चौतरफा घिरा ईरान... चरम पर महंगाई, मुद्रा धराशायी, होमुर्ज पर पकड़ भी हुई कमजोर!

ईरान और अमेरिका के बीच करीब सात महीने से जारी टकराव अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. ईरान की अर्थव्यवस्था पर महंगाई, कमजोर मुद्रा और अमेरिकी पाबंदियों का दबाव बढ़ रहा है. दूसरी तरफ होर्मुज से तेल की आवाजाही धीरे-धीरे संभल रही है, जिससे ईरान के दबाव की ताकत पर सवाल उठ रहे हैं.

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ईरान की अर्थव्यवस्था पर महंगाई, कमजोर मुद्रा और अमेरिकी पाबंदियों का दबाव बढ़ रहा है. (Photo: ITG) ईरान की अर्थव्यवस्था पर महंगाई, कमजोर मुद्रा और अमेरिकी पाबंदियों का दबाव बढ़ रहा है. (Photo: ITG)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 03 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 3:01 PM IST

ईरान के लिए यह वक्त आसान नहीं है. करीब 90% तक पहुंच चुकी महंगाई, कमजोर होती मुद्रा, अमेरिकी नाकेबंदी से प्रभावित तेल निर्यात और बढ़ता सैन्य दबाव- तेहरान को एक साथ कई मोर्चों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. दूसरी तरफ अमेरिका भी पीछे हटने के बजाय अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है. वह अपने एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप 'यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट' (USS Theodore Roosevelt) और अतिरिक्त सैनिकों को मध्य पूर्व भेज रहा है. इस तैनाती के बाद इलाके में तीन अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप हो सकते हैं.

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सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ईरान अब तक अपने सबसे बड़े दबाव के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता रहा है, वहां भी हालात पहले जैसे नहीं दिख रहे. तेल और गैस की आवाजाही धीरे-धीरे संभल रही है. ऐसे में तेहरान के सामने सवाल सिर्फ युद्ध जारी रखने का नहीं, बल्कि यह भी है कि आर्थिक दबाव के बीच वह कितने लंबे समय तक मौजूदा रणनीति पर कायम रह सकता है.

ईरान के सामने दो रास्ते

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को करीब सात महीने हो चुके हैं, लेकिन कूटनीतिक गतिरोध बना हुआ है. ईरान की तरफ से सात दिन के युद्धविराम और बातचीत की दिशा में कुछ संकेत सामने आए हैं. विदेश मंत्री अब्बास अरागची की ओर से परमाणु निरीक्षकों की पहुंच बहाल करने की बात किए जाने की रिपोर्ट भी आई है. कुवैत यूनिवर्सिटी के बादेर अल-सैफ के मुताबिक, बढ़ता दबाव ईरान को दो तरह की प्रतिक्रिया की तरफ धकेल सकता है- या तो वह कुछ रियायत देकर बातचीत का रास्ता खोले या फिर पहले से ज्यादा कड़ा जवाब दे. यानी अमेरिका का बढ़ता दबाव बातचीत की जमीन तैयार कर सकता है, लेकिन यही दबाव टकराव को और बढ़ाने का कारण भी बन सकता है.

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होर्मुज पर ईरान की कितनी पकड़?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम हिस्सा है. दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है और ईरान लंबे समय से यहां जहाजों की आवाजाही को प्रभावित करने की क्षमता को अपने रणनीतिक दबाव के तौर पर इस्तेमाल करता रहा है. अगर होर्मुज से तेल और गैस की आवाजाही बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में ईंधन और महंगाई का दबाव बढ़ता है. लेकिन अब इस दबाव के कमजोर पड़ने के संकेत मिल रहे हैं.

ब्लूमबर्ग के टैंकर-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार सितंबर में सऊदी अरब का कच्चे तेल का निर्यात करीब 3.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन से बढ़कर 6.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन पहुंच गया. वहीं, जेपी मॉर्गन के अनुमान के मुताबिक मध्य पूर्व से कच्चे तेल की शिपमेंट 17.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई है, जो युद्ध से पहले के स्तर का करीब 98% है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि होर्मुज पर ईरान का पूरा नियंत्रण खत्म हो गया है. अलग-अलग अधिकारियों और विश्लेषकों के आकलन में इस मुद्दे पर मतभेद हैं. लेकिन खाड़ी देशों का शिपमेंट बढ़ने से इतना जरूर दिखता है कि वैश्विक तेल बाजार ने युद्ध के बीच वैकल्पिक रास्तों और सुरक्षा व्यवस्था के साथ खुद को कुछ हद तक ढाल लिया है.

