टाटा संस में लंबे समय तक चेयरमैन पद पर रहे नटराजन चंद्रशेखरन (N. Chandrashekharan) ने बुधवार को अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि वह 20 फरवरी 2027 को खत्म हो रहे अपने कार्यकाल के बाद एक्सटेंशन की मांग नहीं करेंगे. चंद्रशेखरन के इस इस्तीफे ने उस विवाद को उजागर कर दिया है, जो पिछले छह महीने से अंदर ही अंदर चल रहा था.
ठीक एक दशक पहले भी कुछ ऐसा ही विवाद पैदा हुआ था, जब साल 2016 में Cyrus Mistry की अचानक से टाटा ग्रुप से विदाई कर दी गई थी. अब एन चंद्रशेखर के इस इस्तीफे ने दोबारा से टाटा ग्रुप के बोर्डरूम विवाद की कहानी का एक नया चैप्टर खोल दिया है. फर्क सिर्फ इतना है कि चंद्रशेखरन को बोर्ड से हटाया नहीं गया है, बल्कि उन्होंने खुद पद छोड़ने का फैसला किया है.
कहानी शुरू होती है 2012 से, जब रतन टाटा के उत्तराधिकारी बने साइरस मिस्त्री
रतन टाटा ने दिसंबर 2012 में टाटा संस के चेयरमैन पद से हटने के बाद अपनी जगह साइरस मिस्त्री को चुना था. मिस्त्री टाटा ग्रुप के बाहर से आए थे और पालोनजी मिस्त्री फैमिली से उनका एक गहरा नाता था. यह परिवार टाटा संस का एक स्टेक होल्डर था.
जब साइरस मिस्त्री को चुना गया तो शुरू में इसे एक व्यवस्थित उत्तराधिकारी प्लान समझा गया, लेकिन फिर कुछ ही सालों में मिस्त्री और टाटा ग्रुप के पुराने लीडरशिप के बीच रणनीतिक मतभेद बढ़ने लगे. टाटा ग्रुप के कई बड़े फैसलों, पूंजी बंटवारा और कुछ कंपनियों की परफॉर्मेंश को लेकर दोनों पक्षों की सोच अलग रहने लगी. धीरे-धीरे ये विवाद इतना बढ़ गया कि टाटा ग्रुप के लीडरशिप बदलाव को लेकर चौंकाने वाला फैसला हुआ.
24 अक्टूबर साल 2016
टाटा संस के बोर्ड ने साइरस मिस्त्री को चेयरमैन पद से हटा दिया और रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन बनाया गया. साथ ही नए स्थायी चेयरमैन की भी खोज शुरू हो गई. देश के सबसे बड़े ग्रुप में हुए अचानक से इस फैसले ने कॉर्पोरेट जगत को हिला कर रख दिया, क्योंकि बेहद नाटकीय अंदाज में साइरस मिस्त्री को पद से हटाया गया था.
बोर्ड मीटिंग से पहले रतन टाटा और एक सदस्य नितिन नोहरिया ने साइरस मिस्त्री से मुलाकात भी की थी और अनुरोध किया था कि वे इस्तीफा दे दें, लेकिन साइरस मिस्त्री ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था. फिर बोर्ड बैठक में सीधे साइरस मिस्त्री को पद से हटाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसका मिस्त्री ने विरोध किया और कहा कि ये नियम खिलाफ है और ऐसा करने से पहले 15 दिन का नोटिस देना जरूरी है. हालांकि, इसके बाद भी साइरस मिस्त्री को 7-1 की बहुमत से पद से हटा दिया गया.
साइरस मिस्त्री को हटाने का सबसे बड़ी वजह रणनीतिक मतभेद और भरोसे की कमी थी. मिस्त्री चाहते थे कि घाटे में चल रही टाटा स्टील यूरोप और डोकोमो जैसी कंपनियों को बंद कर दिया जाए, जो टाटा ग्रुप के नीतियों के खिलाफ था. दूसरी ओर, टाटा ट्रस्ट को लगा कि मिस्त्री अहम फैसलों में उनकी राय को नजरअंदाज कर रहे हैं, उस समय टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष रतन टाटा थे.
टाटा ग्रुप और मिस्त्री के बीच कानूनी विवाद
मिस्त्री ने बाद में TATA Sons के खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू कर दी. NCLT में मामला गया, फिर NCLAT ने 2019 में Mistry के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें बहाल करने का आदेश दिया, लेकिन 26 मार्च 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने टाटा संस के पक्ष में फैसला सुनाया.
यह फैसला भले ही टाटा ग्रुप के हक में गया, लेकिन एक बड़ा सवाल छोड़ गया कि टाटा ग्रुप में असली कंट्रोल किसके पास है- TATA Sons के बोर्ड के पास या फिर TATA Trust के पास?
फिर हुई एन. चंद्रशेखरन की एंट्री
मिस्त्री के बाद जनवरी 2017 में रतन टाटा ने अपने सबसे भरोसेमंद प्रोफेशनल नटराजन चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) को टाटा संस के चेयरमैन पद के लिए चुना, क्योंकि टाटा ग्रुप को किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो टाटा ग्रुप के कल्चर को समझता हो और रतन टाटा के साथ विश्वास के काबिल हो.
