भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी दिख रही है. अगस्त में फॉरेन पोर्टफोलियो इंवेस्टर्स (FPI) ने भारतीय इक्विटी में करीब $3.1 बिलियन की खरीदारी की. यह करीब दो साल में किसी एक महीने में सबसे बड़ा विदेशी निवेश है. इसके साथ लगातार दूसरे महीने विदेशी निवेशकों की नेट खरीदारी हुई है. हालांकि, इसे भारत पर विदेशी निवेशकों के पूरी तरह बुलिश होने का संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी.
कई महीनों तक भारतीय शेयरों से दूरी बनाए रखने के बाद विदेशी निवेशकों का रुख अब कुछ बदला है. इसके पीछे भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत ग्रोथ और कंपनियों की बेहतर कमाई अहम वजह मानी जा रही है. अप्रैल-जून तिमाही में भारत की GDP 7.8% बढ़ी. इसी दौरान Nifty 50 कंपनियों का मुनाफा करीब 18% बढ़ा, जो पिछले 10 तिमाहियों में सबसे तेज ग्रोथ रही. इससे भारतीय शेयर बाजार के ऊंचे वैल्यूएशन को लेकर विदेशी निवेशकों की चिंता कुछ कम हुई है.
तीन वजहों से बदला विदेशी निवेशकों का रुख
डिफाइंडएज सिक्योरिटीज के को-फाउंडर और CEO प्रशांत शाह के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की वापसी के पीछे तीन बड़े कारण हैं- कॉरपोरेट कमाई में सुधार, मजबूत घरेलू ग्रोथ और लिक्विडिटी व करेंसी का बेहतर माहौल. उनके मुताबिक, कुछ समय तक विदेशी निवेशकों का पैसा जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे उत्तर एशियाई बाजारों में गया, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर कंपनियों की तेजी ने बेहतर रिटर्न दिया. अब भारत में कुछ पैसा वापस आने की गुंजाइश बनी है.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय बाजार अचानक सस्ता हो गया है. भारत अब भी कई उभरते बाजारों के मुकाबले प्रीमियम वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रहा है. लेकिन विदेशी निवेशकों के लिए सवाल यह नहीं है कि भारत सस्ता है या महंगा. सवाल यह है कि दूसरे बाजारों के मुकाबले यहां रिस्क और रिटर्न का समीकरण कितना बेहतर है.
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निवेशकों के लिए ग्लोबल फैक्टर अब भी अहम
विदेशी निवेशकों के फैसले पर सिर्फ भारत की ग्रोथ और कंपनियों की कमाई का असर नहीं पड़ता. अमेरिकी ब्याज दरें, US बॉन्ड यील्ड, डॉलर और कच्चे तेल की कीमतें भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. 1 सितंबर को 'यूएस 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड' (US 10-Year Treasury Yield) करीब 4.78% थी, जबकि मिडिल ईस्ट तनाव के बीच कच्चा तेल $91 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया था. आम तौर पर ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और महंगा तेल उभरते बाजारों के लिए दबाव बढ़ाते हैं.
इसके बावजूद भारत को मजबूत GDP ग्रोथ, बेहतर कॉरपोरेट मुनाफे और रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार से कुछ सहारा मिला है. प्रशांत शाह के मुताबिक, भारत में आई नई विदेशी खरीदारी को सिर्फ अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. निवेशक घरेलू ग्रोथ और कंपनियों की कमाई में सुधार को भी महत्व दे रहे हैं.
बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयर बने पहली पसंद
विदेशी पैसा पूरे भारतीय शेयर बाजार में समान रूप से नहीं गया है. फाइनेंशियल शेयर विदेशी निवेशकों की प्रमुख पसंद बनकर उभरे हैं. जून के दूसरे हिस्से में विदेशी निवेशकों ने बैंकिंग शेयरों में करीब ₹14,634 करोड़ लगाए. यह 14 महीनों में इस सेक्टर में किसी पखवाड़े की सबसे मजबूत विदेशी खरीदारी थी.
डिफाइंडएज सिक्योरिटीज के चीफ रिसर्च एंड प्रोडक्ट ऑफिसर राजू रंजन के मुताबिक, फाइनेंशियल सेक्टर में कमाई की उम्मीदें ज्यादा स्थिर हैं. क्रेडिट ग्रोथ बनी हुई है और वैल्यूएशन भी पहले के मुकाबले ज्यादा वाजिब नजर आ रहे हैं. उनके मुताबिक, विदेशी निवेशक पूरे बाजार में पैसा लगाने के बजाय ऐसे कारोबार चुन रहे हैं जहां घरेलू मांग मजबूत है और आने वाले समय में कमाई का अनुमान अपेक्षाकृत साफ है. ऑटो, हेल्थकेयर, कंज्यूमर कंपनियों और IT सेक्टर के कुछ हिस्सों को भी इसका फायदा मिल सकता है.
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क्या यह लंबे समय की वापसी है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. अगस्त लगातार दूसरा महीना रहा, जब विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में नेट खरीदारी की. लेकिन 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों की भारतीय इक्विटी से नेट निकासी करीब $24.6 बिलियन रही है. यानी अगस्त की खरीदारी को अभी शुरुआती वापसी के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा. इसे लंबे समय के फॉरेन इन्वेस्टमेंट साइकिल की शुरुआत मानने के लिए कमाई में लगातार सुधार, मैक्रोइकोनॉमिक स्टेबिलिटी और ऐसा ग्लोबल इंटरेस्ट रेट एनवायरमेंट जरूरी होगा जो बहुत ज्यादा सख्त न हो.
अब भी बने हुए हैं कुछ जोखिम
भारतीय बाजार के ऊंचे वैल्यूएशन, मजबूत डॉलर, ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और भू-राजनीतिक तनाव विदेशी निवेशकों के लिए अब भी बड़े जोखिम हैं. अगर कंपनियों की कमाई उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ती या मुनाफे के अनुमान में कटौती शुरू होती है, तो भारतीय बाजार का प्रीमियम वैल्यूएशन दबाव में आ सकता है. वहीं, रुपये में स्थिरता विदेशी निवेश को और सपोर्ट कर सकती है. इसके उलट रुपये में तेज कमजोरी भारतीय एसेट्स को विदेशी निवेशकों के लिए कम आकर्षक बना सकती है.
आजतक बिजनेस डेस्क