'भारत में 5 साल से बना रहे नेटवर्क...', अब स्टारलिंक ने रिलायंस को दिया जवाब

एलॉन मस्क की स्टारलिंक ने दावा किया है कि वह पांच साल से भारत में नेटवर्क तैयार करने और जरूरी मंजूरियां हासिल करने की दिशा में काम कर रही है. कंपनी के मुताबिक सैटेलाइट इंटरनेट के लिए उसने जरूरी मंजूरियों के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है.

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स्टारलिंक ने रिलायंस को जवाब देते हुए कहा कि कंपनी भारत में 5 साल से सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क पर काम कर रही है. (File Photo) स्टारलिंक ने रिलायंस को जवाब देते हुए कहा कि कंपनी भारत में 5 साल से सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क पर काम कर रही है. (File Photo)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 17 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:23 AM IST

अमेरिकी उद्योगपति एलॉन मस्क की कंपनी स्टारलिंक (Starlink) ने भारत के सैटेलाइट इंटरनेट मार्केट में बहुत जल्द अपनी सेवाएं शुरू करने का दावा किया है. स्टारलिंक ने रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) के सोशल मीडिया पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए अपनी तैयारियों का हिसाब-किताब दिया. कंपनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी पोस्ट में रिलायंस के उस बयान को भी टैग किया, जिसमें मुकेश अंबानी की कंपनी ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का स्वागत किया था, लेकिन साथ ही सभी कंपनियों के लिए भारतीय कानूनों का पालन करना जरूरी बताया था.

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मस्क की कंपनी ने दावा किया है कि वह पिछले 5 साल से भारत में रेगुलेटर्स, टेलीकम्युनिकेशन इंडस्ट्री और ऑपरेटर्स के साथ मिलकर काम कर रही है. स्टालिंक के मुताबिक, उसने भारत में ही स्पेशल नेटवर्क सिस्टम, गेटवे और अन्य जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार किया है, ताकि भारतीय ग्राहकों के इंटरनेट ट्रैफिक को सुरक्षित तरीके से संभाला जा सके. कंपनी ने कहा कि यह पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी सरकारी मंजूरियों के साथ तैयार किया गया है. उसने भारत में हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं शुरू करने की अपनी तैयारी भी दोहराई.

एलॉन मस्क ने उठाए थे सवाल

स्टारलिंक और रिलायंस के बीच यह बयानबाजी ऐसे समय में हो रही है, जब भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू करने को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. एलॉन मस्क ने हाल में सोशल मीडिया पर आरोप लगाया था कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूह स्टारलिंक की एंट्री में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं. मस्क ने आरोप लगाया कि कुछ कारोबारी समूह भारतीय ग्राहकों पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं. एक पोस्ट में उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में अंबानी को 'प्रधानमंत्री अंबानी' कहकर संबोधित किया और भारत में फैसलों पर उनके प्रभाव को लेकर सवाल उठाए थे. केंद्र सरकार ने मस्क के आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि भारत का रेगुलेटरी सिस्टम किसी कंपनी के साथ भेदभाव नहीं करता. सरकार के मुताबिक, सैटेलाइट ऑपरेटर्स को सुरक्षा, स्पेक्ट्रम और अन्य नियामकीय शर्तें पूरी करनी होंगी.

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रिलायंस ने मस्क को दिया जवाब

एलॉन मस्क के आरोपों और दावों का मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने शुक्रवार को जवाब दिया था. कंपनी ने एक्स (X) पर एक पोस्ट में कहा था कि उसे प्रतिस्पर्धा से कभी डर नहीं लगा और वह सैटेलाइट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में स्टारलिंक समेत सभी कंपनियों का स्वागत करती है. रिलायंस ने कहा कि बाजार में असली प्रतिस्पर्धा इस बात से यह तय होता है कि कौन-सी कंपनी ग्राहकों को बेहतर सेवाएं देती है. कंपनी ने अपने टेलीकॉम बिजनेस 'जियो' (Jio) का उदाहरण देते हुए कहा कि साल 2016 में जब जियो ने भारतीय बाजार में कदम रखा था, तब उसके पास एक भी ग्राहक नहीं था. आज कंपनी के 53 करोड़ से ज्यादा ग्राहक हैं.

