दिल्ली दंगा 2020 : अकेले अंकित के हाथ को इंसाफ नहीं मिला, बल्कि...

दिल्ली दंगे 2020 में खजूरी खास नाले से मिली एक लाश की ये तस्वीर आज भी लोगों को झकझोर देती है. 23 से 26 फरवरी 2020 तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा के दौरान मरने वाले महज 53 लोग नहीं थे, बल्कि ये पूरे सिस्टम की मौत थी.

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इन दंगों ने 53 लोगों की जान ले ली थी (फोटो-PTI) इन दंगों ने 53 लोगों की जान ले ली थी (फोटो-PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 7:52 PM IST

यह तस्वीर 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़ी सबसे चर्चित तस्वीरों में से एक मानी जाती है. तमाम मौजूद दस्तावेजों और रिसर्च से जुड़े लेखों में इस तस्वीर का उल्लेख आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की लाश को चांदबाग स्थित खजूरी खास नाले से बाहर निकालते समय की तस्वीर के रूप में किया गया है.

दरअसल, CAA-NRC प्रोटेस्ट के तुरंत बाद 24-26 फरवरी 2020 के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. इसके बाद 26 फरवरी 2020 को अंकित शर्मा की लाश चांदबाग, खजूरी खास क्षेत्र के नाले से बरामद की गई थी. 

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दिल्ली दंगे का शिकार हुए IB ऑफिसर अंकित शर्मा के हत्यारों को सुना दी गई है. इस मामले में ताहिर हुसैन सहित 5 आरोपियों को उम्रकैद दी गई है. अंकित की लाश खजूरी खास के नाले से जब बरामद हुई थी, नाले से उभरे उनके हाथ ने देखने वालों का दिल दहला दिया था. छह साल बाद इस केस में फैसला सुनाया गया है. लेकिन, दिल्ली दंगा सिर्फ अंकित शर्मा की कहानी नहीं है. शुक्रवार को आए फैसले ने अंकित जैसे 52 अन्य लोगों के लिए उम्मीद जताई है, जो दंगे के दौरान या तो जिंदा जला दिए गए या घेरकर मार दिए गए. अतीत के फ्रेम में कैद हो गए कई हाथ अपने लिए इंसाफ मांग रहे हैं.

23 फरवरी 2020, जब आग भड़क उठी

उस दिन दोपहर तक उत्तर-पूर्वी दिल्ली की तंग गलियां बिल्कुल रोज की तरह गुलजार थीं. लोग अपने रोजमर्रा के काम में लगे थे. दुकानों पर ग्राहक थे, बच्चे खेल रहे थे और महिलाएं घरों में थीं. लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ घंटों में यही गलियां धुएं, गोलियों, चीखों और जलते मकानों की गवाह बनने वाली हैं. शाम होते-होते जाफराबाद, मौजपुर और आसपास के इलाकों में अचानक पत्थर चलने लगे. देखते ही देखते यह टकराव चार दिन तक चलने वाली ऐसी सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया, जिसे आजादी के बाद दिल्ली के सबसे भीषण दंगों में गिना गया.

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इन चार दिनों में राजधानी का एक हिस्सा पूरी तरह युद्धभूमि में बदल गया. मकान जलाए गए, दुकानें राख हो गईं, धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया और इंसानों की जानें चली गईं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई, जिनमें आईबी अधिकारी अंकित शर्मा और दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल भी शामिल थे. 200 से ज्यादा लोग गोली लगने से घायल हुए, जबकि सैकड़ों अन्य लोग पत्थर, आगजनी और हमलों में जख्मी हुए थे.

मौत का सामान पहले सजा लिया गया था

बाद में सामने आई कई रिपोर्टों और जांचों में यह सवाल बार-बार उठा कि क्या यह हिंसा अचानक हुई थी या इसके संकेत पहले से मौजूद थे. जाफराबाद इलाके की लगभग एक किलोमीटर लंबी दीवारों पर CAA और NRC विरोधी कई ग्रैफिटी पहले से लिखी जा चुकी थीं. इलाके में कई दिनों से तनाव बढ़ रहा था. रिपोर्टस् में दावा किया गया कि पत्थरों के बड़े भंडार, पेट्रोल बम (मोलोटोव कॉकटेल) और अवैध हथियार पहले से इकट्ठा किए जा चुके थे. इसके बावजूद प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां समय रहते हालात की गंभीरता को नहीं भांप सकीं.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली ही क्यों बनी हिंसा का केंद्र?