इस हिसाब से उस समय एन. चंद्रशेखरन से बेहतर शायद ही कोई होता, क्योंकि चंद्रशेखरन कोई बाहरी श्ख्स नहीं थे. उन्होंने टाटा ग्रुप में Trainee के पद से शुरुआत की थी और धीरे-धीरे TCS के सीईओ बन गए थे और बाद में चेयरमैन बने. उन्होंने फरवरी 2017 में टाटा संस का पदभा संभाला था. टाटा ग्रुप के इस नियुक्ति ने एक नजीर पेश की थी कि कोई भी योग्य व्यक्ति छोटे पद से कंपनी का चेयरमैन तक का सफर पूरा कर सकता है.
उस समय रतन टाटा ने भी कहा था कि चंद्रा ने टीसीएस में अपने करियर के दौरान अच्छी लीडरशिप दिखाई है और उन्हें उम्मीद है कि वह टाटा ग्रुप में महत्वपूर्ण योगदान देंगे.
चंद्रशेखरन ने टाटा ग्रुप को बदल दिया
चेयरमैन का पद संभालते ही चंद्रशेखरन ने कई बड़े काम किए. इसमें सबसे बड़ा कदम AIR India की वापसी कराना था. इसके साथ ही टाटा ग्रुप का कारोबार सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, डिजिटल बिजनेस, बैट्री और नई मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में टाटा ग्रुप का बड़ा निवेश जैसे काम थे.
चंद्रशेखरन के लिए असली चुनौती कारोबार का विस्तार नहीं था, बल्कि टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच अधिकार और गर्वनेंस का संतुलना रख पाना. रतन टाटा की मौत के बाद ये चुनौती फिर सामने आ गई, जब नोएल टाटा को रतन टाटा की जगह पर टाटा ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया गया.
वह बैठक, जिसने चंद्रशेखरन के इस्तीफे की लिखी कहानी
चंद्रशेखरन का कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था. इस कारण फरवरी 2026 में उनके पांच साल का कार्यकाल और आगे बढ़ाने की बात पर चर्चा हुई.
PTI की रिपोर्ट के अनुसार, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने उनके अगले कार्यकाल के विस्तार की सिफारिश की थी, लेकिन टाटा संस के बोर्ड बैठक में उनके रिपॉइंटमेंट पर सहमति नहीं बन पाई. चंद्रशेखर के बयान के अनुसार, एक बोर्ड मेम्बर ने उनके एक्सटेंशन का सपोर्ट नहीं किया.
रॉयटर्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि नोएल टाटा की ओर से कई चीजों को लेकर स्पष्टता मांगी गई थी, जिसमें TATA Sons की संभावित लिस्टिंग भी शामिल थी.रिपोर्ट में कहा गया कि चंद्रशेखरन ये गारंटी नहीं दे पाए कि टाटा संस को कभी लिस्ट नहीं किया जाएगा. यही चंद्रशेखरन के इस्तीफे को लेकर एक बड़ी वजह बताई जा रही है.
इसके अलावा, एक और बड़ी वजह एअर इंडिया का फाइनेंशियल परफॉर्मेंश भी रहा है. साल 2022 में Air India का कंट्रोल लेने के बाद इसको दोबारा खड़ा करने के लिए बड़े निवेश और रिस्ट्रक्चरिंग की आवश्यकता थी. लेकिन एअर इंडिया के प्रदर्शन और टर्नराउंड को लेकर सवाल उठते गए. साथ ही टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच मतभेद भी बढ़ता चला गया.
चंद्रशेखरन ने खुद क्यों दिया इस्तीफा?
टाटा संस के चेयरमैन पद को छोड़ते हुए चंद्रशेखरन ने कहा कि टाटा ग्रुप के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स अपने फाइनल स्टेज पर हैं, जो कारोबार के फ्यूचर के लिए बहुत जरूरी हैं. ऐसे में टाटा ग्रुप के लीडरशिप को लेकर स्पष्टता जल्द होनी चाहिए. फरवरी 2027 के बाद टाटा ग्रुप को एक नया चेयरमैन मिलेगा.
अब आगे क्या?
चंद्रशेखर के इस्तीफे के बाद अब टाटा संस नए चेयरमैन की तलाश करेगा. चेयरमैन ऐसा होना चाहिए, जो टाटा ट्रस्ट और टाटा संस के बीच संतुलन बनाकर चले. वह नोएल टाटा के भरोसे पर खड़ा उतरे और टाटा ग्रुप के कारोबारों को संकट से उबार सके.
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा, माया टाटा जैसे नाम चल रहे हैं, लेकिन अभी अगले चेयरमैन को लेकर कुछ कहना जल्दबाजी होगी. टाटा संस के चेयरमैन पद के लिए प्रोफेशनल से लेकर परिवार के सदस्य या दूसरा कोई और... भी हो सकता है.
अब आगे टाटा ग्रुप भले ही नए चेयरमैन की तलाश कर लें और हो सकता है सबकुछ पहले की तरह ठीक भी हो जाए, लेकिन फिर भी टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के बीच के विवाद कुछ सवाल उजागर करते हैं...
टाटा ग्रुप में पावर कंट्रोल किसके पास है टाटा संस या टाटा ट्रस्ट?
अगर टाटा परिवार से अलग किसी व्यक्ति को टाटा संस का चेयरमैन बनाया जाता है, तो क्या अब आगे विवाद पैदा नहीं होंगे?
सबसे बड़ा सवाल - टाटा संस का अगला चेयरमैन कौन होगा, जो टाटा ग्रुप को इन मुश्किलों से निकालते हुए कारोबार को स्थिर कर सके?
हिमांशु द्विवेदी