बिहार के सरकारी स्कूलों की तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है. एक तरफ राज्य में कई ऐसे स्कूल हैं जहां बच्चों के बैठने के लिए अपने भवन तक नहीं हैं. दूसरी तरफ कई जगहों पर लाखों रुपये खर्च करके स्कूल की नई-नई बिल्डिंग तो खड़ी कर दी गई हैं, लेकिन उनमें आज तक पढ़ाई शुरू ही नहीं हो सकी है.
कहीं स्कूल तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है, तो कहीं बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर नेशनल हाईवे पार करना पड़ता है. कहीं नया भवन सालों से ताले में बंद है, तो कहीं पढ़ाई शुरू होने से पहले ही उस पर बुलडोजर चल गया है.
आज तक की सुपौल, बेगूसराय, मुंगेर, वैशाली और सीतामढ़ी की ग्राउंड रिपोर्ट ने सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है. इन पांचों जिलों की स्थिति बेहद हैरान करने वाली है.
सुपौल: आठ साल पहले बना मॉडल स्कूल बना गया खंडहर
सुपौल के राघोपुर प्रखंड के सिमराही बाजार में लखीचंद साहू उच्च माध्यमिक विद्यालय स्थित है. 1958 में बने इस स्कूल को करीब सत्तर साल हो चुके हैं. यहां नौवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई होती है. साल 2013-14 के दौरान इसी स्कूल परिसर में एक मॉडल स्कूल बनाने का काम शुरू किया गया था. इस नए स्कूल में छठी से बारहवीं तक के बच्चों की पढ़ाई होनी थी.
स्थानीय लोगों के मुताबिक, करीब सात-आठ साल पहले यह शानदार भवन बनकर पूरी तरह तैयार हो गया था, लेकिन इसमें आज तक एक भी क्लास नहीं चली.
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आज हालात यह हैं कि यह नया भवन इस्तेमाल होने से पहले ही पूरी तरह जर्जर हो चुका है. आज तक की ग्राउंड रिपोर्ट में इस स्कूल के चारों तरफ घने जंगल और झाड़ियां उगी हुई दिखाई दीं. भवन की खिड़कियां और दरवाजे तक चोरी हो चुके हैं. खिड़कियों के लोहे के ग्रिल तक निकाल लिए गए हैं. बिजली के तार और अन्य जरूरी सामान भी गायब हो चुके हैं. फर्श पर लगी टाइल्स तक उखाड़कर ले जाई गई हैं.
अब यह भवन असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का मुख्य ठिकाना बन चुका है. इसके अंदर कई जगहों पर इस्तेमाल की गई सिरिंज और सुइयां मिली हैं. कोरेक्स की बोतलें और नशीली दवाओं से जुड़ी सामग्री भी वहां बिखरी पड़ी मिली. इलाके की वार्ड पार्षद स्मृति कुमारी का कहना है कि भवन पूरी तरह बन जाने के बाद भी इसे सरकार को हैंडओवर नहीं किया गया था. उनका सीधा आरोप है कि विभागीय लापरवाही के कारण यह नया स्कूल आज खंडहर में बदल गया है.
स्कूल के शिक्षक अजय कुमार के मुताबिक, इस नए भवन में शौचालय का निर्माण नहीं कराया गया था. इसी मुख्य वजह से भवन का हैंडओवर नहीं हो सका. उन्होंने यह भी बताया कि इस भवन में हुई चोरियों को लेकर स्थानीय थाने में एफआईआर भी दर्ज कराई जा चुकी है.
बेगूसराय: खेत के बीच खड़ा स्कूल, लेकिन पहुंचने के लिए रास्ता नहीं
बेगूसराय के तेघरा प्रखंड के किरतौल में करीब पंद्रह लाख रुपये की लागत से उत्क्रमित मध्य विद्यालय का नया भवन बनवाया गया था इस भवन का उद्घाटन भी धूमधाम से किया गया, लेकिन यहां कभी पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि स्कूल तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता ही नहीं है.
यह स्कूल मुख्य सड़क से करीब सौ मीटर अंदर खेतों के बीच में बनाया गया है. इसके चारों तरफ केवल खेती होती है. स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क तो दूर की बात है, एक छोटी सी पगडंडी तक मौजूद नहीं है.
आजतक की टीम जब इस जगह पहुंची तो स्कूल के मुख्य गेट पर ताला लटका हुआ मिला. पूरे कैंपस में बड़े-बड़े जंगल उग आए थे. स्कूल के चारों तरफ फसलें खड़ी थीं.
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस टोले के छोटे बच्चों को आज भी डेढ़ से दो किलोमीटर दूर दूसरे स्कूलों में पढ़ने के लिए मजबूरन जाना पड़ता है. वहां भी कमरों की भारी कमी बनी हुई है. इस स्कूल के लिए जमीन स्थानीय लोगों द्वारा दान में दी गई थी.
2018 में करीब छह कट्ठा जमीन विद्यालय के नाम पर दान की गई थी. इसके बाद 2023-24 में तत्कालीन तेघरा विधायक रामरतन सिंह के ऐच्छिक कोष से करीब पंद्रह लाख रुपये की लागत से यह भवन तैयार किया गया था. लेकिन बिना रास्ते के निर्माण होने के कारण स्कूल आज तक शुरू नहीं हो सका है. बड़ा सवाल यह है कि जब स्कूल के लिए जमीन चुनी जा रही थी, तब रास्ते की जरूरत पर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया.
