बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ एक निकाह इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. मामला के औराई थाना क्षेत्र के मुकसुदपुर गांव का है. चंडिहा गांव के रहने वाले मोहम्मद इम्तियाज पैर से दिव्यांग हैं, जबकि मुकसुदपुर की नाजमा परवीन बोल नहीं पाती हैं. दोनों ने अपनी शारीरिक चुनौतियों को जीवन की रुकावट नहीं माना और अपनी पसंद से एक-दूसरे को हमसफर चुना.
इम्तियाज जब करीब चार-पांच साल के थे, तभी वह दिव्यांग हो गए थे. उम्र बढ़ने के साथ उनके मन में भविष्य को लेकर कई सवाल उठने लगे. उन्हें चिंता थी कि आगे की जिंदगी कैसे गुजरेगी. हालांकि, उन्होंने हालात के सामने घुटने टेकने के बजाय खुद को मजबूत बनाया और अपने पैरों पर खड़े होने की ठानी.
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इसी कोशिश में वह राजस्थान के जयपुर पहुंचे, जहां उन्होंने मोबाइल रिपेयरिंग का प्रशिक्षण लिया. हुनर सीखने के बाद गांव लौटे और अपनी मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान शुरू कर दी. मेहनत और लगन से उनका कारोबार चल निकला और आज वह अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं.
संघर्ष को ताकत बनाकर बनाया अपना मुकाम
आत्मनिर्भर बनने के बाद इम्तियाज के लिए शादी का सवाल सामने आया. उनके पास कई रिश्ते आए, लेकिन वह ऐसा जीवनसाथी चाहते थे जो उनकी परिस्थितियों और संघर्ष को समझ सके. इसी दौरान उनकी मुलाकात नाजमा परवीन से हुई. दोनों के बीच समझ बनी और उन्होंने साथ जिंदगी बिताने का फैसला किया.
नाजमा मुकसुदपुर गांव की रहने वाली हैं और बोल नहीं पाती हैं. इसके बावजूद इम्तियाज ने उनकी इस शारीरिक चुनौती को उनके व्यक्तित्व की पहचान के तौर पर देखा, कमजोरी के रूप में नहीं. दोनों की रजामंदी से परिवार ने भी इस रिश्ते को स्वीकार किया और आखिरकार निकाह की रस्म पूरी हुई.
निकाह के बाद दोनों परिवारों में खुशी का माहौल है. गांव के लोग भी इस शादी को सकारात्मक नजरिए से देख रहे हैं. खास मौके पर थाना अध्यक्ष समेत समाज के कई लोग पहुंचे और नवदंपति को आशीर्वाद दिया. अपनी शादी में थाना अध्यक्ष को देखकर इम्तियाज की खुशी और बढ़ गई.
‘मैंने दिव्यांग होने का दर्द खुद महसूस किया है’
इम्तियाज का कहना है कि उन्होंने खुद दिव्यांग होने की पीड़ा को करीब से महसूस किया है. इसलिए वह नाजमा की स्थिति को बेहतर ढंग से समझते हैं. उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि शादी के बाद दोनों साथ मिलकर खुशहाल जिंदगी बिताएं और एक-दूसरे का सहारा बनें.
इम्तियाज ने बताया कि जब वह चार-पांच साल के थे, तभी दिव्यांग हो गए थे. जब उन्हें जिंदगी की समझ आने लगी तो वह सोचते थे कि आगे जीवन कैसे कटेगा. इसके बाद उन्होंने संघर्ष करने का फैसला किया. राजस्थान जाकर मोबाइल रिपेयरिंग का कोर्स किया और वापस लौटकर अपनी दुकान खोल ली.
आज इम्तियाज की दुकान अच्छी चल रही है और वह खुद को आत्मनिर्भर मानते हैं. उनका कहना है कि शादी के मौके पर थाना अध्यक्ष का पहुंचना और आशीर्वाद देना उनके लिए खुशी की बात रही. अब वह नाजमा के साथ मिलकर बेहतर भविष्य बनाना चाहते हैं. दोनों की कहानी यह संदेश देती है कि जिंदगी की चुनौतियां इंसान के हौसले से बड़ी नहीं होतीं.
निकाह में पहुंचे थाना अध्यक्ष, नवदंपति को दिया आशीर्वाद
इस खास शादी में परिवार के लोगों के साथ ग्रामीणों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. निकाह के बाद दोनों परिवारों में उत्साह देखने को मिला. लोगों ने नवदंपति को नई जिंदगी की शुरुआत के लिए शुभकामनाएं दीं. इम्तियाज और नाजमा का यह रिश्ता गांव में चर्चा के साथ-साथ उन लोगों के लिए प्रेरणा भी बन रहा है, जो शारीरिक चुनौतियों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेते हैं.
मणि भूषण शर्मा