाज़े और मनसुख की साज़िश से जुड़ जाता है. और बार बार इस साज़िश में एक नाम आता है और वो नाम है क्राइम ब्रांच सीआईयू दफ्तर. यानी साज़िश का वो अड्डा जहां मनसुख के क़त्ल की एक एक साजिश रची गई. 

एनआईए को पता चलता है कि मनसुख के क़त्ल के रोज़ यानी 4 मार्च को सचिन वाज़े पूरे दिन मुंबई पुलिस हेडक्वार्टर के सीआईयू ऑफिस में ही था और यहीं से क़त्ल की पूरी प्लानिंग को अंजाम देता रहा. हालांकि मोबाइल की लोकेशन के मुताबिक सचिन वाज़े दोपहर में 12 बजकर 48 मिनट पर चैंबुर के एमएमआरडीए कॉलोनी गया था. चार मार्च की ही रात क़रीब साढ़े ग्यारह बजे सचिन वाज़े क्राइम ब्रांच सीआईयू के पुलिसवालों के साथ डोंगरी इलाक़े में छापा डालने के लिए टिप्सी बार पहुंचा. और यहां अपनी टीम के साथ देर रात तक छापेमारी का नाटक करता रहा. उसे पता था कि देर सवेर मनसुख हिरेन की मौत के तार को उससे जोड़ा जाएगा. क्योंकि दोनों की बातचीत की कॉल डिटेल और उनके रिश्ते आम हो चुके थे. बस इसीलिए मनसुख की मौत के वक़्त ख़ुद को वो मौका-ए-वारदात से बहुत दूर दिखाना चाहता था. वो भी ऑफिशियल ड्यूटी पर. ठीक उसी रात जिस रात मनसुख की मौत हुई. लेकिन विनायक शिंदे और नरेश गोर के बयान और मोबाइल की कॉल डिटेल ने सचिन वाज़े की पोल खोल दी.

फाइव स्टार होटल- साज़िश का हेडक्वॉर्टर 
जब एनआईए की जांच आगे बढ़ी तो मुंबई के एक पांच सितारा होटल में सचिन वाज़े और एक मिस्ट्री वुमैन की तस्वीरों का पता चला. ये दोनों होटल में 16 फरवरी को पांच बड़े बड़े बैग और नोट गिनने की मशीन के साथ चेक इन करते नज़र आए. वाजे, 16 फरवरी से 20 फरवरी तक इसी होटल में ठहरा था. इसके लिए उसने फर्ज़ी आधार कार्ड का इस्तेमाल किया. वाजे के लिए एक कारोबारी ने 100 दिनों के लिए ये होटल में ये कमरा बुक किया था. यह बुकिंग एक ट्रेवल एजेंट के ज़रिए की गई थी.

अब सवाल ये है कि जिस सचिन वाज़े का घर इस फाइव स्टार होटल से एक घंटे के फासले पर हो. वो सचिन वाज़े एंटीलिया वाली साज़िश से ऐन पहले चार दिनों तक एक मिस्ट्री वुमैन के साथ इस पांच सितारा होटल में आखिर क्या करता रहा. तो क्या एंटीलिया की पूरी साज़िश इसी होटल में रची गई. जांच में साफ हो गया है कि उस रात सचिन वाज़े होटल में जो पांच बड़े बड़े बैग लेकर पहुंचा था उनमें नोट ही नोट भरे थे. सवाल ये भी है कि आखिर एंटीलिया कांड से ठीक पहले सचिन वाज़े के लिए इस होटल में खुफिया तरीके से ठहरना इतना क्यों ज़रूरी हो गया कि उसने इसके लिए फर्ज़ी आधार कार्ड तक इस्तेमाल कर लिया. 

एनआईए को शक़ है कि एंटीलिया कांड की पूरी साज़िश इसी फाइव स्टार होटल में रची गई.. वो इसलिए भी क्योंकि 16 फरवरी को सचिन वाज़े इसी फ़र्ज़ी आधार कार्ड के ज़रिए इस होटल में चेक-इन करता है. और ठीक एक दिन बाद यानी 17 फरवरी को मनसुख हिरेन की कार फर्ज़ी तरीके से चोरी हो जाती है. इस होटल की सीसीटीवी तस्वीरों में सचिन वाज़े पांच बड़े-बड़े बैग लेकर होटल के रिशेप्सन पर दिखाई दे रहा है. उसके साथ एक महिला भी नज़र आ रही है. सवाल ये है कि आखिर इस महिला से सचिन वाज़े का रिश्ता क्या है. अब तक की पूछताछ से पता चला है कि होटल में रुकने का सारा बिल एक बिजनेसमैन दिया करता था. दिसंबर जनवरी और फरवरी में कई रातें सचिन वाज़े ने इस होटल में बिताई हैं. मगर रहस्यमयी किरदार होटल में सचिन वाज़े के साथ रुकी वो मिस्ट्री वुमैन ही नहीं बल्कि कोई और भी था.