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ईरानी अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट

युद्ध का असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर तेजी से दिख रहा है. पिछले दो महीनों में ईरानी रियाल डॉलर के मुकाबले करीब 25% कमजोर हुआ है. इससे आयात होने वाली चीजें महंगी हो रही हैं और आम लोगों पर महंगाई का दबाव बढ़ रहा है. सितंबर में युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार ईरान ने टैंकरों पर नया कच्चा तेल लोड नहीं किया. ईरान अभी चीन की कुछ रिफाइनरों को फ्लोटिंग स्टोरेज में रखे तेल से सप्लाई दे रहा है, लेकिन यह व्यवस्था हमेशा नहीं चल सकती. अमेरिकी नाकेबंदी के बाद ईरान ने व्यापार को जमीन की सीमाओं और कैस्पियन सागर के रास्ते मोड़ने की कोशिश की है. लेकिन इन रास्तों की क्षमता इतनी नहीं है कि वे फारस की खाड़ी के रास्ते होने वाले कारोबार की पूरी भरपाई कर सकें.

अमेरिका ने पाबंदियां और बढ़ाईं

सिर्फ सैन्य दबाव ही नहीं, अमेरिका आर्थिक मोर्चे पर भी ईरान को घेर रहा है. 1 अक्टूबर को वॉशिंगटन ने ईरान की बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों और कई रेल कंपनियों पर नई पाबंदियां लगाईं. एविएशन सेक्टर पर पहले लगाए गए प्रतिबंधों का असर भी दिखाई दे रहा है. सितंबर के आखिर में ईरान की संयुक्त अरब अमीरात जाने वाली उड़ानें रोक दी गईं. इराक, तुर्किये और ओमान के लिए उड़ानों पर भी असर पड़ा है. यानी ईरान के लिए मुश्किल सिर्फ तेल बेचने तक सीमित नहीं है. कारोबार, परिवहन, विमानन और विदेशी मुद्रा- कई मोर्चों पर दबाव बढ़ रहा है.

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घरेलू मोर्चे पर भी बढ़ीं मुश्किलें

ईरान के लिए आर्थिक दबाव इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले ही देश में महंगाई और कमजोर होती मुद्रा को लेकर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए थे. अब सरकार एक तरफ अपने बजट पर पड़ रहे दबाव को कम करना चाहती है, तो दूसरी तरफ महंगाई और कीमतों को लेकर नए असंतोष से बचना भी चाहती है. सितंबर में कुछ पेट्रोल सब्सिडी कम की गई. इसी सप्ताह तेहरान के नगर प्रशासन ने 12 जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमत छह महीने के लिए तय कर दी. यानी युद्ध का असर सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार या तेल कारोबार पर नहीं, बल्कि ईरान के भीतर रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ रहा है.

अमेरिका की सैन्य तैयारी क्यों अहम?

इसी बीच अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है. यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट और यूएसएस मेकिन आइलैंड (USS Makin Island) से जुड़ा समुद्री समूह मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक इस तैनाती में करीब 9,000 से 10,000 अतिरिक्त अमेरिकी सैनिक शामिल हो सकते हैं. रूजवेल्ट के पहुंचने के बाद क्षेत्र में तीन अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप मौजूद हो सकते हैं. हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि रूजवेल्ट के पहुंचने के बाद मौजूदा कैरियर समूहों में से कोई वहां से हटेगा या नहीं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा है कि 3 नवंबर के बाद ईरान पर ज्यादा बड़े हमले की संभावना हो सकती है. दूसरी तरफ ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने अमेरिका या इजरायल की किसी भी आक्रामक कार्रवाई का कड़ा जवाब देने की चेतावनी दी है.

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3 नवंबर क्यों बन गया है अहम पड़ाव?

अमेरिका में 3 नवंबर को मिडटर्म चुनाव होने हैं. ऐसे में यह तारीख अमेरिका-ईरान टकराव के लिए भी अहम हो गई है. ईरानी अधिकारियों को चुनाव से पहले किसी बड़े शांति समझौते की संभावना कम दिखाई दे रही है और उनका आकलन है कि इसके बाद टकराव बढ़ सकता है. दूसरी तरफ अमेरिका के लिए लंबे समय तक युद्ध और करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास तेल की कीमत घरेलू दबाव बढ़ा सकती है. ऊंची ईंधन कीमतों का सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ता है. यानी वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के लिए समय महत्वपूर्ण है, लेकिन दोनों की मुश्किलें अलग हैं.

अमेरिका-ईरान संघर्ष में अब आगे क्या

फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है कि अगला कदम बातचीत की तरफ जाएगा या फिर सैन्य टकराव की तरफ. ईरान आर्थिक दबाव के बावजूद जवाब देने की अपनी क्षमता बनाए रखने का दावा कर रहा है, जबकि अमेरिका सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ा रहा है. विश्लेषकों के मुताबिक दोनों पक्ष किसी समझौते की संभावना से पूरी तरह बाहर नहीं हैं, लेकिन उनके बीच दूरी कम होने के बजाय बढ़ती दिख रही है. ऐसे में आने वाले हफ्तों में तीन चीजों पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी- होर्मुज से तेल की आवाजाही, 3 नवंबर के अमेरिकी चुनाव और अमेरिका-ईरान के अगले सैन्य या कूटनीतिक कदम. इन तीनों मोर्चों की दिशा यह तय करने में अहम होगी कि सात महीने से चला आ रहा यह टकराव बातचीत की मेज पर लौटता है या फिर एक बार फिर सैन्य कार्रवाई की तरफ बढ़ता है.

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