क्या था 'फ्रैजाइल फाइव' जिसका PM मोदी ने लाल किले से किया जिक्र! कौन-कौन देश थे शामिल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से भारत की आर्थिक यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि देश ने पिछले 12 वर्षों में 'फ्रैजाइल फाइव' से दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था तक का सफर तय किया है. 2013 में भारत को बाहरी वित्तीय झटकों के प्रति संवेदनशील माना जाता था. ऊंची महंगाई, चालू खाते का घाटा और कमजोर रुपया बड़ी चुनौतियां थीं. अब भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत की है और तेजी से आगे बढ़ रहा है.

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पीएम मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने संबोधन में पिछले 12 वर्षों भारत की आर्थिक प्रगति का जिक्र किया. पीएम मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने संबोधन में पिछले 12 वर्षों भारत की आर्थिक प्रगति का जिक्र किया.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 9:37 AM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से अपने कार्यकाल के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था में आए अहम बदलावों की बात की. उन्होंने कहा कि करीब 12 साल पहले भारत को दुनिया की 'फ्रैजाइल फाइव' इकोनॉ​मी में गिना जाता था, लेकिन आज देश दुनिया की बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है.

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मोदी ने अपने संबोधन में कह, 'एक समय दुनिया ने भारत की अर्थव्यवस्था को 'फ्रैजाइल फाइव' में रखा था, लेकिन पिछले 12 वर्षों में देश ने बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में अपनी जगह बनाई है. भारत पिछले साल जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना. अब उससे आगे अमेरिका, चीन और जर्मनी हैं.'

'फ्रैजाइल फाइव' क्या था?

'फ्रैजाइल फाइव' शब्द का इस्तेमाल पहली बार 2013 में ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक मॉर्गन स्टैनली (Morgan Stanley) ने किया था. इस ग्रुप में भारत के अलावा ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका और तुर्किये शामिल थे. इन पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी वित्तीय झटकों के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा संवेदनशील माना गया था.

उस समय भारत कई आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था. महंगाई दोहरे अंकों में पहुंच गई थी, करेंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा या सीएडी) बढ़ रहा था, रुपया कमजोर हो रहा था और देश की अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी पर काफी निर्भर थी. इसी दौरान अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से बड़े पैमाने पर बॉन्ड खरीद कार्यक्रम को धीरे-धीरे कम करने के संकेत मिले. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका के चलते विदेशी निवेशकों ने उभरते बाजारों से पैसा निकालना शुरू कर दिया.

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क्यों कमजोर हुई भारतीय अर्थव्यवस्था?

भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक 2013 के दौर में पूंजी के प्रवाह में बदलाव के प्रति काफी संवेदनशील थी. कुछ ही महीनों में रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले करीब 12 फीसदी गिर गई. वहीं, 2012 में भारत का करेंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी के करीब 5.1 फीसदी तक पहुंच गया था. इसका मतलब था कि देश का आयात खर्च उसके निर्यात से होने वाली कमाई से काफी ज्यादा था. सोने के बढ़ते आयात ने भी भारत के बाहरी खाते पर दबाव बढ़ाया. विदेशी मुद्रा भंडार और पूंजी प्रवाह को लेकर चिंताओं ने निवेशकों के बीच भारत की आर्थिक स्थिरता पर सवाल खड़े किए थे.

भारत कैसे 'फ्रैजाइल फाइव' से निकला?

हालांकि भारत जल्द ही 'फ्रैजाइल फाइव' की सूची से बाहर निकल गया. 2014 तक बाहरी खाते की स्थिति में सुधार हुआ और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुआ. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भी उस दौर में भारत के मैक्रोइकोनॉमिक हालात में तेज सुधार का उल्लेख किया था. इस बदलाव के पीछे कई आर्थिक कदमों को अहम माना गया. चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए सोने के आयात पर अंकुश लगाया गया और निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया गया. तत्कालीन आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल को भी कई विशेषज्ञ इस आर्थिक स्थिरीकरण से जोड़ते हैं.

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दनिया की चौथी सबसे बड़ी इकोनॉमी तक

'फ्रैजाइल फाइव' का टैग उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत बाहरी आर्थिक झटकों के प्रति कमजोर माना जाता था. 2014 में इस ग्रुप से बाहर निकलना देश के बाहरी आर्थिक मोर्चे पर सुधार का संकेत था. इसके बाद भारत ने तेज आर्थिक वृद्धि के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत की. प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से इसी बदलाव को पिछले 12 वर्षों की आर्थिक यात्रा के तौर पर पेश किया. 2013 का 'फ्रैजाइल फाइव' टैग, 2014 का मैक्रोइकोनॉमिक टर्नअराउंड और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने तक का सफर भारत की बदलती आर्थिक तस्वीर को समझने के अहम पड़ाव हैं.

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