दुनिया के कई देशों के सामने बढ़ते कर्ज और महंगाई को लेकर चुनौतियां हैं, अमेरिका भी उनमें शामिल है. भारत के सामने भविष्य में ऐसी कोई चुनौती ना आए, इसे ध्यान में रखकर सरकार ने कर्ज से निपटने के लिए टारगेट सेट किया है. केंद्र सरकार ने देश का कर्ज कम करने और राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficits) पर नियंत्रण रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि सरकार का लक्ष्य 2030 तक राष्ट्रीय कर्ज को देश की जीडीपी (GDP) के 50 फीसदी तक सीमित करना है.
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार कर्ज घटाने के लिए लगातार कदम उठा रही है और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी भारत के कर्ज प्रबंधन (Debt Management) के तरीके को स्वीकार किया है. सीतारमण ने तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह बात कही. उन्होंने महंगाई, बढ़ते कर्ज, प्रति व्यक्ति आय और विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े सवालों के जवाब भी दिए.
2030 तक कर्ज घटाने का लक्ष्य
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि राजकोषीय घाटा कम करने की सरकार की प्रतिबद्धता हर साल के बजट में दिखाई देती है. सरकार ने साफ किया है कि 2030 तक राष्ट्रीय कर्ज को जीडीपी के 50 फीसदी तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है. उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया के कई देशों को कर्ज से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
भारत ने भी इन परिस्थितियों के बीच केंद्र सरकार का कर्ज कम करने के लिए लगातार कदम उठाए हैं. वित्त मंत्री के मुताबिक, भारत कर्ज प्रबंधन के मामले में अनुशासित तरीके से आगे बढ़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस दिशा में भारत के प्रयासों को स्वीकार किया है. सरकार आगे भी कर्ज और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए काम करती रहेगी.
क्या होता है राजकोषीय घाटा?
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) उस अंतर को कहते हैं, जब सरकार का कुल खर्च उसकी उधार को छोड़कर होने वाली कुल कमाई से ज्यादा हो जाता है. इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ता है. वहीं, जीडीपी (Gross Domestic Product) यानी सकल घरेलू उत्पाद किसी देश में एक तय अवधि के दौरान तैयार होने वाली वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य को दर्शाता है. कर्ज को जीडीपी के अनुपात में देखने से यह समझने में मदद मिलती है कि देश की अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले सरकार पर कर्ज का कितना बोझ है.
महंगाई के मोर्चे पर क्या कर रही सरकार?
महंगाई के सवाल पर केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार 2014 से कीमतों को स्थिर रखने के लिए लगातार काम कर रही है. इसके लिए मंत्रियों का एक विशेष समूह बनाया गया था, जो आपूर्ति व्यवस्था यानी सप्लाई चेन को बेहतर बनाए रखने पर काम करता है. निर्मला सीतारमण ने चावल के निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों जैसे कदमों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि ऐसे फैसलों का मकसद घरेलू बाजार में कीमतों को बढ़ने से रोकना और उपभोक्ताओं को राहत देना था. साथ ही, सरकार ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिलता रहे. वित्त मंत्री के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर महंगाई और आर्थिक दबाव के बावजूद सरकार की कोशिश रही है कि इसका बोझ आम लोगों पर ज्यादा न पड़े.
विपक्ष के प्रदर्शनों पर क्या बोलीं सीतारमण?
विपक्षी दलों की ओर से एसआईआर (SIR) से जुड़ी कथित गड़बड़ियों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर किए जा रहे प्रदर्शनों पर भी वित्त मंत्री से सवाल पूछा गया. इस पर उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध जताने के कई तरीके हैं. इनमें न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना और अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन करना, दोनों शामिल हैं. सीतारमण ने कहा कि अलग-अलग समूह इन दोनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने अदालत जाने और विरोध प्रदर्शन करने को लोकतांत्रिक असहमति जताने के तरीका बताया.
प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने की हो रही कोशिश
केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए भी कई कदम उठा रही है. उन्होंने माना कि कोविड-19 महामारी, युद्ध, आर्थिक सुधारों से जुड़ी चुनौतियों और ईंधन व कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला है. उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों के बावजूद सरकार ने कोशिश की है कि इनका असर आम लोगों पर ज्यादा न पड़े. प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के प्रयास आगे भी जारी रहेंगे.
आजतक बिजनेस डेस्क