उत्तर-पूर्वी दिल्ली देश के सबसे घनी आबादी वाले जिलों में शामिल है. यहां प्रति वर्ग किलोमीटर 36 हजार से अधिक लोग रहते हैं. संकरी गलियां, बेहद घनी आबादी, बेरोजगारी, सीमित संसाधन और उत्तर प्रदेश से लगी खुली सीमा इस इलाके को पहले से संवेदनशील बनाती रही है. यह इलाका पहले भी 1984 के सिख विरोधी दंगों और 1992 के बाद सांप्रदायिक हिंसा देख चुका था. मुस्लिम आबादी भी दिल्ली के औसत से काफी अधिक है. ऐसे सामाजिक और भौगोलिक हालात में सांप्रदायिक तनाव तेजी से फैल सकता था.

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CAA आंदोलन से कैसे बढ़ा तनाव?

9 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पारित हुआ. इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. 14 दिसंबर से शाहीन बाग में महिलाओं का धरना शुरू हुआ. 17 दिसंबर को सीलमपुर में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, कई वाहन क्षतिग्रस्त हुए और पुलिसकर्मी घायल हुए. धीरे-धीरे उत्तर-पूर्वी दिल्ली CAA विरोध का प्रमुख केंद्र बन गई. इसी दौरान सोशल मीडिया पर लगातार वीडियो, संदेश और सांप्रदायिक दावे वायरल होने लगे, जिससे दोनों समुदायों के बीच अविश्वास और गहराता गया.

जब हाथ से निकलने लगे हालात

22 फरवरी 2020 की रात करीब 200 महिलाएं जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे धरने पर बैठ गईं. अगले दिन उनकी संख्या करीब एक हजार तक पहुंच गई. उसी दिन भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भारत बंद का आह्वान किया था. 23 फरवरी को इलाके में CAA समर्थक और विरोधी समूह आमने-सामने आ गए. इसी दिन बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने जाफराबाद में भाषण देते हुए पुलिस को सड़क खाली कराने का अल्टीमेटम दिया. उनके भाषण के कुछ समय बाद दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाजी शुरू हो गई. पुलिस के आकलन के अनुसार शाम लगभग 4:42 बजे पहली बड़ी झड़प हुई और उसके बाद हिंसा तेजी से फैल गई.

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चार दिनों तक जलती रही राजधानी

23 फरवरी की शाम से शुरू हुई हिंसा 26 फरवरी तक कई इलाकों में फैल गई. जाफराबाद, मौजपुर, चांदबाग, करावल नगर, घोंडा, बाबरपुर, गांधी नगर, शिव विहार और कई अन्य इलाके इसकी चपेट में आ गए. घरों में आग लगाई गई. दुकानें जलाई गईं. धार्मिक स्थलों पर हमले हुए. कई लोगों को गलियों में घेरकर पीटा गया. कुछ लोगों की लाशें नालों से बरामद हुईं. कई जगह गोलीबारी हुई. पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी, धारा 144 लगाई, लेकिन शुरुआती घंटों में हिंसा को रोकने में सफलता नहीं मिली.

अंकित शर्मा की मौत

इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के युवा अधिकारी अंकित शर्मा 25 फरवरी को लापता हो गए. बाद में उनका शव एक नाले से बरामद हुआ. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर कई दर्जन चाकू के घाव पाए गए. दंगे में अशफाक हत्याकांड के साथ यह मामला भी सबसे चर्चित मामलों में शामिल हो गया. इस मामले में पूर्व AAP पार्षद ताहिर हुसैन सहित कई लोगों पर हत्या और आपराधिक साजिश के आरोप लगे. वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया और बाद में ताहिर समेत पांच लोगों को उम्रकैद सजा भी सुनाई दी गई.

पुलिस पर क्यों उठे गंभीर सवाल?