तावड़े- रहस्यमयी किरदार
चार मार्च यानी मनसुख हिरेन की क़त्ल की रात क़रीब सात बजे सचिन वाज़े क्राइम ब्रांच सीआईयू के अपने दफ्तर से ठाणे के लिए निकलता है. ठाणे पहुंचने के बाद मनसुख हीरेन को फोन करता है. इसके बाद वो उसे एक खास जगह पर बुलाता है. सचिन वाज़े मनसुख हीरेन से ये भी कहता है कि वो अपनी बीवी विमला को ये बताए कि कांदीवली पुलिस स्टेशन से किसी तावड़े साहब का फ़ोन आया है. दरअसल, सचिन वाज़े को मालूम था कि मनसुख हीरेन की बीवी और परिवार के लोग उससे नाराज़ हैं. क्योंकि उसने मनसुख को एंटीलिया केस में दो-तीन दिन के लिए गिरफ्तार हो जाने को कहा था. साथ ही ये वादा किया था कि दो तीन बाद वो उसे छुड़ा लेगा. ये बात मनसुख हिरेन ने अपनी पत्नी और घरवालों को बता दी थी. इसी के बाद से वो लोग सचिन वाज़े से नाराज़ थे. और बस इसी वजह से सचिन वाज़े ने मनसुख हिरेन से ये कहा कि वो किसी तावड़े का नाम लेकर घर से बाहर निकले. मगर एक तरफ मनसुख हिरेन के कदम घर से बढ़ रहे थे. और वहीं दूसरी तरफ. जुर्म के पहिये उसकी तरफ बढ़ रहे थे. 

मर्सिडीज़ और वॉल्वो - जुर्म के पहिये
वैसे तो सचिन वाज़े कहने को एक मामूली पुलिस मुलाज़िम था. असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर. लेकिन उसके रौब दाब ऐसे थे कि बड़े से बड़ा रईस भी पीछे रह जाए. वो कभी अपनी सरकारी इनोवा में नज़र आता. कभी काली मर्सिडीज़ पर. कभी वॉल्वो पर तो कभी किसी और हाईएंड कार पर. इस मामले की तफ्शीश करती हुई जब एनआईए की टीम पहली बार क्राइम ब्रांच के दफ्तर पहुंची तो क्राइम ब्रांच सीआईयू परिसर में सचिन वाज़े की काली मर्सिडीज़ एसयूवी देखकर ठिठक गई. इस मर्सिडीज़ में एंटीलिया वाली स्कॉर्पियो की ओरिजिनल नंबर प्लेट. पांच लाख रुपये कैश. नोट गिनने की एक मशीन. और पेट्रोल डीज़ल से भरी बोतलें मिलीं. धीरे धीरे इन सारी ही चीज़ों का कनेक्शन सचिन वाज़े और मनसुख की साज़िश से जुड़ जाता है. मर्सिडीज़ में मिली बाकी चीज़ों के साथ जब पेट्रोल और डीज़ल मिली थी, उसका मक़सद भी जल्द ही साफ हो गया. पता चला कि एंटीलिया के बाहर विस्फोटक वाली स्कॉर्पियो रखने के दौरान जिस ओवरसाइज़ कुर्ते को पहनकर वहां पहुंचा था, उसने इन्हीं बोतलों में रखे तेल से वो कर्ता मुलुंड टोल नाके के पास जलाया था. कुल मिलाकर एंटीलिया की साज़िश का एक बड़ा हिस्सा इसी काली मर्सिडीज़ से जुड़ा हुआ था.