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मुंगेर: तीस लाख का शानदार स्कूल भवन, एक साल से लटका है ताला
मुंगेर के हवेली खड़गपुर प्रखंड के नया टोला प्रसंडो गांव में करीब तीस लाख रुपये की लागत से एक बड़ा दो मंजिला स्कूल भवन बनाया गया है. इस भवन में तीन बड़े हॉल, एक कार्यालय, शौचालय और पानी की उचित व्यवस्था की गई है. लेकिन इस नए भवन में आज तक पढ़ाई का एक दिन भी शुरू नहीं हो सका है. करीब एक साल से इस नए भवन पर लगातार ताला लटका हुआ है.
यहां भी सबसे बड़ी समस्या स्कूल तक पहुंचने के रास्ते को लेकर है. इसके अलावा स्कूल परिसर में बिजली की कोई व्यवस्था नहीं की गई है. लंबे समय से बंद पड़े इस भवन की हालत अब तेजी से खराब होने लगी है. बोरिंग का हिस्सा उखड़ चुका है. कई जगहों पर दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें दिखाई देने लगी हैं. स्कूल परिसर में गोबर और कचरा जमा हो गया है.
इस स्कूल में करीब सौ छात्र-छात्राओं के नामांकन की बात सामने आई है. फिलहाल बच्चों की पढ़ाई एक सामुदायिक भवन में चलाई जा रही है.
वैशाली: ग्यारह साल से बंद पड़ा है आदर्श विद्यालय
वैशाली के भगवानपुर प्रखंड के वारिसपुर में राजकीय आदर्श विद्यालय का भवन पिछले करीब ग्यारह साल से पूरी तरह खाली पड़ा हुआ है. करीब 2015 में यह शानदार भवन बनकर तैयार हो गया था. स्थानीय प्रशासन की तरफ से बच्चों को इस नए स्कूल में शिफ्ट करने की कोशिश भी की गई थी.
लेकिन नए भवन में केवल एक दिन पढ़ाई होने के बाद ही स्थानीय अभिभावकों और ग्रामीणों ने इसका कड़ा विरोध कर दिया. इसकी मुख्य वजह यह थी कि स्कूल तक पहुंचने के लिए छोटे-छोटे बच्चों को व्यस्त नेशनल हाईवे पार करना पड़ता था.
अभिभावकों के मन में हमेशा यह डर बना रहता था कि छोटे बच्चों को रोजाना एनएच पार कराना जानलेवा साबित हो सकता है। तेज रफ्तार वाहनों की वजह से वहाँ हर समय बड़े सड़क हादसे का खतरा मंडराता रहता था.
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इस गंभीर खतरे को देखते हुए बच्चे पुराने राजकीय बुनियादी विद्यालय में ही पढ़ाई करते रहे और यह नया आदर्श विद्यालय हमेशा के लिए बंद हो गया. करीब ग्यारह साल से यह स्कूल भवन खाली खड़े होकर बच्चों का इंतजार कर रहा है. लंबे समय तक इसका इस्तेमाल न होने के कारण अब इस भवन की हालत भी लगातार खराब होती जा रही है.
खिड़कियों के शीशे पूरी तरह टूट चुके हैं. लोहे के हिस्सों में भारी जंग लग गई है. यहां भी सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर स्कूल भवन का निर्माण करने से पहले बच्चों की सुरक्षित आवाजाही के बारे में क्यों नहीं सोचा गया था.
सीतामढ़ी: चालीस लाख की बिल्डिंग बनी, शुरू होने से पहले ही चल गया बुलडोजर
सीतामढ़ी शहर के रिंग बांध इलाके में स्थित करीब छह दशक पुराने मथुरा उच्च विद्यालय में छात्रों की लगातार बढ़ती संख्या को देखते हुए एक नया दो मंजिला भवन बनाया गया था. इस आधुनिक भवन पर सरकार द्वारा करीब चालीस लाख रुपये खर्च किए गए थे. 2025 में इस भवन का निर्माण कार्य पूरी तरह से पूरा हो गया था.
लेकिन हैरानी की बात यह है कि बच्चों की पढ़ाई इस नए भवन में शुरू होती, उससे पहले ही यह भवन सड़क चौड़ीकरण की जद में आ गया. जब रिंग बांध के चौड़ीकरण के लिए सड़क की पैमाइश की गई, तो यह नया स्कूल भवन उसकी चपेट में आ गया. इसके बाद प्रशासन द्वारा इस नए भवन के हिस्से को तोड़ दिया गया.
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि करीब चालीस लाख रुपये की भारी भरकम लागत से स्कूल भवन का निर्माण कराने से पहले सड़क चौड़ीकरण की योजना और जमीन की सही स्थिति की जांच क्यों नहीं की गई थी?
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शिक्षा मंत्री बोले-सभी मुद्दों पर हो रहा है काम
बिहार के इन तमाम जिलों से सामने आई इस चौंकाने वाली ग्राउंड रिपोर्ट को लेकर राज्य के शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने अपनी बात रखी है. शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का कहना है कि शिक्षा विभाग ने हाल ही में दो दिनों का एक विशेष चिंतन शिविर आयोजित किया था. इस शिविर के दौरान सभी अधिकारियों को इक्कीस बिंदुओं का एक कड़ा टास्क सौंपा गया था.
इन तमाम बिंदुओं में स्कूलों का बुनियादी ढांचा यानी इंफ्रास्ट्रक्चर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा यानी क्वालिटी एजुकेशन और अनुशासन जैसे बेहद अहम मुद्दे शामिल किए गए थे। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इन सभी कामों को पूरा करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है.
शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने आगे कहा कि जो स्कूल भवन पूरी तरह बनकर तैयार हो चुके हैं लेकिन किसी कारणवश अभी तक हैंडओवर नहीं किए गए हैं, उनमें अगले एक महीने के अंदर हर हाल में कक्षाएं शुरू कराने का कड़ा लक्ष्य तय किया गया है.
रोहित कुमार सिंह