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दंगों के बाद सबसे अधिक सवाल दिल्ली पुलिस की भूमिका पर उठे. आरोप लगे कि पुलिस शुरुआती घंटों में निर्णायक कार्रवाई नहीं कर सकी. कई प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि समय रहते भीड़ को अलग नहीं किया गया और न ही पर्याप्त बल प्रयोग किया गया. हालांकि तत्कालीन पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक ने कहा कि पुलिस ने हिंसा को केवल 12 थाना क्षेत्रों तक सीमित रखा, अन्यथा पूरा शहर इसकी चपेट में आ सकता था. कई पूर्व पुलिस अधिकारियों ने भी माना कि खुफिया तंत्र और नेतृत्व दोनों स्तरों पर गंभीर चूक हुई.

भड़काऊ भाषणों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

दिल्ली हाईकोर्ट में बीजेपी नेताओं अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और कपिल मिश्रा के कथित भड़काऊ भाषणों पर FIR दर्ज करने की मांग उठी. अदालत ने पुलिस से पूछा कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई. पुलिस ने अदालत में कहा कि हालात संवेदनशील हैं और उचित समय पर कार्रवाई होगी. दूसरी ओर, रिपोर्टों में यह भी उल्लेख किया गया कि CAA विरोधी पक्ष से शरजील इमाम और AIMIM नेता वारिस पठान जैसे नेताओं के कथित विवादित बयानों ने भी माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बनाया. कई विश्लेषणों में कहा गया कि दोनों पक्षों की उग्र बयानबाजी ने सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया.

शुरुआती प्रतिक्रिया धीमी

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हिंसा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे. रिपोर्टों में कहा गया कि उस समय केंद्र सरकार का बड़ा फोकस ट्रंप की यात्रा पर था, जिससे शुरुआती प्रतिक्रिया धीमी रही. गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका पर विपक्ष ने सवाल उठाए, जबकि बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि हिंसा सुनियोजित थी और इसके पीछे कट्टरपंथी तत्वों की भूमिका थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी शांति की अपील की और केंद्र से सेना बुलाने तथा कर्फ्यू लगाने की मांग की, लेकिन उनकी सरकार पर भी प्रभावित इलाकों में देर से पहुंचने के आरोप लगे.

दंगे खत्म हुए... लेकिन दर्द नहीं

जब हिंसा थमी तो उत्तर-पूर्वी दिल्ली का बड़ा हिस्सा राख में बदल चुका था. जली हुई कारें, टूटे मकान, खाली दुकानें और हर चेहरे पर डर दिखाई देता था. हजारों लोगों का रोजगार खत्म हो गया. बच्चों की किताबें, शादी के गहने, वर्षों की जमा पूंजी और पूरे परिवारों की यादें राख बन चुकी थीं. राहत सामग्री पहुंची, मुआवजे की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन मानसिक आघात का इलाज किसी के पास नहीं था. कई परिवार आज भी उस दौर को याद कर सिहर उठते हैं.

सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है...

दिल्ली दंगे 2020 केवल दो समुदायों के बीच हुई हिंसा नहीं थे. इस त्रासदी ने कई कठिन सवाल छोड़ दिए- क्या खुफिया एजेंसियां पहले से मिले संकेतों को समझने में नाकाम रहीं? क्या पुलिस समय रहते हालात संभाल सकती थी? क्या राजनीतिक बयानबाजी ने माहौल को और भड़काया? क्या प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व ने पर्याप्त तत्परता दिखाई?

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इन सवालों पर अलग-अलग जांच एजेंसियों, अदालतों, राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों की राय अलग-अलग रही है. कुछ ने इसे सुनियोजित साजिश बताया, तो कुछ ने प्रशासनिक विफलता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक तनाव के संयुक्त परिणाम के रूप में देखा. हालांकि एक बात निर्विवाद है कि इन दंगों की सबसे बड़ी कीमत आम लोगों ने चुकाई.

दिल्ली की उन गलियों में अब जिंदगी सामान्य दिखती है, लेकिन जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, जिन बच्चों ने अपने घर जलते देखे और जिन लोगों ने पड़ोसियों पर से भरोसा खो दिया, उनके लिए फरवरी 2020 केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक ऐसा ज़ख्म है जो शायद कभी पूरी तरह नहीं भर पाएगा.

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