उधर एटीएस ने दमन की एक फैक्ट्री से वॉल्वो की एक और एसयूवी बरामद की जिसका सीधा रिश्ता सचिन वाज़े से जुड़ा.. मनसुख के क़त्ल के मामले की जांच जब एटीएस से लेकर एनआईए के हवाले की गई तो एनआईए ने भी इस वॉल्वो को खंगालना शुरु किया.. फिलहाल एक तरफ इस वॉल्वो की गहन फॉरेंसिक जांच का सिलसिला जारी है.. वहीं दूसरी तरफ सचिन वाज़े के राज़दार उसके दो गुर्गों सज़ा याफ्ता और बर्खास्त पुलिसवाले विनायक शिंदे.. और सटोरिये नरेश गोर ने ये खुलासा कर दिया कि ये वही वॉल्वो है जिसमें खुद सचिन वाज़े की मौजूदगी में उन्होंने 4 मार्च की रात क्लोरोफॉम सुंघाकर मनसुख हिरेन की जान ली थी.. क्लोरोफॉम सुंघाने के दौरान मनसुख की कातिलों से हाथापाई भी हुई और मनसुख के चेहरे पर कई चोटें भी आईं.. फॉरेंसिक के एक्सपर्ट अब ये खंगालकर देख रहे हैं कि कहीं वॉल्वो में मनसुख के खून का कोई कतरा तो नहीं है.. इसी चलती कार में क्लोरोफॉम के 5 रुमालों से मनसुख बेहोश तो हो गया लेकिन अब तक उसकी जान नहीं गई थी.. 

मुंब्रा क्रीक- साज़िश का ख़ात्मा 
सचिन वाज़े के बुलावे पर मनसुख हिरेन खुद अपने पैरों पर चलकर 4 मार्च की रात अपनी मौत की तरफ बढ़ रहा था. मदद के धोखे में मनसुख सीधे सचिन वाज़े की वॉल्वो में जाकर बैठ गया जिसमें पहले से ही सचिन के अलावा दो से तीन लोग और मौजूद थे. अपने आने वाले वक्त से बेखबर मनसुख के कार में बैठते ही वाज़े के इशारे पर शिंदे और गोर जैसे लोग क्लोरोफॉम वाले रुमाल के साथ उसपर टूट पड़े. मनसुख ने विरोध भी किया लेकिन क्लोरोफॉम की खतरनाक डोज़ से वो खुद को बेहोश होने से नहीं बचा पाया. कार में बैठे सभी के सभी कातिलों को ये लगने लगा कि मनसुख की मौत हो गई है. लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती थी लाश निपटाने की. गरज़ ये कि मनसुख ना सिर्फ एंटीलिया केस में इस्तेमाल हुई स्कॉर्पियो का मालिक था. बल्कि अब मीडिया समेत पूरी दुनिया की निगाहें उसकी तरफ थीं.

कातिल अब उसी वॉल्वो में मुंबई एक कोने पर मौजूद समुंदर की खाड़ी यानी मुंब्रा क्रीक के लिए निकल पड़े. साज़िश ये थी कि मनसुख की लाश को खाड़ी में डाल दिया जाए ताकि देर रात हाई टाईड की वजह से मनसुख की लाश बहकर समंदर में दूर निकल जाए और उसकी मौत हमेशा हमेशा के लिए एक रहस्यमयी गुमशुदगी बनकर रह जाए. लेकिन होनी को शायद कुछ और ही मंज़ूर था. 

अगले दिन यानी 5 मार्च कि सुबह मनसुख की लाश लोगों को उसी मुंब्रा क्रीक के कीचड़ में फंसी नज़र आ गई, जहां कातिलों ने ज़िंदा मनसुख को मरा हुआ समझकर पानी में फेक दिया था. इधर, लाश बरामद हुई और उधर भूचाल आ गया. क्योंकि ये एंटीलिया स्कॉर्पियो केस के सबसे अहम किरदार की रहस्यमयी मौत थी. मुंबई पुलिस ने तो मनसुख को पहले से ही परेशान बताकर उसकी मौत को खुदकुशी करार देना शुरु भी कर दिया था. लेकिन चश्मदीदों की गवाही और पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी कहानी पलट दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि मनसुख की मौत पानी में डूबने से हुई जबकि हकीकत ये थी कि मनसुख माहिर तैराक था. 

सवाल ये भी था कि अगर उसे खुदकुशी करनी ही होती तो वो पानी में छलांग क्यों लगाता. ऊपर से मनसुख की लाश के साथ उसके मुंह में ठुंसे 5 रुमाल और स्कॉर्फ ने भी ये बता दिया कि मनसुख ने खुदकुशी नहीं की. रही सही कसर मनसुख के डॉयटेम टेस्ट से पूरी हो गई जिसमें मनसुख की बोनमैरो में उसी पानी के डॉयटम मिले मुंब्रा क्रीक के जिस पानी में उसे फेंका गया था. और ऐसा तभी हो सकता था जब मनसुख को जीते जी पानी में फेंका गया हो. इस तरह से मनसुख की मौत का राज़ बेपर्दा हो गया और सचिन वाज़े भी.

 

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