रिलायंस के मुताबिक, जियो ने भारत में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और ग्राहकों को किफायती डेटा उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाई है. कंपनी ने कहा कि वह सैटेलाइट कम्युनिकेशन में भी प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है, लेकिन जियो समेत भारत में काम करने वाली हर कंपनी को देश के कानूनों और नीतियों का पालन करना होगा. रिलायंस ने यह भी कहा कि भारत ने घरेलू और विदेशी कंपनियों के निवेश और नई तकनीक का हमेशा स्वागत किया है. लेकिन यह खुलापन कानून के शासन पर आधारित है. कंपनी ने स्पष्ट किया कि जियो की अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं भी अभी जरूरी मंजूरियों का इंतजार कर रही हैं.

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लाइसेंस मिला तो सर्विस शुरू होने में देरी क्यों?

भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को लेकर सबसे अहम सवाल यह है कि लाइसेंस मिलने के बाद भी कंपनियां व्यावसायिक सेवाएं क्यों शुरू नहीं कर पा रही हैं. केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुताबिक, एलॉन मस्क की स्टारलिंक, रिलायंस की जियो सैटकॉम और भारती एयरटेल समर्थित यूटेलसैट वनवेब को सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लाइसेंस मिल चुके हैं. अमेजन की प्रोजेक्ट कुइपर ने भी इस क्षेत्र में रुचि दिखाई है, लेकिन उसे तय प्रक्रिया का पालन करना होगा. लाइसेंस मिलने का मतलब यह नहीं है कि कोई कंपनी तुरंत ग्राहकों को इंटरनेट सेवा देना शुरू कर सकती है.

इसके लिए स्पेक्ट्रम आवंटन, सुरक्षा संबंधी शर्तों और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा करना पड़ता है. सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए इस्तेमाल होने वाले स्पेक्ट्रम की कीमत और उसे इस्तेमाल करने के नियम भी अहम हैं. सरकार स्पेक्ट्रम के लिए राजस्व आधारित शुल्क व्यवस्था को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) और दूरसंचार विभाग (DoT) इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं. यही वजह है कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू करने की तैयारी कर रहीं कंपनियों के बीच नियामकीय मंजूरियों और स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर चर्चा तेज है.

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सुनील मित्तल ने भी इस मुद्दे पर दी प्रतिक्रिया

इस विवाद में भारती एंटरप्राइजेज के चेयरमैन सुनील मित्तल का बयान भी अहम है. हाल ही में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में मित्तल ने कहा था कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू करने की अनुमति हासिल करने की प्रक्रिया में उनकी कंपनी यूटेलसैट वनवेब की स्थिति स्टारलिंक से काफी आगे है. सुनील मित्तल के मुताबिक, उनकी कंपनी ने करीब पांच साल पहले आवेदन किया था.

उन्होंने यह भी कहा कि यूटेलसैट वनवेब का ग्राउंड नेटवर्क तीन साल से तैयार है और उसके सैटेलाइट पांच साल से भारत के ऊपर मौजूद हैं. इसके बावजूद कंपनी व्यावसायिक सेवाएं शुरू करने की अनुमति का इंतजार कर रही है. मित्तल ने कहा था कि अगर उनकी कंपनी को स्टारलिंक से पहले सेवाएं शुरू करने की अनुमति मिलती है, तो उन्हें बहुत खुशी होगी और वह इसका इंतजार कर रहे हैं. उनके इस बयान ने भारत में सैटेलाइट इंटरनेट मार्केट में मंजूरियों और प्रतिस्पर्धा को लेकर एलॉन मस्क के आरोपों और दावों की पोल खोल दी.

जियो डेवपल कर रहा 1600 सैटेलाइट

रिलायंस केवल अपने मौजूदा टेलीकॉम कारोबार तक सीमित नहीं रहना चाहती. कंपनी सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी कर रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, जियो करीब 1,600 लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट का नेटवर्क विकसित करने की योजना पर काम कर रही है. इसका लक्ष्य करीब छह लाख गांवों तक इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाना है. लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब चक्कर लगाते हैं. इनकी मदद से उन इलाकों में भी इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है, जहां मोबाइल टावर या फाइबर नेटवर्क बिछाना मुश्किल या महंगा होता है.

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